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बस्तर पार्ट-4: स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास के सहारे माओवाद से लड़ता दंतेवाड़ा का तकनीक-प्रेमी कलेक्टर

माओवादी आतंक और लगातार हो रहे हमलों के बावजूद दंतेवाड़ा के प्रशासन ने जिले की तस्वीर बदलने का बीड़ा उठाया

Updated On: Jul 15, 2018 03:59 PM IST

Debobrat Ghose Debobrat Ghose
चीफ रिपोर्टर, फ़र्स्टपोस्ट

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बस्तर पार्ट-4: स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास के सहारे माओवाद से लड़ता दंतेवाड़ा का तकनीक-प्रेमी कलेक्टर

(एडिटर्स नोट: इस साल अप्रैल में, गृह मंत्रालय ने वामपंथी अतिवाद से ग्रस्त जिलों में से 44 जिलों के नाम हटा लिए थे. ये इस बात का इशारा था कि देश में माओवादी प्रभाव कम हुआ है. ये एक ऐसी बहुआयामी रणनीति का नतीजा है, जिसके तहत आक्रामक सुरक्षा और लगातार विकास के जरिए स्थानीय लोगों को माओवादी विचारधारा से दूर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं. हालांकि, ये नक्सल प्रभावित इलाकों में माओवादियों के कब्जे का अंत नहीं है. खतरा अब भी जंगलों में छुपा हुआ है- हारा हुआ, घायल और पलटकर वार करने के लिए बेताब. माओवादियों के गढ़ में घुसकर अतिवादियों की नाक के ठीक नीचे विकास कार्यों को बढ़ाना प्रशासन के सामने असली चुनौती है. तो फिर जमीन पर असल स्थिति क्या है? फ़र्स्टपोस्ट के रिपोर्टर देवव्रत घोष छत्तीसगढ़ में माओवादियों के गढ़ बस्तर में यही देखने जा रहे हैं. बस्तर वामपंथी अतिवाद से सबसे ज्यादा बुरी तरह जकड़ा हुआ है और यहीं माओवादियों ने अपने सबसे बड़े हमलों को अंजाम दिया है. इस सीरीज में हम देखेंगे कि यहां गांवों में कैसे बदलाव आए हैं, गांव वाले इन बदलावों को लेकर कितने उत्सुक हैं और ये भी कि खत्म होने का नाम नहीं लेने वाले माओवादियों के बीच में विकास कार्यों को बढ़ाने की मुहिम में प्रशासन और सुरक्षा बल कितने खतरों का सामना करते हैं.)

हालांकि सौरभ कुमार देश की सबसे प्रतिष्ठित नौकरी यानी सिविल सर्विसेज़ का हिस्सा हैं और लेकिन बतौर दंतेवाड़ा जिले के कलेक्टर, सौरभ कुमार से शायद ही कोई ईर्ष्या करे. वजह, वे नक्सलवाद से प्रभावित सबसे बड़े इलाके के कलेक्टर हैं और कोई भूल कर भी ये नहीं सोचेगा कि काश कि वो उनकी जगह इस इलाके में होता. छत्तीसगढ़ के बस्तर डिवीजन का ये सबसे खतरनाक जिला है जहां माओवादियों का असर सबसे ज्यादा है. कुमार के सामने न सिर्फ इस जिले में प्रशासन का दबदबा कायम करने की चुनौती थी, बल्कि उन्हें विकास की कई योजनाओं को जमीन पर भी उतारना था, जिससे जल्द से जल्द ये पूरा इलाका मुख्यधारा में लाया जा सके.

2009 बैच के आईएएस सौरभ कुमार को दंतेवाड़ा जिला संभालने की जिम्मेदारी 14 अप्रैल 2016 को मिली. उसके बाद से ही वे लगातार, बड़ी दृढ़ता से जिले में विकास के कामों में लगे रहे. अपने उद्देश्य के प्रति उनमें लगन इतनी थी कि वो चाहते थे कि जितनी जल्दी हो सके, नक्सलवादी आतंक के लिए कुख्यात दंतेवाड़ा जिले पर से आतंक का लेबल हट जाए.

फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में दंतेवाड़ा के कलेक्टर सौरभ कुमार ने माना- 'विकास सिर्फ दंतेवाड़ा जिले में ही नहीं, बल्कि बस्तर डिवीजन के दूसरे जिलों में भी हुआ है. माओवादी आतंक की घटनाओं में काफी कमी आई है. देखिए, सच कहें तो वामपंथी आतंक का जवाब बस विकास ही हो सकता है. सिर्फ इसी तरीके से माओवादी उग्रवाद को खत्म किया जा सकता है.'

माओवादी आतंक का गढ़ रहा है दंतेवाड़ा

सालों से चले आ रहे माओवादी आतंक का हिसाब लें तो दंतेवाड़ा में इस बदलाव को छोटा नहीं माना जा सकता.

6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा के एक गांव चिंतलनार में माओवादियों ने दिल दहला देने वाले एक हमले में सीआरपीएफ के 76 और पुलिस के एक जवान को मार दिया था. आतंकियों द्वारा अब तक की ये सबसे बड़ी वारदात थी. इस हमले के ठीक एक महीने बाद तमिल चीतों की स्टाइल में एक और हमला हुआ.

दंतेवाड़ा-सुकमा रोड पर चिंगावरम नाम की जगह पर माओवादियों ने यात्रियों से भरी पूरा बस उड़ा दी. 35 यात्री मारे गए, जिनमें सुरक्षा बल के लोग भी शामिल थे. दंतेवाड़ा वही जिला है, जहां 15 मार्च 2007 को रानी बोदली गांव में लगे एक पुलिस कैंप पर माओवादी आतंकियों ने हमला कर 55 जवानों को मार डाला.

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इससे पहले 17 जुलाई 2006 को एराबोर गांव स्थित सलवा जुड़ुम के एक रिलीफ कैंप में इन आतंकियों ने आग लगा दी, 30 निहत्थे लोगों की नृशंस हत्या कर दी और 45 लोगों को अगवा कर ले गए थे. बाद में उन्होंने उनमें से 6 उन लोगों की हत्या कर दी, जो पहले नक्सली थे लेकिन बाद में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर सामान्य जीवन बिताने लगे थे.

ये तो दंतेवाड़ा के इलाके में हुई कुछ बड़ी हिंसक वारदातें थीं. हिंसा की कई छोटी वारदातें भी यहां हुई हैं, जिनमें सुरक्षा बलों के कई जवानों की जानें जा चुकी हैं. ज्यादातर हमले सड़क-निर्माण के कार्यों की सुरक्षा कर रहे जवानों के ऊपर हुए. इन हमलों में निर्दोष लोग सिर्फ मारे ही नहीं गए, जो बच गए, वे इन हमलों के ऐसे शिकार हुए कि सामान्य जीवन जीने लायक भी नहीं रहे. इस साल 20 मई को माओवादियों का आखिरी हमला हुआ था.

हमले के ठीक एक हफ्ते पहले ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने दंतेवाड़ा से अपनी ‘विकास यात्रा’ शुरू की थी. इस हमले में माओवादियो ने किरंदूल-चोरनार रोड पर विस्फोट कर एक गाड़ी उड़ा दी, जिसमें 7 पुलिस वालों की जान चली गई.

दंतेवाड़ा जिले के फूलपाद इलाके में माओवादी हमले से ध्वस्त एक स्कूल (फोटो: देबब्रत घोष)

दंतेवाड़ा जिले के फूलपाद इलाके में माओवादी हमले से ध्वस्त एक स्कूल (फोटो: देबब्रत घोष)

लगातार हमलों और उनमें मारे जाने वाले लोगों की संख्या इतनी बढ़ गई कि जल्दी ही दंतेवाड़ा देश में ‘रेड टेरर कॉरीडोर’ में, नक्सलवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित और बदनाम जिला माना जाने लगा. दंतेवाड़ा का नाम सुनते ही बदन में झुरझुरी दौड़ जाती थी.

