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बस्तर पार्ट 6: कैसे लिट्टे के आतंकियों ने आदिवासी युवाओं को ट्रेनिंग देकर क्रूर हत्यारा बनाया

नक्सल इलाकों में भारी सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद आखिर क्या वो वजह है कि माओवादी आतंकी सुरक्षा बलों पर हमलों में कामयाब हो जाते हैं और भारी संख्या में हमारे जवानों को जान से हाथ धोना पड़ता है ?

Debobrat Ghose Debobrat Ghose Updated On: Jul 19, 2018 08:26 AM IST

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बस्तर पार्ट 6: कैसे लिट्टे के आतंकियों ने आदिवासी युवाओं को ट्रेनिंग देकर क्रूर हत्यारा बनाया

(एडिटर्स नोट: इस साल अप्रैल में, गृह मंत्रालय ने वामपंथी अतिवाद से ग्रस्त जिलों में से 44 जिलों के नाम हटा लिए थे. ये इस बात का इशारा था कि देश में माओवादी प्रभाव कम हुआ है. ये एक ऐसी बहुआयामी रणनीति का नतीजा है, जिसके तहत आक्रामक सुरक्षा और लगातार विकास के जरिए स्थानीय लोगों को माओवादी विचारधारा से दूर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं. हालांकि, ये नक्सल प्रभावित इलाकों में माओवादियों के कब्जे का अंत नहीं है. खतरा अब भी जंगलों में छुपा हुआ है- हारा हुआ, घायल और पलटकर वार करने के लिए बेताब. माओवादियों के गढ़ में घुसकर अतिवादियों की नाक के ठीक नीचे विकास कार्यों को बढ़ाना प्रशासन के सामने असली चुनौती है. तो फिर जमीन पर असल स्थिति क्या है? फ़र्स्टपोस्ट के रिपोर्टर देवव्रत घोष छत्तीसगढ़ में माओवादियों के गढ़ बस्तर में यही देखने जा रहे हैं. बस्तर वामपंथी अतिवाद से सबसे ज्यादा बुरी तरह जकड़ा हुआ है और यहीं माओवादियों ने अपने सबसे बड़े हमलों को अंजाम दिया है. इस सीरीज में हम देखेंगे कि यहां गांवों में कैसे बदलाव आए हैं, गांव वाले इन बदलावों को लेकर कितने उत्सुक हैं और ये भी कि खत्म होने का नाम नहीं लेने वाले माओवादियों के बीच में विकास कार्यों को बढ़ाने की मुहिम में प्रशासन और सुरक्षा बल कितने खतरों का सामना करते हैं.)

क्या छत्तीसगढ़ के नक्सलियों और श्रीलंका के लिट्टे यानी तमिल चीतों के बीच कोई सांठ-गांठ है ? दरअसल छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में माओवादियों के हमले की शैली देखते हुए बार-बार ये सवाल सामने आकर खड़ा हो जाता है. इन इलाकों में भारी सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद आखिर क्या वो वजह है कि माओवादी आतंकी सुरक्षा बलों पर हमलों में कामयाब हो जाते हैं और भारी संख्या में हमारे जवानों को जान से हाथ धोना पड़ता है ?

चाहे 2010 में दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानों के मारे जाने का मामला हो या 2013 में झीरम घाटी में नक्सल हमले में कांग्रेस नेताओं के मारे जाने की वारदात हो, ऐसा क्या है कि वे भयंकर हमले कर हमारे जवानों की नृशंस हत्याएं करते हैं और आसानी से भाग भी जाते हैं ?

ये अकेले इन स्थानीय जनजातियों और आदिवासियों का काम तो नहीं हो सकता जो सिर्फ शिकार करने और छोटी-मोटी आपसी लड़ाइयां लड़ने के ही काबिल हैं. दरअसल इस सवाल का जवाब, उनकी छापामार युद्ध नीति, बारूदी सुरंगों, आईईडी धमाकों का इस्तेमाल और भोले गांव वालों की आड़ में अपने मंसूबों को अंजाम देने में ही छिपा है.

