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वकीलों ने की हड़ताल पर लगी पाबंदी हटाने की मांग, नहीं माने सीजेआई

साल 2002 में एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने कहा था कि वकीलों को हड़ताल पर जाने, बहिष्कार करने या सांकेतिक हड़ताल करने का कोई अधिकार नहीं है

Updated On: Oct 06, 2018 09:22 PM IST

Bhasha

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वकीलों ने की हड़ताल पर लगी पाबंदी हटाने की मांग, नहीं माने सीजेआई

शनिवार को भारत के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के इस सुझाव से असहमति जताई कि वकीलों द्वारा हड़ताल किए जाने पर 16 साल से लगी पाबंदी हटाई जानी चाहिए. इसी के साथ उन्होंने सवाल किया कि हड़ताल हो ही क्यों?

नए चीफ जस्टिस के अभिनंदन के लिए बीसीआई की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में जस्टिस गोगोई ने यह टिप्पणी की. यह टिप्पणी उन्होंने उस वक्त की जब बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने वकीलों के हड़ताल करने पर लगी पाबंदी हटाने का मुद्दा उठाया.

जस्टिस मिश्रा भी सीजेआई से सहमत

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा ने भी सीजेआई के विचार से सहमति जताई. जस्टिस मिश्रा ने वकीलों को याद दिलाया कि अदालत में उनकी गैर-मौजूदगी से लोगों की स्वतंत्रता प्रभावित होगी और उन्हें कई अधिकारों से वंचित होना पड़ेगा.

तीन अक्टूबर को सीजेआई पद की शपथ लेने वाले जस्टिस गोगोई ने कहा, ‘मैं नहीं समझता कि यह कोई मुद्दा है. कानूनी बारीकियों में क्यों जाना? हड़ताल हो ही क्यों? मुझे यकीन है कि कोई (हड़ताल) नहीं होगी.’ जस्टिस मिश्रा ने कहा कि बार की हड़ताल का समर्थन ‘अपवाद के मामलों में किया जा सकता है. जब लोकतंत्र खतरे में हो’ या ‘न्यायिक प्रणाली की रक्षा के लिए’ ऐसा किया जा सकता है. लेकिन इनके बिना ‘उसे हड़ताल पर जाने का कोई अधिकार नहीं है.’

2002 मे लगी थी हड़ताल पर पाबंदी

उन्होंने कहा, ‘क्या हम जंगलराज बर्दाश्त कर सकते हैं? कानून के शासन में क्या हम आम लोगों के लिए दरवाजे बंद कर सकते हैं. जब आप उस दिन अदालत में नहीं होते हैं तो कितने ही लोगों की आजादी प्रभावित होती है. कितने ही लोगों को उस दिन अधिकारों से वंचित रह जाना पड़ता है.’

पाबंदी हटाने की मांग करते हुए बीसीआई के अध्यक्ष ने कहा, ‘यदि वकीलों के मुंह बंद होंगे तो देश का लोकतांत्रिक ढांचा ही नष्ट हो जाएगा.’ उन्होंने कहा, ‘कानूनी बिरादरी को सीजेआई पर काफी विश्वास है. हमें यकीन है कि आप हमारी आजादी बहाल करेंगे.’ साल 2002 में एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने कहा था कि वकीलों को हड़ताल पर जाने, बहिष्कार करने या सांकेतिक हड़ताल करने का कोई अधिकार नहीं है.

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