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लोन डिफॉल्टर की 'बाजीगरी' से कैसे बचे सरकार

एआईबीईए महासचिव ने कहा, किंगफिशर मामले लिए सरकार, आरबीआई जिम्मेदार

Updated On: Apr 23, 2017 08:34 PM IST

Dinesh Unnikrishnan

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लोन डिफॉल्टर की 'बाजीगरी' से कैसे बचे सरकार

ऐसे समय में जब बैंकिंग उद्योग किंगफिशर एयरलाइंस के बॉस, विजय माल्या जैसे बड़े कॉर्पोरेट लोन डिफॉल्टरों (प्रमोटरों को भुगतान वापस करने की क्षमता तो है, लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे) के खिलाफ लड़ रहा है, तो बैंक कर्मचारी यूनियन चालाक प्रोमोटर्स के खिलाफ और बकाया राशि की तुरंत वसूली के लिए राष्ट्रीय स्तर के कार्रवाई अभियान की मांग कर रहे हैं.

अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ (एआईबीईए) ने 20 अप्रैल से अभियान की योजना बनाई और सितंबर के मध्य में संसद के सामने एक मोर्चा निकालने का फैसला किया है.

फर्स्टपोस्ट के साथ एक इंटरव्यू में एआईबीईए के महासचिव वेंकटचलम ने कहा है कि वर्तमान स्थिति के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और सरकार दोनों को दोषी ठहराया जाना चाहिए. वेंकटचलम ने कहा कि लोन बकायेदारों को सार्वजनिक पदों पर बने रहने से रोका जाना चाहिए. “हम चुनाव आयोग से मांग करते रहे हैं कि लोन डेफॉल्टरों को चुनाव लड़ने या मंत्री बनने से रोका जाना चाहिए. वेंकटचलम ने कहा कि अभी तक इस तरह के निर्णय से बचा जा रहा है. इंटरव्यू के अंश :

क्या आपके आंदोलन का कोई तात्कालिक कारण है ?

लोन नहीं चुकाए जाने की समस्या हमेशा से रही है. हम इस मुद्दे पर लड़ते भी रहे हैं. लेकिन हाल ही में वसूली के उपायों के सुझाव के बिना आरबीआई बैंकों को नहीं चुकाए जा रहे इन सभी ऋणों को मुहैया कराने के लिए मजबूर कर रहा है. इसलिए, यह तो बैलेंस शीट को नष्ट करने जैसा है. लिहाजा हम महसूस करते हैं कि हमें इस समस्या को उजागर करना चाहिए. यह एक अकेला ऐसा मुद्दा है, जो बैंकों को खत्म कर रहा है. यही कारण है कि हम अपने अभियान के जरिए नहीं चुकाये जा रहे लोन के मुद्दे को तूल दे रहे हैं.

मौजूदा औद्योगिक स्थिति कितनी बुरी है ?

एक बिंदु तो यह है कि नहीं चुकाए जा रहे लोन के मामलों की संख्या खतरनाक रूप से बढ़ रही है. सरकार और आरबीआई के अनुसार, यह 6 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है. लेकिन अगर आप फिर से निर्धारित किया गया लोन लेते हैं, जो कि नहीं चुकाए जा रहे लोन ही हैं, लेकिन चुकाए जा रहे लोन के रूप में छिपे हुए हैं, तो यह आंकड़ा 13 लाख करोड़ रुपए से अधिक का होगा. यह स्वीकार करने लायक नहीं है और बैंक को पूरी तरह से कमजोर बना सकता है.

दूसरी बात कि नहीं चुकाए जा रहे लोन की अदायगी के लिए की जाने वाले कड़ी कार्रवाई के बजाय, प्रावधानों और रियायतों के जरिए नहीं चुकाए जा रहे लोन के स्तर को कम दिखाने का ये प्रयास है. वे दिखावटी योजनाओं के माध्यम से नहीं चुकाए जा रहे लोन को कम करने की कोशिश कर रहे हैं.

मामलों की मौजूदा स्थिति के लिए कौन दोषी ठहराया जा सकता है ?

बैंकिंग कारोबार में नहीं चुकाए जाने वाले लोन के मामलों को टाला नहीं जा सकता हैं, क्योंकि कुछ लोन चुकता होने वाले नहीं हो सकते हैं. लेकिन आजकल तो लोन लेकर और फिर उसे नहीं चुकाए जाने वाले लोन में बदल देना एक तरह की अजीब कला और पेशा बन गया है.

आखिर यह कैसे होता है कि आज दिया गया लोन 3 से 6 महीने के बाद नहीं चुकाया जा रहा लोन बन जाता है. ये समस्या मौजूदा नई-उदार आर्थिक नीतियों का उप-उत्पाद है. यह राजनीतिक अधिकारियों, लालची उद्योगपतियों और कुछ भ्रष्ट आला बैंकरों के बीच बढ़ती गठजोड़ का भी परिणाम है.

लेकिन नहीं चुकाए जाने वाले लोन के मामले से निपटने के लिए आरबीआई और सरकार दोनों ने कई कदम उठाए तो हैं ?