नब्बे के दशक के आखिर में, जब सीपीआई(माओवादी) का गठन नहीं हुआ था, तब पीडब्ल्यूजी यानी पीपुल्स वॉर ग्रुप के नेताओं ने कुछ खास पत्रकारों को दण्डकारण्य के जंगलों में बुला कर इंटरव्यू दिया था. इंटरव्यू में  खुलासा किया गया था कि नक्सलियों को तमिल चीतों यानी लिट्टे के आतंकियों की ओर से ट्रेनिंग मिली है. तब मध्यप्रदेश की सरकार इस खुलासे से चौंक गई थी क्योंकि पता चला कि पीपुल्स वॉर ग्रुप ने अविभाजित मध्यप्रदेश के बस्तर इलाके के घने जंगलों में अपने कैम्प लगाने शुरू कर दिए थे.

नक्सलियों के ऑपरेशन का तरीका तमिल चीतों के तरीकों से एकदम मिलता–जुलता है. निर्दयतापूर्वक नरसंहार और जंगल युद्ध-नीति, सब कुछ एक जैसा. कोशिशें बड़ी हुईं नक्सलियों का आतंक रोकने की. यहां तक कि साल 2009 का ऑपरेशन ग्रीन-हंट भी माओवादियों का उत्पात रोक नहीं पाया.

साल 2009 और 2013 में खुफिया एजेंसियों ने सरकार को बता दिया था कि नक्सलियों की मिलिट्री विंग ‘पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी’ को लिट्टे ट्रेनिंग दे रहा है. 2013 में पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले खुफिया एजेंसियों ने आगाह कर दिया था कि छत्तीसगढ़ के माओवादियों को ‘ मानव-बम ’ बनाने की ट्रेनिंग लिट्टे के आतंकियों से मिली है और चुनावी रैलियों में इसका इस्तेमाल कर नेताओं को इसका निशाना बनाया जा सकता है. उसके बाद क्या हुआ, पूरे देश को मालूम है. 25 मई 2013 को झीरम घाटी में एक चुनावी रैली के दौरान नक्सली हमले में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के बड़े नेता मार दिये गए.

जनताना सरकार को दंडकारण्य इलाके में मजबूत बनाने के लिए माओवादियों का पोस्टर ( तस्वीर: देवव्रत घोष )

जनताना सरकार को दंडकारण्य इलाके में मजबूत बनाने के लिए माओवादियों का पोस्टर ( तस्वीर: देवव्रत घोष )

संस्थागत संरचना-

राजनीतिक संगठन

पीडब्ल्यूजी और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी के आपस में विलय से 2004 में बने प्रतिबंधित राजनीतिक संगठन सीपीआई (माओवादी) का संस्थागत ढांचा वही था, जो सीपीआई और सीपीएम का था. सीपीआई (माओवादी) पर भी प्रतिबंध लगा था.

साल 2000 से भी पहले, जब मध्यप्रदेश अविभाजित था, बस्तर मंडल पीडब्ल्यूजी लोगों के द्वारा नियंत्रित था. पीडब्ल्यूजी के इन लोगों को आंध्रप्रदेश से भगा दिया गया था और वहां से आकर इन्होंने बस्तर में डेरा जमा लिया था. बिहार की सीमा पर स्थित उत्तरी छत्तीसगढ़ की सरगुजा बेल्ट एमसीसी के नियंत्रण में थी. यानी बस्तर के माओवादी अब सीपीआई (माओवादी) के लोग थे. इसकी सेंट्रल कमेटी है और अपना पोलित- ब्यूरो भी. पूरी संस्था कई कमेटियों में बांटी गई है, जैसे-स्टेट कमेटी, जोनल कमेटी, जिला कमेटी और स्क्वॉड एरिया कमेटी. इन कमेटियों के वरिष्ठ नेता सेंट्रल कमेटी के भी हिस्से होते हैं. जैसे 72 बरस के मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति सीपीआई (माओवादी) के महासचिव हैं.

सैन्य संस्था

हथियारबंद कार्यकर्ताओं से जुड़ी जो दूसरी शाखा है, वह है स्टेट मिलिट्री कमीशन यानी सीएमसी. छापामार गतिविधियां, रणनीति तैयार करना, हथियार खरीदना और उसे आगे काडर को मुहैया कराना सीएमसी की ही जिम्मेदारी है. इसकी उप-समितियां भी हैं जैसे, स्पेशल एरिया मिलिट्री कमेटी और जोनल मिलिट्री कमेटी. इलाके की जरूरतों के हिसाब से इन्हें और शाखाओं में भी बांटा जाता है.

पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी

ये सीपीआई (माओवादी) की सैन्य-शाखा है, मिलिट्री ट्रेनिंग, गुरिल्ला स्क्वॉड, माओवादी कार्यकर्ताओं और टुकड़ियों की सुरक्षा और सुरक्षा बलों पर हमले करने की जिम्मेदारी इनकी है. दंतेवाड़ा जिले में जिस हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान मारे गए थे, वह पीएलजीए ने ही किया था. झीरम घाटी में कांग्रेस के नेताओं की हत्या में भी इसी का हाथ था. नक्सल प्रभावित ‘रेड कॉरिडोर’ के जिस इलाके को मुक्त करा लिया जाता था, वह पीएलजीए के नियंत्रण में ही होता है.

बस्तर में, माओवादियों की सबसे छोटी सैन्य इकाई ‘दलम’ होती है, जिसमें 15 से 40 सदस्य होते हैं और ये किसी खास इलाके में होती है और इनका नेतृत्व कमांडर करते हैं. जब कोई बड़ा ऑपरेशन करना होता है, तो कई ‘दलम’ मिलकर ‘कंपनी’ बनाते हैं और फिर हमला करते हैं. दण्डकारण्य में ‘बटालियन-1’ सबसे बड़ी सैन्य टुकड़ी होती है, जिसका कमांडर ‘मडवी हिडमा' है.

नाम न छापने की शर्त पर, आत्मसमर्पण कर चुके बीजापुर के एक पूर्व माओवादी ने बताया, 'दण्डकारण्य में माओवादियों की सेना में स्थानीय संस्था के स्काउट, स्थानीय गुरिल्ला स्काउट, प्लाटून, कंपनी और बटालियनें होती हैं.' स्थानीय संस्था के जो स्काउट होते हैं, वे गांव-गांव घूमते हैं, लोगों से संपर्क स्थापित करते हैं, उनसे उनकी सुरक्षा के एवज में पैसा बतौर टैक्स वसूलते हैं, गांव वालों से चावल और खाने-पीने का दूसरा सामान लेते हैं.

इनसे ऊपर 'लोकल गुरिल्ला स्काउट' होते हैं, जो ‘जनताना सरकार’ यानी लोगों की सरकार का हिस्सा होते हैं. इससे ऊपर ‘प्लाटून’ होती है, जो दुश्मन के लिए जाल बिछाते हैं, सुरक्षाबलों की गतिविधियों पर नज़र रखते हैं और हमले के वक्त अगर ज़रूरत पड़ी तो दुश्मन पर फायरिंग भी करते हैं.

प्लाटून से ऊपर कंपनी होती है, जिसकी जिम्मेदारी होती है जमीन पर लड़ाई से जुड़े सारे कामों का निरीक्षण करना और अंजाम देना. सबसे ऊपर बटालियन होती है, जिसके नेता को ‘कमांडर’ कहते हैं. बटालियन की जिम्मेदारी होती है सरकार के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई को अंजाम देना.

आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों ने खुलासा किया कि बस्तर डिवीजन में दो कंपनियां काम कर रही हैं. हालांकि बस्तर मंडल के आईजी-पुलिस विवेकानंद का कहना है, 'बस्तर में सिर्फ एक ही कंपनी सक्रिय है, जिसका कमांडर हिडमा है.'

जन-मिलिशिया

ये वे लोग हैं जो गांव-गांव में माओवादियों के समर्थक हैं और चोरी-छिपे उनसे सहानुभूति रखते हैं और इनकी पहचान बड़ी मुश्किल होती है. जन-मिलिशिया के लोग माओवादियों के 'आंख और कान' माने जाते हैं. इनकी जिम्मेदारी होती है कि सुरक्षा बलों के बारे में सूचना जुटाएं, उनकी गतिविधियों के बारे में जानकारी दें, वामपंथी आतंक के चिंतन का लोगों में प्रचार-प्रसार करें, गांव वालों को, खास तौर पर युवा वर्ग को अपनी विचारधारा से प्रभावित करें और जरूरत पड़ने पर हमलों में साथ भी दें. इन्हें सीपीआई (माओवादी) की रीढ़ भी कहा जाता है.

दण्डाकारण्य स्पेशल जोन कमेटी

कथित तौर पर ये कमेटी भी स्टेट कमेटी के जितनी ताकतवर होती है. राज्य में इसी कमेटी को माओवाद का किला माना जाता है. इसकी कमान कोई ऐसा माओवादी नेता संभालता है जो बहुत बड़ा नेता हो और सेंट्रल कमेटी का सदस्य भी हो. इस कमेटी का इलाका है बस्तर और गढ़चिरौली का एक छोटा सा हिस्सा.

