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बस्तर पार्ट 7: चितलूर कभी माओवाद प्रभावित था, वहां अब किसान खेती में सोलर पैनल इस्तेमाल कर रहा है

मैं गांव से पुरउम्मीद होकर लौटा कि चितलूर गांव की नई पीढ़ी एक सुनहरे भविष्य की ओर कदम बढ़ा रही है जबकि कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां जिंदगी बंदूकों के साये तले सहमी और ठिठकी हुई है.

Debobrat Ghose Debobrat Ghose Updated On: Jul 21, 2018 09:13 AM IST

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बस्तर पार्ट 7: चितलूर कभी माओवाद प्रभावित था, वहां अब किसान खेती में सोलर पैनल इस्तेमाल कर रहा है

(एडिटर्स नोट: इस साल अप्रैल में, गृह मंत्रालय ने वामपंथी अतिवाद से ग्रस्त जिलों में से 44 जिलों के नाम हटा लिए थे. ये इस बात का इशारा था कि देश में माओवादी प्रभाव कम हुआ है. ये एक ऐसी बहुआयामी रणनीति का नतीजा है, जिसके तहत आक्रामक सुरक्षा और लगातार विकास के जरिए स्थानीय लोगों को माओवादी विचारधारा से दूर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं. हालांकि, ये नक्सल प्रभावित इलाकों में माओवादियों के कब्जे का अंत नहीं है. खतरा अब भी जंगलों में छुपा हुआ है- हारा हुआ, घायल और पलटकर वार करने के लिए बेताब. माओवादियों के गढ़ में घुसकर अतिवादियों की नाक के ठीक नीचे विकास कार्यों को बढ़ाना प्रशासन के सामने असली चुनौती है. तो फिर जमीन पर असल स्थिति क्या है? फ़र्स्टपोस्ट के रिपोर्टर देवव्रत घोष छत्तीसगढ़ में माओवादियों के गढ़ बस्तर में यही देखने जा रहे हैं. बस्तर वामपंथी अतिवाद से सबसे ज्यादा बुरी तरह जकड़ा हुआ है और यहीं माओवादियों ने अपने सबसे बड़े हमलों को अंजाम दिया है. इस सीरीज में हम देखेंगे कि यहां गांवों में कैसे बदलाव आए हैं, गांव वाले इन बदलावों को लेकर कितने उत्सुक हैं और ये भी कि खत्म होने का नाम नहीं लेने वाले माओवादियों के बीच में विकास कार्यों को बढ़ाने की मुहिम में प्रशासन और सुरक्षा बल कितने खतरों का सामना करते हैं.)

माओवादी हिंसा की चपेट में आए इलाकों में विकास का मतलब सिर्फ सड़क, पुल, शिक्षा के संस्थान या अस्पताल बनाना भर नहीं होता. माओवादी हिंसा से ग्रस्त बस्तर संभाग के सात जिलों में सरकार ने बुनियादी ढांचे के विकास के तेज कदम तो उठाए ही हैं लेकिन इसके साथ-साथ इन जिलों के कई गांवों ने सरकारी योजनाओं के बेहतर इस्तेमाल के जरिए अपने भविष्य को संवारने की कोशिश की है. ऐसे गांवों में भविष्य संवारने के जो कदम उठाए गए हैं उनका दायरा भले ही छोटा जान पड़े लेकिन इन कोशिशों ने दूर-दराज के आदिवासी गांवों को एक खास पहचान दी है.

बस्तर जिले के बकवंद अनुमंडल (सब-डिवीजन) का चितलूर ऐसा ही एक आदिवासी गांव है. इस गांव में तकरीबन 2000 लोग रहते हैं. जगदलपुर से दंतेवाड़ा के सफर के बीच सड़क के किनारे एक ढाबा पर चाय पीने के दरम्यान मुझे इस गांव की जानकारी मिली.

यह गांव इंद्रावती नदी के किनारे बसा है और गांव की बसावट से जुड़ी यह बात मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई. इंद्रावती नदी बस्तर की आदिवासी पट्टी के लिए जीवनरेखा की तरह है. इस नदी का उद्गम ओडिशा में है. बस्तर संभाग के कई जिलों से गुजरने वाली यह नदी एक जगह एक बड़े जलप्रपात (वॉटरफॉल) का रूप लेती है जिसे हम चित्रकूट जलप्रपात (वॉटरफॉल) के नाम से जानते हैं. घोड़े के नाल के आकार के होने के कारण इसे भारत का नियागरा फॉल भी कहा जाता है. इंद्रावती नदी यहां से आगे बढ़कर आखिर को महाराष्ट्र के गोदावरी नदी में मिल जाती है.

