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रोहिंग्या मुसलमानों का दर्द शेख हसीना से ज्यादा अच्छे तरीके से कौन समझ सकता है

शेख हसीना पश्चिमी देशों के लिए अनजाना नाम नहीं रह गया है क्योंकि रखाइन से भागने वालों के लिए दामन फैलाने वाला बांग्लादेश खुद आर्थिक विषमताओं से जूझ रहा है

Nazim Naqvi Updated On: Sep 29, 2017 03:58 PM IST

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रोहिंग्या मुसलमानों का दर्द शेख हसीना से ज्यादा अच्छे तरीके से कौन समझ सकता है

अमेरिकी अखबार ‘वाल स्ट्रीट जनरल’ ने रोहिंग्या-संघर्ष पर अपने एक लेख में हालात पर नजर रखने वालों के हवाले से लिखा- ‘हालात पर नजर रखने वालों ने एक साल पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि एशियाई शरणार्थी संकट में करुणा और अनुकंपा का चेहरा, नरमी से बात करने वाली और नोबेल पुरस्कार विजेता ‘आंग सान सू’ का नहीं, बल्कि कम शोहरत वाली उनकी पड़ोसी, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का होगा.

एक अनुमान के मुताबिक, बर्मा के रखाइन राज्य में करीब 3-4 लाख रोहिंग्या मुसलमान, उत्पीड़न से बचने के लिए, बांग्लादेश के अस्थायी शरणार्थी शिविरों में आकर बस चुके हैं. यह आंकड़ा 25 अगस्त को रोहिंग्या उग्रवादियों द्वारा बर्मा की सीमा चौकियों पर हमले के बाद की तस्वीर पेश करता है.

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बांग्लादेश

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख ने म्यांमार की इस कार्यवाही को जातीय सफाई की उन मिसालों के अनुरूप पाया है जो हमें पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाई जाती हैं. जबकि चीन ने म्यांमार का समर्थन करके इस एकतरफा कार्यवाही को विवादित बना दिया है. जो भी हो लेकिन इस बीच हकीकत ये है कि बांग्लादेश ने रखाइन राज्य के बेसहारों को आसरा देकर अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता हासिल की है.

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना, जिनका गुरुवार को जन्मदिन था, पश्चिमी देशों के लिए अनजाना नाम नहीं रह गया है, क्योंकि छोटे-छोटे बच्चों, बुजुर्गों और तन छुपाने की जरूरतों के साथ रखाइन से भागने वालों के लिए दामन फैलाने वाला बांग्लादेश, खुद आर्थिक विषमताओं से जूझ रहा है.

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ऐसे हालात में क्यों वो शरणार्थियों के इस बोझ को ढोने के लिए तैयार है, इसका जवाब, शेख हसीना ने 21 सितम्बर को यू.एन. जनरल असेंबली को संबोधित करते हुए दिया. ‘रोहिंग्या-संकट ने हमें और हमारे देशवासियों को इसलिए एकजुट कर दिया है क्योंकि 1971 में इस मानव त्रासदी को हमने बहुत करीब से देखा है, जिसकी कोख से बांग्लादेश का जन्म हुआ था. उस समय पाकिस्तानी सेना ने ऐसी ही जातीय-सफाई हमारे बीच की थी’.

शेख हसीना बेहतर जानती हैं

भारत-पाक विभाजन के 48 दिन बाद, पूर्वी पाकिस्तान के एक बड़े नेता मुजीबुर्रहमान के घर शेख हसीना का जन्म हुआ. जब वो महज चार साल की थीं तो उनके पिता ‘भाषा-आन्दोलन’ के तहत बंगाली भाषा को पूर्वी-पकिस्तान की सरकारी भाषा बनाने के लिए सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे. 20 वर्ष की हसीना ने 71 का वह युद्ध करीब से देखा, जिसमें 30 लाख बंग्लादेशियों ने अपना खून देकर उस नींव को तैयार किया जिसपर आज बांग्लादेश का संकल्प खड़ा है.

United Nations : Bangladesh Prime Minister Sheikh Hasina addresses the United Nations General Assembly, Thursday, Sept. 21, 2017, at the U.N. headquarters.AP/PTI(AP9_22_2017_000014B)

हसीना महज़ 27 साल की थीं और किस्मत से जर्मनी में थीं, जब 15 अगस्त 1975 की वह सुबह आई जिसने उनके पूरे परिवार को खून में डुबो दिया. आज 70 वर्षीय शेख हसीना, अपने पड़ोसी, रोहिंग्या मुसलमानों के लिए उसी भूमिका को अदा कर रही हैं जो भारत-सरकार ने अपने पड़ोसी, बांग्लादेश के साथ निभाई थी. शेख हसीना से ज्यादा रोहिंग्या-वासियों का दर्द कौन समझ सकता है, जिसने 46 बरस पहले पाकिस्तानी-सेना और मुक्ति-वाहिनी के बीच हुए संघर्ष से बिलबिलाकर भागते बांग्लादेशियों को देखा है, जिनके सामने दो ही रास्ते थे, या तो समंदर की गहराई में डूब जाएं या भारत की सीमाओं में दाखिल हो जाएं

शेख हसीना को उनके इस कदम के लिए जरूर सराहा जाना चाहिए मगर ‘वाल स्ट्रीट जनरल’ ने लेख के उप-शीर्षक में जो कुछ कहा- ‘रोहिंग्या शरणार्थियों की बढ़ती तादाद के बीच, शेख हसीना ने अपने पड़ोसियों को सहानुभूति में एक सबक सिखाया’, इससे उन्हें एतराज हो सकता है जो जानते हैं कि सच्चाई क्या है?