मुक्त जोन और जनताना सरकार

मुक्त जोन वामपंथी आतंक से प्रभावित किसी इलाके के उस खास हिस्से को कहा जाता है, जहां माओवादियों का सिक्का चलता है. पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बल की पहुंच अभी तक ऐसे इलाकों में हो ही नहीं पाई है. पुलिस और  सीआरपीएफ के सूत्रों के मुताबिक नारायणपुर जिले में ‘अबूझमाड़’ का इलाका ऐसा ही है और सुरक्षा बल आज तक वहां पहुंच ही नहीं पाए हैं. ‘मुक्त जोन’ के दूसरे इलाके सुकमा और बीजापुर जिले में हैं.

‘मुक्त-जोन’ में माओवादियों ने जनताना सरकार बना रखी है, जहां उनकी सरकार चलती है. बिना माओवादियों से पूछे कोई बाहरी शख्स इन इलाकों में घुस नहीं सकता. कोई अगर इस कानून का उल्लंघन करता है, तो उसे गंभीर सज़ा दी जा सकती है. आमतौर पर ये सजा मौत की ही होती है. यही है जनताना सरकार का कानून.

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पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के संविधान का एक पेज

सम्मुख संस्थाएं

माओवादी जिन संस्थाओं के जरिये काम करते हैं, वे आदिवासियों, किसानों , मजदूरों और खदानों में काम करने वाले आदिवासी कामगारों से जुड़ी हैं. जैसे दंडकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संघ, दंडकारण्य खदान मजदूर संघ, क्रांतिकारी किसान समिति और क्रांतिकारी महिला समिति. बस्तर के सभी 7 ज़िलो में ये सारी समितियां काम करती हैं और पार्टी की विचारधारा को लोगों तक पहुंचाने का काम करती हैं. पार्टी की एक सांस्कृतिक संस्था भी है, जो विचारधारा को लोगों तक पहुंचाने का काम अपने गीत-नृत्य और प्रहसनों से करती है. इनका उद्देश्य नव-जनवादी क्रांति लाना है.

हालांकि इस नए सांस्कृतिक आघात से इन इलाकों की मूल संस्कृति नष्ट हो रही है. कई गांव वालों का कहना है कि माओवादियों ने सदियों से चली आ रही आदिवासियों की कई परंपराओं पर प्रतिबंध लगा दिया है, जैसे ‘घोटुल’.

आउटलुक ट्रैवेलर के मुताबिक, 'घोटुल बस्तर की एक सामाजिक संस्था है, इस की शक्ल और तरीका यहां हर समुदाय का अलग-अलग होता है. घोटुल गांव के हॉस्टल की तरह है, इसे युवाओं का क्लब भी कह सकते हैं, कुंवारों के रहने की जगह या कुंवारे लड़के और लड़कियों के रहने की जगह यानी कॉमन हॉस्टल भी इसे कहा जा सकता है. मुरिया जनजातियां इसे मानने वालों में से सबसे बड़ी हैं.' माओवादी जिन संगठनों के ज़रिये काम करते हैं, उनके कुछ सदस्य ‘जन मिलिशिया’ के भी हिस्से होते हैं.

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नक्सल सशस्त्र समूह का दस्तावेज

मिलिट्री ट्रेनिंग घात लगा कर हमले की रणनीति

पीएलजीए में सैनिक पुरुष और स्त्री दोनों होते हैं और इनकी सैन्य ट्रेनिंग बड़ी कठिन होती है. आमने-सामने का मल्ल युद्ध हो या घात लगा कर हमला करना, बस्तर के माओवादी कैंपों में कड़ी ट्रेनिंग चलती रहती है, खास तौर पर मुक्त ज़ोन के इलाकों में.

फर्स्टपोस्ट को मिले माओवादियों के कुछ कागज़ात खुलासा करते हैं कि कैसे नक्सल आतंकी, सुरक्षा बलों को घेर कर हमला करने से लेकर उनके खिलाफ छापामार युद्ध तक की ट्रेनिंग अपने काडर को दिलाते हैं.