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चितलूर गांव चारों तरफ से जंगलों से घिरा हुआ है. गांव इंद्रावती नदी के किनारे बसा है. ( तस्वीर: देवव्रत घोष )

इस इलाके के बारे में एक और बात मुझे प्यारी लगी कि इंद्रावती नदी का किनारा और माओवादियों के मजबूत ठिकाने एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं लेकिन इसका मतलब ये न निकाला जाए कि नदी के दोनों पाट वामपंथी अतिवाद से ग्रस्त हैं. नदी के तट पर जगह-जगह कुछ ठीहे हैं जहां माओवादियों का दबदबा है. हमलोग बस्तर-दंतेवाड़ा हाईवे पर उतरे और इससे निकलती एक सड़क पर ड्राइव करते हुए चितलूर को निकल पड़े. पालनार, गीदम या अवापल्ली के उलट चितलूर तथा बस्तर जिले के कई गांव कुछ समय से माओवादियों की जकड़ से छूट चुके हैं लेकिन ये गांव अब भी बहुत ज्यादा पिछड़े हुए हैं.

दरअसल दरभा घाटी, कंगेर घाटी, कोटमसार जैसी जगहों को छोड़ दें जहां हाल के वक्त में सबसे ज्यादा घातक माओवादी हमले हुए हैं (और ये इलाके अब भी माओवादियों के कमान में बने हुए हैं) तो कहा जा सकता है कि पूरा बस्तर जिला दो हिस्सों में बंटने के बाद नक्सलवादियों की चंगुल से छूट चुका है. साल 1998 में बस्तर जिले को दो नए जिलों दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा तथा कांकेर में बांटा गया था. साल 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य वजूद में आया तो बस्तर जिले का फिर से बंटवारा हुआ और इसमें नारायणपुर तथा कोंडागांव जिले बनाए गए. साल 2003 के बाद से जगदलपुर तथा इसके आस-पास के इलाके में माओवादी हिंसा के बस छिटपुट वाकए पेश आए हैं.

एक संकरी सर्पीली सड़क पर गाड़ी दौड़ाते हुए हम चितलूर पहुंचे. हमारे एक ओर साल, महुआ और अन्य किस्म के पेड़ों से भरा जंगल था तो दूसरी ओर कई किसानों की मिल्कियत का पता देती खूब पसरी हुई खेतिहर जमीन. शाक-सब्जियों से भरे खेत के बीच खड़े होने पर मेरी नजर इस बात पर गई कि यहां सोलर पैनल की कतार लगी हुई है.

चितलूर गांव को यह बात एक खास पहचान देती है. चितलूर के किसान परंपरागत डीजल से चलने वाले पंप का इस्तेमाल नहीं करते. उन्होंने अपने खेतों की सिंचाई के लिए डीजल पंप की जगह एक नया ही तरीका अख्तियार किया है. चितलूर के किसान सौर ऊर्जा से चलने वाले पंप के सहारे इंद्रावती नदी का पानी खींचते हैं. मैंने गिनती की तो पाया कि इंद्रावती नदी के किनारे ऐसे 22 सोलर पैनल लगे हैं. लेकिन दूर-दराज के गांव में रहने वाले गरीब आदिवासी किसान महंगे सोलर पैनल कैसे लगा पाये भला ?

स्थानीय किसानों से पूछताछ करने पर मुझे पता चला कि हर सोलर पैनल की कीमत 3 लाख रुपए है. 'हम लोगों ने डीजल से चलने वाले पंप का इस्तेमाल करना बंद कर दिया क्योंकि डीजल महंगा है और फिर बार-बार उसकी मरम्मत भी करानी पड़ती है. डीजल पंप का रख-रखाव बहुत महंगा है. ये सोलर पैनल इस लिहाज से एकदम माफिक हैं. मैंने 10 हजार रुपए लगाए और सूबे की सरकार ने बाकी के 2 लाख 90 हजार रुपए अनुदान के रूप में दिए और सोलर पैनल यहां लग गया.' फ़र्स्टपोस्ट को यह बात आदिवासी किसान मनसाईवर ने बतायी. उन्होंने फिलहाल अपने खेत में सब्जी उगाई है.