आरबीआई ने बार-बार योजनाएं बनाई हैं और उसकी घोषणाएं की हैं. लेकिन दुर्भाग्य से नहीं चुकाए जा रहे लोन की वसूली में इससे कोई मदद नहीं मिल पा रही है. डिफॉल्टरों को रियायतें देने और बैंकों के खाता-बही से इन नहीं चुकाए जा रहे लोन को हटाने के सभी उपाय हैं. जब तक कि बकायेदारों के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाए जाते हैं, तब तक लोन के पैसे वापस नहीं किए जा सकते.

नहीं चुकाए जा रहे लोन की समस्या से निपटने के लिए फिर क्या किया जाना चाहिए ?

ऐसा नहीं कि चुकता नहीं किए जाने वाले सभी लोन इसी श्रेणी में आते हैं. एनपीए (गैर निष्पादित परिसंपत्तियों) या नहीं चुकाए जा रहे लोन में कुछ ऐसे भी मामले हैं जो वास्तविक हैं. उधारकर्ता की वास्तविक समस्याओं के कारण भी कुछ लोन चुकता नहीं किए जाने वाली श्रेणी में आ गए हैं. इनमें शिक्षा लोन से जुड़े कई मामले भी शामिल हैं, क्योंकि नौकरियां उपलब्ध नहीं हैं.

इसी तरह, कृषि क्षेत्र में समस्या के चलते भी इस सेक्टर में चुकता नहीं किए जाने वाले लोन हैं. लेकिन व्यवस्था में नहीं चुकता किए जाने वाले लोन का कारण जानबूझकर किया गया कॉर्पोरेट गुनाह (सोची समझी गलती) है. वे बड़े कर्ज लेते हैं लेकिन जानबूझकर बकाया छोड़ जाते हैं. यहां तक कि आरबीआई ने इसे जान बूझकर बकाया रखने के रूप से परिभाषित किया है.

आम तौर पर लोन की देनदारी सिविल केस होती है. बैंक सिविल न्यायालयों में ही दोषी कंपनियों पर मामले दर्ज कराते हैं. यह सालों से हो रहा है. लेकिन, कंपनियां इसे लेकर ज़रा भी परवाह नहीं करती हैं.

क्या जानबूझकर बकाया नहीं चुकाने वालों के खिलाफ तत्काल कदम नहीं उठने चाहिए ?

हम सरकार से मांग करते रहे हैं कि जान बूझकर लोन नहीं चुकता करने वालों को अपराधी घोषित किया जाए. साथ ही इन कंपनियों के मालिकों और निदेशकों पर आपराधिक कार्रवाई की मांग भी हम लगातार करते रहे हैं. जिनके नाम प्रकाशित किए जा सकते हैं. उनके नाम क्यों छुपाये जा रहे हैं ?

आखिर सभी बैंक तो लोगों के पैसे से ही इन्हें लोन दे रहे हैं. फिर ऐसी सूची उनसे क्यों छिपाई जानी चाहिए? कम से कम संसद को सूचित किया जा सकता है. इसके अलावा वसूली कानून को ज्यादा धारदार बनाया जा सकता है. अधिक से अधिक डीआरटी (ऋण वसूली ट्राइब्यूनल) को स्थापित किया जाना चाहिए.

ऐसे लोग जिन्होंने लोन के रूप में बहुत बड़ी रकम ली है लेकिन उसे चुकता नहीं किया है ऐसे मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट भी शुरू किया जा सकता है. क्या कार्रवाई करने के इरादे में कुछ गड़बड़ी है ? किसी भी चीज से कहीं ज्यादा वसूली के लिए मजबूत इरादे की जरूरत है. लेकिन यहां तो लोगों के पैसे की कीमत पर लोन को ही माफ करने का विचार है.

किंगफिशर के मामले में आपकी क्या राय है ?

इसके (किंगफिशर मामले) लिए सरकार और आरबीआई को जिम्मेदार ठहराना चाहिए. सभी बोर्डों में आरबीआई और सरकार की तरफ से चुने हुए लोग होते हैं. लोन उनकी जानकारी में दिया जाता है. उन्हें सबकुछ पता होता है. देखिए, कहीं भी जरा भी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है. निचले स्तर पर, छोटे ब्रांच के मैनेजरों के सामने सभी तरह की परेशानियां हैं.

आखिर इतनी परेशानियां ऊपर बैठे लोगों के साथ क्यों नहीं है ? अगर हम बड़े लोन के लिए जिम्मेदारी के सिद्धांत में सख्ती लाते हैं, तो चीजें ठीक होनी शुरू हो सकती हैं. सरकार और आरबीआई अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं भाग सकते हैं.

नहीं चुकाये जाने वाले लोन के मामले में राजनीतिक-कॉर्पोरेट गठजोड़ की क्या भूमिका है ?

बहुत हद तक, यही गठजोड़ ही खास कारण है. हम तो चुनाव आयोग से मांग करते रहे हैं कि इन लोन डिफॉल्टरों को चुनाव लड़ने या मंत्री बनने से रोका जाए. इस फैसले से तो अभी दूरी ही बनाई जा रही है. डिफॉल्टरों को किसी सार्वजनिक पदों पर बैठने की इजाजत भी नहीं मिलनी चाहिए. रमेश जेली को पद्मश्री पुरस्कार दिया गया. वो ग्लोबल ट्रस्ट बैंक के पतन के लिए जिम्मेदार थे. उनसे पद्म पुरस्कार वापस क्यों नहीं लिया गया है ?

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