घात लगा कर हमले की ट्रेनिंग से जुड़ा ऐसा ही एक कागज केमिस्ट्री की किसी किताब का कोई पन्ना लगता है. कोड में लिखे कई नाम मिले हैं जैसे- C, H, O, M आदि (कार्बन, हाइड्रोजन या ऑक्सीजन नहीं). ये कोड लड़ाई के मैदान में सैनिकों की व्यूह रचना बताता है और ये भी बताता है कि दुश्मन पर हमला कैसे किया जाए, कैसे सुरक्षा बलों से निपटें और कैसे सुरक्षा बलों को घेरें.

फ़र्स्टपोस्ट को मिला एक और कागज ‘अंडर बैरेल ग्रेनेड लॉन्चर’ का पूरा विवरण देता है. इसमें ये भी बताया गया है कि कैसे इसका इस्तेमाल किया जाए. छत्तीसगढ में एंटी नक्सल ऑपरेशन के मुखिया डी.एम. अवस्थी ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया, 'हथियार और बारूद लूटने के अलावा, माओवादी घने जंगलों में बनी अपनी लोकल फैक्ट्रियों में हथियारों को सुधार कर उन्हें सुरक्षा बलों से लड़ने लायक बना रहे हैं.'

खुफिया सूत्रों के मुताबिक सुरक्षा बलों के खिलाफ ऑपरेशन करने का तरीका, बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल, आईईडी बनाना, गुरिल्ला युद्धनीति बनाना, माओवादियों के खिलाफ खड़े लोगों, यानी पुलिस और सुरक्षा बल या गांव वालों को मुखबिर करार कर उन के खिलाफ क्रूरता की हदें पार करना, मारे गए पुलिस वालों के शरीर में आईईडी बांध देना, ये सारे तरीके पहले कभी रहे माओवादियों और तमिल चीतों के गठजोड़ की ओर इशारा करती हैं और बताती हैं कि उन्हीं की ट्रेनिंग से माओवादियों का आतंक भारत की धरती पर फल-फूल रहा है.

इस गठजोड़ में दोनों पक्षों ने अपने फायदे देखे थे. तमिल चीतों ने माओवादियों को बस्तर के घने जंगलों में ट्रेनिंग दी. बदले में श्रीलंका से भगाए जाने के बाद उन्हें भारत के ऐसे इलाके में शरण मिली, जहां वे सुरक्षित रह सकते थे क्योंकि पुलिस या सुरक्षा बल आज तक उन इलाको में पहुंच नहीं सके.

काउंटर टेररिज्म के विशेषज्ञ अनिल कांबोज के मुताबिक, 'माओवादियों को आईईडी ब्लास्ट, बारूदी सुरंगे बनाने, और जंगल में लड़ाई लड़ने की रणनीति लिट्टे के काडरों से मिली. लिट्टे के काडरों को श्रीलंका सरकार ने अपने यहां से भगाया था और जान बचाने के लिए उनके लिए बस्तर के घने जंगलों से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती थी. नक्सलियों ने उन्हें शरण ही इस शर्त पर दी थी कि वे उन्हें लड़ाई के वो सब तरीके बताएंगे, जिनके चलते उन्होंने कई साल श्रीलंकाई सेना को छकाया था.'

जन अदालत: जहां नक्सलियों का कानूनी चलता है

गांववालों के आपसी विवादों को निपटाने के लिए माओवादी गांवों में जन अदालत लगाते हैं. उन्होंने किसी को ‘दोषी’ पाया तो निर्दयतापूर्वक कठोर सज़ा देते हैं. खासकर उन लोगों को जिन्हें वे पुलिस का मुखबिर समझते हैं. ये दरअसल बदला लेने और गांव वालों में ‘डर’ पैदा करने का मनोविज्ञान है. हाल में जन-अदालतों के मामले कुछ कम तो हुए हैं, लेकिन ख़त्म नहीं हुए हैं.

चौंकाने वाली तारीखें

छत्तीसगढ़ में माओवादियों की ओर से कुछ तारीखों को खास दिवस के रूप में मनाना सरकार और सुरक्षा बल को चौंकाता है. सरकार उन खास दिनों पर सुरक्षा के लिए अलर्ट भी जारी करती है. माओवादी ‘ बंद ’ का आह्वान करते हैं, पब्लिक-प्राइवेट वाहनों का आना-जाना बंद करते हैं, रेल रोको आंदोलन करते हैं और पुलिस-प्रशासन पर हमला करते हैं. उनके उद्देश्य साफ हैं. वे चाहते हैं कि आर्थिक गतिविधियों की पूरी तरह घेराबंदी कर सरकार का कामकाज ठप कर दिया जाए.