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चितलूर गांव में अपने खेतों के बीच खड़े हैं किसान मनसाईवर. ( तस्वीर: देवव्रत घोष )

बगल के खेत में खड़े कुछ और किसान हमारी बातचीत में शामिल हो गए लेकिन उनमें से ज्यादातर हिंदी नहीं बोल पा रहे थे. इन किसानों को पता था कि डीजल पंप से प्रदूषण होता है. एक किसान ने कहा, 'डीजल पंप से प्रदूषण भी होता था इसलिए इसे बदल दिया गया. गांव के पंच फुलेश्वर कश्यप ने बताया, 'फिलहाल सोलर पंप लगाने की 30 अर्जियां अपनी मंजूरी की बाट जोह रही हैं और उनमें एक अर्जी मेरी भी है. चितलूर के किसानों को इस किस्म के पंप का फायदा हो रहा है.'

डीजल पंप बनाम सोलर पंप जोर पकड़ती इस बातचीत के बीच हममें से कोई भी यह नहीं भूला था कि कुछ दिनों पहले तक यह पूरा इलाका माओवादी हिंसा के खतरे से जूझ रहा था. मैंने बातचीत का सिलसिला गांवों में नक्सलियों के असर की ओर मोड़ा. ‘नक्सल’ या ‘माओवादी’ लफ्ज जबान पर लाए बगैर गांव के एक बाशिंदे ने कहा, 'वो लोग नहीं आते हैं. आते भी हैं तो पता नहीं चलता. पर रात को कभी-कभी पुलिस और जवान गश्त करते हैं और पूछते हैं.'

गांववालों ने नक्सलियों के बारे में बस इतना भर बताया. जल्दी ही गांव के किसान इस मौसम में लगायी गई फसल के बारे में बड़े उत्साह से बातें करने लगे और मुझे दिखाने की नीयत से खेतों की तरफ ले गए. जान पड़ रहा था कि वामपंथी अतिवाद उस गांव में अब अतीत की बात बन चला हो.

चितलूर में तकरीबन 360 घर हैं. यहां तीन दशक पहले एक छोटा सा डाकखाना बना लेकिन मुख्य सड़क या फिर जिला मुख्यालय जगदलपुर से गांव को जोड़ने वाली कोई सड़क नहीं बन पाई. बीते पांच सालों में एक हाईस्कूल, एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सरकारी बैंक की एक शाखा और एक आंगनबाड़ी केंद्र इस गांव में खुले हैं.

एक किसान ने बताया, 'बीते तीन सालों में हमें सड़क हासिल हुई. इसका हमें बड़ा फायदा हुआ क्योंकि अब हम अपनी उपज को मोटरसाइकिल या टेम्पो के सहारे बाजार ले जा सकते हैं. जिंदगी अब पहले के मुकाबले आसान हो गई है और हमें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से चिकित्सा-सेवा भी हासिल होने लगी है. गांव में साक्षरता दर 37.2 प्रतिशत है. गांव की लगभग सारी लड़कियां अब स्कूल जाती हैं, सो अब गांव में महिलाओं की साक्षरता दर बढ़ेगी. फिलहाल इस गांव में महिलाओं की साक्षरता दर 13.8 प्रतिशत है.

मनसाईवर की 14 साल की बेटी उषा ने कहा, 'मैं 9वीं क्लास में पढ़ती हूं और मेरी बहन दूसरी क्लास में है. छुट्टी के दिनों में मैं और मेरी बहन खेती-बाड़ी के काम में अपने माता-पिता का हाथ बंटाते हैं.' अमनपसंद बस्तर के इलाके को खौफ के ठिकाने में तब्दील कर देने वाले नक्सल-समस्या के बारे में ऊषा कुछ नहीं पता.

मैं गांव से पुरउम्मीद होकर लौटा कि चितलूर गांव की नई पीढ़ी एक सुनहरे भविष्य की ओर कदम बढ़ा रही है जबकि कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां जिंदगी बंदूकों के साये तले सहमी और ठिठकी हुई है.

Next up: चितलूर से लौटते वक्त मुझे पता चला कि नारायणपुर में बड़ी मात्रा में आईईडी तथा विस्फोटक बरामद हुए हैं. मेरे कैब ड्राइवर उमाशंकर ने कहा, ‘सर ये बस्तर बारुद की ढेर पर बैठा है’. ऐसा कहने वाला वह कोई पहला आदमी नहीं है. बस्तर के बारे में यह बात सत्ता के गलियारों में भी प्रचलित है और मुकामी लोगों के बीच भी. इसी वजह से दिल में  खयाल आया कि चलो, जरा पूछ-परख कर देखा जाए कि बारूद और बस्तर के बीच रिश्ता बताने वाली बात कहां तक सच है.

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