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लड़कियों के पैदा होने पर जश्न! हकीकत जान चौंक जाएंगे आप

यहां लड़की होने पर जश्न इसलिए मनाया जाता है ताकि बड़ा होने पर उन्हें देह व्यापार के नरक में धकेला जा सके

Updated On: Mar 18, 2018 03:50 PM IST

Bhasha

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लड़कियों के पैदा होने पर जश्न! हकीकत जान चौंक जाएंगे आप

भारत में कन्या भ्रूण हत्या जहां राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय है तो वहीं मध्यप्रदेश के मालवा इलाके के रतलाम, मंदसौर और नीमच जिलों में निवास करने वाले बांछड़ा समुदाय में लड़की का जन्म होने पर जश्न मनाया जाता है. लेकिन इस जश्न के पीछे की तस्वीर बड़ी भयावह है.

यहां लड़की होने पर जश्न इसलिए मनाया जाता है ताकि बड़ा होने पर उन्हें देह व्यापार के नरक में धकेला जा सके. इतना ही अब ऐसे भी कई मामले सामने आए हैं जहां बांछड़ा समुदाय के लोग दूसरे समुदायों से लड़कियों को खरीद कर उन्हें देह व्यापार में धकेल रहे हैं. बांछड़ा समुदाय में देह व्यापार को सामाजिक मान्यता है और इसलिए इनके परिवार में लड़की का होना बड़ा अहमियत रखता है.

समुदाय में लड़कियों की अहमियत के मद्देनजर लड़कियों की संख्या बढ़ाने का एक नया तरीका निकाला है. यह नया तरीका है कि दूसरे समुदाय की और गरीब परिवारों की लड़कियों को पैदा होते ही खरीद लो और उसको पालो पोसो तथा बड़ी करके वेश्यावृति के दलदल में धकेल दो.

पुरूषों के मुकाबले दो गुनी है महिलाओं की संख्या 

बांछड़ा समुदाय के उत्थान के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘नई आभा सामाजिक चेतना समिति’ के संयोजक आकाश चौहान ने बताया, ‘मंदसौर, नीमच और रतलाम जिले में 75 गांवों में बांछड़ा समुदाय की 23,000 की आबादी रहती है. इनमें 2,000 से अधिक महिलाएं और युवतियां देह व्यापार में लिप्त हैं.’ चौहान ने दावा किया कि मंदसौर जिले की जनगणना के अनुसार यहां 1000 लड़कों पर 927 लड़कियां हैं, पर बांछड़ा समाज में स्थिति उलट है.

Eunuchs apply make-up before Raksha Bandhan festival celebrations in a red light area in Mumbai, India, August 17, 2016. REUTERS/Danish Siddiqui TPX IMAGES OF THE DAY - S1AETVYGEFAA

महिला सशक्तिकरण विभाग द्वारा वर्ष 2015 में कराए गए सर्वे में 38 गांवों में 1047 बांछड़ा परिवार में इनकी कुल आबादी 3435 दर्ज की गई थी. इनमें 2243 महिलाएं और महज 1192 पुरूष थे, यानी पुरूषों के मुकाबले दो गुनी महिलाएं. वहीं नीमच जिले में वर्ष 2012 के एक सर्वे में 24 बांछड़ा बहुल गांवों में 1319 बांछड़ा परिवारों में 3595 महिलाएं और 2770 पुरूष पाए गए.

इस पूरे मामले में मालवा में पुलिस इंस्पेक्टर अनिरूद्व वाघिया ने बताया कि दूसरे समाज की लड़कियों को खरीदकर उनको वेश्यावृत्ति के धंधे मे धकेलना चौंकाने वाला हैं. नीमच, मंदसौर जिले में इस तरह के अब तक करीब 70 से अधिक मामले उजागर हो चुके हैं.

नीमच के पुलिस अधीक्षक (एसपी) टीके विधार्थी ने मानव तस्करी और बांछड़ा समुदाय की सामाजिक बुराई पर कहा, ‘इस दिशा में पुलिस के चाहे जितने भी प्रयास हों वो नाकाफी हैं क्योंकि पुलिस कितने मुकदमें कायम करेगी? पुलिस की कार्रवाई उतनी प्रभावी नहीं होगी, इसके लिए सामाजिक जागरूकता की ज़रूरत है. यह एक सामूहिक बुराई है. अभी हाल ही में हमने इस दिशा में प्रयास शुरू किये हैं.’

उन्होंने बताया, ‘हम बांछड़ा समुदाय के डेरों में सर्वे करवाकर यह प्रयास कर रहे हैं कि इनके सब बच्चे स्कूल जाएं, वहीं जो पढ़ लिख चुके है उन्हें रोजगार मिले. हमारे अधिकारी ऐसे बांछड़ा युवक युवतियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवा रहे हैं. जागरूकता अभियान के साथ पुलिस उन लोगों को नहीं बख्शेगी जो नाबालिग बच्चियों को इस धंधे में लाते हैं. यदि हमें इस तरह की कोई शिकायत मिली तो हम ऐसे तत्वों से सख्ती से निपटेंगे.

Women participate in a protest to commemorate international sex workers day in San Salvador, El Salvador, June 2, 2016. REUTERS/Jose Cabezas - S1AETHQTBDAA

स्टांप पेपर पर मुहर मारकर खरीदी जाती है बच्चियां 

बांछड़ा समुदाय में जिस्मफरोशी के लिए मासूम बच्चियों की खरीद फरोख्त का पहला मामला उस समय सामने आया जब 15 जुलाई 2014 को नीमच पुलिस ने कुकडेश्वर पुलिस थाना क्षेत्र के मौया गांव में स्थित बांछडा डेरे पर दबिश दी थी. यहां श्याम लाल बांछडा के पुलिस को छह वर्षीय एक नाबालिग बालिका मिली.

श्याम लाल की पत्नि प्रेमा बाई बांछडा ने पुलिस को बताया कि इस लड़की को सन् 2009 में वह नागदा से खरीद कर लाए थे. इस सौदे को करवाने वाला दलाल रामचंद्र मानव तस्करी के मामले में सन् 2011 से जेल मे बंद है. इस मामले के खुलासे के बाद पुलिस भौचक्की रह गई क्योंकि इसमें बाकायदा 500 रूपए के स्टांप पेपर पर बच्ची को बेचा गया था.

इस घटना ने समूचे प्रशासन को हिला दिया कि किस तरह गरीब परिवारों की बच्चियों की खरीद-फरोख्त कर उनको देह व्यापार में झोंका जाता है. यह चलन अब एक बड़े कारोबार का रूप ले चुका है. मालवा में गरीब घर की लडकियां बांछड़ा समुदाय के लिए महज रूपया कमाने का माध्यम बन गई है और उन्हें मात्र भोजन और कपडों के लिए अपना तन बेचना पड़ रहा है.

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