पीएलजीए सप्ताह ( 2 से 8 दिसंबर ) माओवादियों का भर्ती अभियान

टीसीओसी सप्ताह(15 से 21 अप्रैल)

इस पूरे सप्ताह टैक्टिकल काउंटर-ऑफेंसिव कैम्पेन के तहत हर दिन काला दिन के तौर पर मनाया जाता है. असल में टीसीओसी अभियान 10 मार्च से ही शुरू हो जाता है और पूरे जून रहता है, जब माओवादी बड़े हिंसक हमले करते हैं. इसलिए इस वक्त सुरक्षाबल सबसे ज़्यादा चौकसी पर हैं क्योंकि बड़े नक्सली हमले की आशंका इस पूरे महीने बनी हुई है.

जन पितूरी सप्ताह(4 से 12 जून) 

इस पूरे हफ्ते माओवादी पुलिस मुठभेड़ में मार गए अपने कार्यकर्ताओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और बदला लेने के लिए सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले करते हैं. बिना लोगों की असुविधा की परवाह किए हुए सड़कों और रेल की नाकेबन्दी की जाती है, सड़कों को जगह-जगह नुकसान पहुंचाया जाता है.

शहीद सप्ताह (28 जुलाई से 3 अगस्त तक)

सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है और नाकेबन्दी कर राज्य परिवहन के वाहनों को रोका जाता है. 2008-09 में कोरबा से नारायणपुर की बिजली की ट्रांसमिशन लाइन को माओवादियों ने उड़ा दिया था, जिससे अगले 15 दिनों के लिए पूरे बस्तर में बिजली गायब रही.

गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस: माओवादियों की कोशिश होती है कि 26 जनवरी और 15 अगस्त के दिन गांव के स्कूलों में झंडा न फहराया जाए. वे इस दिन काला दिवस मनाते हैं और विरोध स्वरूप काले झंडे और काले बैज लगाते हैं.

दशकों से बस्तर के लोगों के हितों को अनदेखा किए जाने से, यहां के आदिवासियों और सरकारी एजेंसियों के बीच भरोसे की ज़बरदस्त कमी है. इसके अलावा माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर स्थानीय लोगों की प्रताड़ना से भी यहां माओवादियों को अपने लिए जगह बनाने में आसानी हुई. सरकार के खिलाफ यहां के युवाओं को भड़काने में उन्हें आसानी हुई और इस तरह पूरे दण्डकारण्य में भविष्य के उनके काडर भी तैयार होते चले गए.

कई मामलों में तो गरीब, भोले गांव वालों के लिए ये स्थिति ‘आगे कुंआ, पीछे खाई’ वाली होती है.या तो माओवादियों को समर्थन दें या फिर पुलिस बल को. सुकमा ज़िले के कुछ आदिवासियों ने शिकायत की, 'किसी भी हालत में मरते हम ही हैं. अगर हम पुलिस की मदद करते हैं और उन्हें नक्सलियों की सूचना देते हैं, तो बाद में नक्सली हमें मार डालते हैं. और जब हमें मजबूर किया जाता है कि हम जनतन सरकार की मानें और उन्हें मदद करें, तो सरकार हमें माओवादी करार दे कर हमारी जान के पीछे पड़ जाती है. ये तस्वीर, बक्सर में माओवादी आतंक के असर वाले हर गांव में ऐसी ही है.'

आदिवासी कार्यकर्ता सोनी सोरी का कहना है, 'एक तरफ यहां के आदिवासियों को माओवादियों का गुस्सा झेलना पड़ता है, जो या तो उन्हें मार डालते हैं या फिर उन्हें गांव से बाहर जाने पर मजबूर कर देते हैं. और दूसरी ओर आए दिन पुलिस उन्हें तंग करती रहती है. वे आखिर जाएं तो जाएं कहां.'

इंतज़ार कीजिए- मेरा अगला पड़ाव है बस्तर ज़िले में इंद्रावती नदी के किनारे बसा गांव चितलूर. जब मैं जगदलपुर से दंतेवाड़ा की ओर जा रहा था, तो सड़क किनारे एक ढाबे पर चाय पीते हुए मैंने इस गांव के बारे में पहली बार सुना था. इस गांव के बाशिंदों की, विकास की ओर एक अनूठी पहल के बारे में भी उसी दिन पता चला.

जारी है....

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