दंतेवाड़ा कलेक्ट्रेट में काम करने वाले एक अधिकारी ने बताया- 'दंतेवाड़ा से ज़्यादा नृशंस हत्याएं हमने कहीं नहीं देखीं. हालांकि माओवादी हमलों में अब काफी कमी आई है, लेकिन हम अभी ये नहीं कह सकते कि माओवादियों का डर खत्म हो गया है.'

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दंतेवाड़ा 1998 में बस्तर जिले से अलग किया गया था. बाद में एक बार फिर दंतेवाड़ा को काटकर 2007 में बीजापुर और 2011 में सुकमा जिला बनाया गया. अब ये बस्तर डिवीजन के 7 जिलों में से एक है. सरकार की ओर से देश के 115 ‘संभावनाओं से भरपूर जिलों’ में इस का शुमार होता है और सबसे पिछड़े जिलों में भी ये एक माना जाता है.

प्रशासन उठाया है दंतेवाड़ा की तस्वीर बदलने का बीड़ा

माओवादी आतंक और लगातार हो रहे हमलों के बावजूद दंतेवाड़ा के प्रशासन ने जिले की तस्वीर बदलने का बीड़ा उठाया. कोशिशें 2003 से शुरू हुईं, जब कांग्रेस को हरा कर बीजेपी की सरकार आई और रमन सिंह सूबे के मुख्यमंत्री बने.

दंतेवाड़ा के लोग बताते हैं कि रमन सिंह ने 2003 के चुनाव के लिए जब अपना प्रचार अभियान शुरू किया, तो सबसे पहले यहां बस्तर की जनजातियों की देवी मानी जाने वाली दंतेश्वरी माता के मंदिर में पूजा-अर्चना की. उन्होंने देवी के सामने शपथ ली थी कि अगर वे जीते तो नक्सलवाद से आतंकित इस इलाके का विकास करेंगे और यहां से आतंक का खात्मा भी.

तब इस इलाके में माओवादी उग्रवाद की जड़ें काफी गहरे फैली हुई थीं और इसीलिए विकास की गाड़ी अक्सर पटरी से उतर भी जाती थी. यहां प्रगति के रास्ते में खूब रोड़े भी आए. असलियत ये है कि इन इलाकों में विकास के काम 6 बरस पहले ही शुरू हो पाए.

पलनार, गीडम और दूसरे कई गांवों में ग्रामीणों से बात कर मुझे एक बात समझ आई. लोग मानते हैं कि सब कुछ दंतेश्वरी माता की वजह से हुआ है. देवी ने दंतेवाड़ा को न सिर्फ बेशकीमती खनिजों के भंडार से नवाजा है, बल्कि विकास से हो रही समृद्धि भी उन्हें दी है. दंतेवाड़ा के गांव बलूद के एक बुजुर्ग सोमारू नई बनी एक सड़क की ओर इशारा करते हुए कहते हैं- 'दंतेवाड़ा प्रशासन को दरअसल दंतेश्वरी माता का आशीर्वाद मिला हुआ है, ताकि वे समझदारी के साथ जिले में विकास के काम कर पाएं.'

दंतेवाड़ा के इन इलाकों का दौरा कर मैंने महसूस किया कि यहां कई सतहों पर युद्धस्तर पर काम हुआ है, तब जाकर यहां की जमीनी हकीकत बदली जा सकी है. बड़ी मेहनत से वामपंथी आतंकियों के असर से प्रभावित और पिछड़े इलाकों की तस्वीर बदली गई है और अब विकास की चमक वहां साफ दिखाई पड़ती है. केंद्र और राज्य, दोनों के सुरक्षा बलों की ओर से सुरक्षा के लिए उठाए गए कदम, जिसमें नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक नीति भी शामिल है, से बड़ा फायदा मिला है.

इन कामों को मजबूती, जिला प्रशासन के उन फैसलों से मिली, जिन के चलते ग्रामीणों के स्वास्थ्य और गांवों में बच्चों की शिक्षा पर जिला प्रशासन ने फोकस किया और सरकार की ओर से मिले पैसे का बुद्धिमानी से इस्तेमाल किया.