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जो बात 70 वर्षीय हसीना जानती हैं, उसे 128 साल पुराना अखबार भूल चुका है वर्ना वह लिखता ‘रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए बसेरा बनते हुए बांग्लादेश ने 46 साल पहले की भारतीय दया को याद रखा’. पीड़ा क्या होती है ये बांग्लादेश जानता है और दया क्या होती है ये उसे उसके पड़ोसी भारत ने सिखाया है.

आंग सान सू को कभी न कभी तो जवाब देना पड़ेगा

म्यांमार के रखाइन राज्य में बर्मी-सेना की कार्यवाही ‘उचित और अनुचित’ से आगे एक निर्णायक हल की ओर जाती हुई दिखाई देती है. जाहिर है कि आंग सान सू और उनकी सेना को कभी न कभी तो अपनी सफाई में कुछ कहना पड़ेगा. हम उम्मीद करते हैं कि जब ऐसा समय आएगा तो मानवीय संघर्षों के लिए जानी जाने वाली, नोबेल-विजेता आंग सान सू दुनिया को मनवा सकेंगी कि ‘आर-पार’ की इस लड़ाई को उनका समर्थन क्यों मिला?

भारत के लिए, अपने दो पड़ोसी सरहदों पर फैली बेचैनी, कम परेशानी की बात नहीं है. बांग्लादेश और बर्मा, दोनों ही देशों के साथ भारत के मधुर-रिश्ते हैं. प्रधानमंत्री मोदी आंग सान सू के साथ भी खड़े नजर आते हैं और शेख हसीना के जन्मदिन पर उनके लिए भी दीर्घ आयु और स्वस्थ जीवन की कामना भी करते हैं.

ऐसा लगता है जैसे बर्मा और बांग्लादेश के बीच मानवता को लेकर एक अदृश्य जंग छिड़ी हुई है जिसमें दर्दमंदी और सहानुभूति का पैमाना बनाया गया है. सूचना-क्रांति के इस युग में सामने से देखने पर यही लगता है कि शेख हसीना के मुकाबले में नोबेल-विजेता ‘आंग सान सू’ से पश्चिमी-दुनिया वाले ज्यादा परिचित हैं. ये भी एक संयोग ही है कि दोंनों ही ऐसे पिताओं (जनरल आंग सान और शेख मुजीबुर रहमान) की संतानें हैं जो अपने मुल्कों के राष्ट्रपिता बने और दोनों ही अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा मारे गए.

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लेकिन जहां शेख हसीना एक ‘दर्दमंद-चेहरे’ के साथ उभरी हैं. वहीं आंग सान सू के बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि ‘वह पूरी तरह से राजनीतिज्ञ हैं’. इस बीच कई नोबेल-पुरस्कार विजेताओं ने आंग सान सू से अपील की है.

Myanmar's State Counsellor Suu Kyi shakes hands with India's Prime Minister Modi during a photo opportunity ahead of their meeting at Hyderabad House in New Delhi

नोबल पुरस्कार विजेताओं ने की है अपील

नोबेल पुरस्कार विजेता बिशप डेसमंड टूटू ने एक खुले पत्र में उनसे 'बर्बादी और संकट के इस दौर में मानवीयता के साथ हस्तक्षेप' करने की गुजारिश की है तो एक दूसरी नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई ने भी उनसे, जो कुछ चल रहा है, उसकी निंदा में उनके साथ शामिल होने की प्रार्थना की है. एक और बड़ी शख्सियत और नोबेल-विजेता दलाईलामा ने भी बर्मा वालों से बुद्ध को याद रखने की गुहार करते हुए कहा कि 'बुद्ध होते तो वह इस समय घबराकर भागते हुए रोहिंग्या लोगों की मदद कर रहे होते’.

जैसा कि दुनिया भी समझ रही है, आंग सान सू, पूरी तरह राजनीतिज्ञ हैं और इन दिनों वह जब-जब मीडिया के सामने आती हैं तो अंग्रेजी में ही अपनी बात कहती हैं जो उनके देश की आमजन भाषा नहीं है. इसका मतलब यह निकाला जाता है कि वह पश्चिम को संबोधित करती हैं.

इसी क्रम में, आंग सान सू ने गुरूवार, 28 सितंबर को (इन पंक्तियों को लिखे जाने के दौरान) विभिन्न देशों के राजनायिकों से बात करते हुए जब यह कहा कि ‘आम-रोहिंग्या पर हो रही यातनाओं के आरोपों के लिए उन्हें सुबूतों की दरकार है', या फिर यह कि ‘वह जानना चाहती हैं कि रोहिंग्या अल्पसंख्यक समुदाय आखिर, समूहों में सरहद पार क्यों जा रहा है?’, तो सभा में बैठे लोग स्तब्ध रह गए. इसका सीधा मतलब यह है कि रखाइन में हो रही सैनिक कार्यवाही के प्रति वह भी उतनी ही अनजान हैं जितनी बाकी दुनिया. लेकिन कूटनीतिज्ञ आंग सान सू के इस व्यवहार को किसी नई सियासी चाल के रूप में देख रहे हैं.

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