राज्य सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक दंतेवाड़ा में बच्चों की मृत्यु दर 2003 में 70 थी, लेकिन 2018 में ये घट कर 44 हो गई. जन्म देते समय महिलाओं की मृत्यु दर में भी काफी कमी आई है. 2003 में बच्चों के जन्म के समय 379 महिलाओं की मृत्यु हो गई थी, जबकि अब 2018 में ये संख्या घट कर 272 हो गई है.

दंतेवाड़ा के कलेक्टर सौरभ कुमार का कहना है- 'महिलाओं की मृत्यु दर में कमी इसलिए आई है क्योंकि अब घर की बजाय, बच्चों की डिलिवरी अस्पतालों में होने लगी है. ज़ाहिर है वहां स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएं बेहतर होती हैं और इमरजेंसी जैसी स्थिति से निपटने की भी व्यवस्थाओं से अस्पताल लैस होते हैं. 2003 में अस्पतालों में सिर्फ 19 बच्चों ने जन्म लिया, जबकि 2018 में ये संख्या बढ़ कर 72 पहुंच गई. हमारी कोशिश रहती है कि गर्भवती महिलाएं समय पर मैटरनिटी सेंटर या जच्चा-बच्चा केंद्र पहुंच जाएं, जिससे बच्चे के जन्म के वक्त वे सुरक्षित रहें और अस्पताल में मौजूद सुविधाओं का लाभ उठा सकें. इस काम में सड़कों का बड़ा योगदान रहा. गांव की सड़कों के, मुख्य सड़कों और राष्ट्रीय राजमार्गों से जोड़े जाने से गर्भवती महिलाओं को अस्पतालों तक ला पाना आसान हुआ और इस तरह डॉक्टरों की देख-रेख में बच्चों के जन्म में इज़ाफा हुआ है.'

दंतेवाड़ा में कभी माओवादियों का गढ़ माने जाने वाले गांव पलनार में तो बहुत बढ़िया जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य केंद्र और टेलीमेडिसिन सेंटर भी खुल गया है.

दंतेवाड़ा के 239 गांवों की 124 ग्राम पंचायतों में से 94 ग्राम पंचायतों के 171 गांवों में अब मल-मूत्र विसर्जन के लिए कोई घर से बाहर नहीं जाता. केंद्र ने देश के हर जिले के लिए एक लक्ष्य रखा है. हालांकि माओवादी इलाके के असर वाली 30 ग्राम पंचायतों में लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सका है.

दंतेवाड़ा में कलेक्ट्रेट में काम करने वाले एक अधिकारी ने बताया- 'माओवाद के असर वाले गांवों में सामुदायिक शौचालय बनाने की योजना पर काम चल रहा है. देर की वजह ये कि यहां के सरपंचों ने माओवादियों के डर से शौचालय का निर्माण करने वाले ठेकेदारों को लगातार निरुत्साहित किया.'

दंतेवाड़ा का ज़िला कलेक्ट्रेट

दंतेवाड़ा का ज़िला कलेक्ट्रेट

दंतेवाड़ा में सौरभ कुमार की पहली तैनाती 2012 में बतौर एसडीएम हुई थी. 5 साल बाद 2017 में, बतौर इस जिले के कलेक्टर, उन्हें प्रधानमंत्री की ओर से अच्छे प्रशासन के लिए ‘एक्सीलेंस अवार्ड’ मिला. उन्हें नोटबंदी के बाद, पलनार को डिजिटल गांव बनाने के लिए भी पुरस्कार मिला. सौरभ ने इलाहाबाद के मोतीलाल नेहरू नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी से बी.टेक की डिग्री ली है और उन्हें अपनी इस पढ़ाई-लिखाई का फायदा दंतेवाडा में अपने काम में भी खूब मिला.

इससे पहले नक्सली गांवों के स्कूल जला देते थे, जिससे बच्चे और अध्यापक दोनों स्कूल आना बंद कर देते थे. लेकिन अब तस्वीर बदल गई है. माओवादियों को पीछे खदेड़ने के लिए दंतेवाड़ा जिले के प्रशासन की ओर से आक्रामक नीति अपनाई गई और इसके तहत जनजातियों के बच्चों के स्कूलों को पूरी सुरक्षा मुहैया कराई गई. नतीजतन पिछले एक दशक में 106 से बढ़ कर इन स्कूलों की संख्या 146 जा पहुंची है. इन स्कूलों को आश्रम के नाम से जाना जाता है और इनमें छात्रों की संख्या भी काफी बढ़ी है. 2003 में जहां आश्रमों में 7225 बच्चे पढ़ते थे, अब 2018 में ये संख्या बढ़ कर 20,559 हो गई है.

जिला खनिज कोष की भी विकास में है बड़ी भूमिका

दंतेवाड़ा और दूसरे जिलों के विकास में ‘जिला खनिज कोष’ की भी बड़ी भूमिका है. इस कोष ने जिला कलेक्टर को पैसों को खर्च करने की और ताकत दी है, जिससे स्थानीय स्तर पर विकास के लिए जब भी खर्च करना हो, तो कलेक्टर को अपने से ऊपर वाले अफसरों से इजाज़त न लेनी पड़े. चूंकि बस्तर मंडल में दंतेवाड़ा अकेला ऐसा जिला है, जहां बैलाडीला में राष्ट्रीय खनिज विकास निगम की लोहे की खानें हैं. इसलिए इस मंडल के सारे जिलों के विकास के लिए जो पैसा दिया जाता है, उसका 40 फीसदी दंतेवाड़ा को मिलता है.

इस इलाके में खनन का काम करने वालों को जो रॉयल्टी मिलती है, उसका तीस फीसदी हिस्सा उस कोष में जाता है, जिससे इन जिलों में विकास के काम होते हैं.

युवा कलेक्टर का उम्मीदों से भरा रवैया यहां दूसरों में भी आशाएं भरता है. उनकी उम्मीदें जमीनी हैं और नक्सलवाद से बुरी तरह प्रभावित कुछ गांवों में नई सच्चाइयों के तौर पर सिर भी उठा रही हैं. ये देखा जाना बाकी है कि क्या विकास करने का ये मॉडल कि लोगों को विकास का फंड सीधे लोगों को दिया जाए, ईमानदारी से दूसरे इलाकों में भी लागू किया जा सकता है? क्योंकि वास्तव में देखा जाए तो इन इलाकों की जनजातियों को अधिकारों से वंचित रखने से ही दिक्कतें शुरू हुईं. लोग नक्सलवाद की ओर मुड़ गए और इलाका एक अंधेरे युग की ओर चल पड़ा.

दशकों से यहां यही होता आया. पैसा आता था ग्रामीणों के विकास के लिए लेकिन इन इलाकों तक पहुंचने की बजाय सत्ता में बैठे लोगों के खजाने भरता था. और ज़रूरतमंद लोग फिर वंचित ही रह जाते थे. इसी वजह से नक्सलवाद का राक्षस यहां सिर उठाता गया और अब हालत ये है कि जनजातियों के लोगों का प्रशासन पर भरोसा नहीं रहा.

हिंसा का दौर जब बढ़ा तो सरकार चेती और अब पिछले कुछ सालों से प्रशासन की ओर से लोगों के दिल जीतने की हर संभव कोशिश की जा रही है. प्रशासन को ये कोशिश तब तक जारी रखनी होगी, जब तक यहां के लोग ये न महसूस करने लगें कि अब उन्हें ठगा नहीं जा रहा, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा रहा. ये कोशिश तब तक भी जारी रखनी होगी, जब तक ये लोग खुद न सोचें कि अब उन्हें मुख्यधारा में शामिल होना है. क्योंकि इस जिले के कुछ इलाके ऐसे हैं जहां माओवादी अब भी अपना असर रखते हैं, जैसे काटेकल्यान, कुवाकोंडा और कसोली.

दंतेवाड़ा के कलेक्टर सौरभ कुमार को मेरी शुभकामनाएं. मुझे अब अपने अगले मिशन के लिए निकलना है. और इस मिशन के तहत मुझे किसी गोपनीय जगह पर एक स्थानीय जोड़े से मिलना है. ये पति-पत्नी, दोनों पहले माओवादी रहे थे और अब आत्मसमर्पण कर सामान्य जिंदगी जी रहे हैं.

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