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जानिए क्यों आर्थिक रूप से व्यावहारिक है आयुष्मान भारत योजना

केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना की आर्थिक व्यवहार्यता (economic viability ) पर सवाल उठाए जा रहे हैं

Updated On: Sep 25, 2018 07:16 AM IST

Pankaj Kumar Pankaj Kumar

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जानिए क्यों आर्थिक रूप से व्यावहारिक है आयुष्मान भारत योजना

प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की शुरुआत हो चुकी है. इस योजना के तहत देश के 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा देने की योजना है, जिससे 66 लाख परिवारों को हर साल गरीबी रेखा के नीचे जाने से बचाया जा सकेगा. सरकार द्वारा प्रायोजित ये विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना है, जिसकी सफलता को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं लेकिन इस बीमा के अंतर्गत 1300 बीमारियों का इलाज संभव होगा. ऐसा सरकारी तंत्र का दावा है. प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के मुताबिक गरीबों के लिए सरकारी से लेकर निजी अस्पताल तक इलाज की व्यवस्था होगी जो कि पुरी तरह कैशलेस होगी. जाहिर है अगर ये सरकारी दावा हकीकत में बदलता है तो भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली पूरी तरह बदल जाएगी.

नीति आयोग के मुताबिक भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का महज 1.3 फीसदी ही स्वास्थ्य पर खर्च करता है. जबकि चीन 2.45 फीसदी खर्च करता है और श्रीलंका मलेशिया और थाइलैंड भी स्वास्थ्य पर भारत की तुलना में सकल घरेलू उत्पाद का दोगुना से ज्यादा खर्च करते हैं. ऐसे में गांव और शहर की अच्छी खासी आबादी को मजबूरीवश अपने घरेलु बजट में कटौती कर इलाज कराना पड़ता है और उन्हें अच्छी-खासी रकम उधार लेनी पड़ती है.

गांव में ये आबादी 24.9 फीसदी है वहीं शहर में 18 फीसदी लोगों को उधार लेकर इलाज के मुहाने तक पहुंचने का मौका मिल पाता है. जाहिर है बीमारी की मार से गरीबी की चपेट में जाने से रोकने में प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना काफी कारगर मानी जा रही है. नमो केयर और मोदी केयर से विख्यात हो चुकी प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना देश के जन-जन तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचा सकेगी, ऐसा सरकारी तंत्र का दावा है.

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इसके तहत डेढ़ लाख प्राइमरी हेल्थ सेंटर खोले जाने की योजना है. साथ ही जिले स्तर के अस्पताल से लेकर गांव तक के प्राइमरी हेल्थ सेंटर को उन्नत बनाए जाने का प्रावधान भी है. इस योजना के अंतर्गत प्राइमरी हेल्थ सेंटर जिला अस्पताल से डिजिटल सेवा के जरिए जुड़े होंगे और आवश्यक सेवाएं और दवा मुहैया कराना इनकी जिम्मेदारी होगी. योग और आयुर्वेद से भी इलाज कराना संभव हो सकेगा और इसकी पूरी जिम्मेदारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसी और राज्य स्वास्थ्य एजेंसी पर होगी जो कि स्वास्थ्य की देखभाल में सेवाओं की लागत भी तय कर सकेंगे.

नीति आयोग में सलाहकार के तौर पर कार्यरत आईएएस आलोक कुमार कहते है, 'सरकार अपने लोगों के लिए सेवा चाहती है और इसे दे पाने में जो सक्षम होगा उसे सरकारी तय रेट के हिसाब से उसकी कीमत दी जाएगी. इसमें प्राइवेट और सरकारी अस्पताल दोनों शामिल हैं.'

इस योजना की आर्थिक व्यवहार्यता (economic viability) को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं. जिन्हें सरकारी तंत्र पूरी तरह से नकारता है. नीति आयोग इसे सिरे से खारिज करते हुए कहता है कि आर्थिक व्यवहार्यता पूरी तरह संभव है और इस पर सवाल उठाना तथ्यों से परे है.

नीति आयोग के मुताबिक भारत में हॉस्पिटलाइजेशन रेट 1 से 1.5 फीसदी है और योजना में शामिल 50 करोड़ लोगों के हिसाब से इसके 1 फीसदी लोगों को हॉस्पिटल जाना पड़ा तो इनकी संख्या 50 लाख होगी या फिर डेढ़ फिसदी लोग अस्पताल में एडमिट हुए तो उनकी कुल संख्या 75 लाख होगी. सरकार ने 5 लाख रूपए का बीमा प्रति फैमिली लगभग 10 करोड़ परिवार को दिया है. वैसे इनकी संख्या कहीं ज्यादा है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1082 रु प्रति परिवार प्रीमियम का खर्च आएगा और 10 करोड़ परिवार पर ये खर्च लगभग 10 हजार करोड़ के आसपास होगा. इस योजना के मुताबिक कुल अनुमानित राशि का 60 फीसदी केंद्र व्यय करेगा. वहीं 40 फीसदी राशि राज्य सरकार को वहन करना होगा.

नीति आयोग के मुताबिक इस योजना के कार्यान्वयन के बाद अगर अस्पताल जाने वालों की संख्या दोगुनी भी हुई तो कुल खर्च की जाने वाली राशि 20 हजार करोड़ से ज्यादा नहीं होगी और इसे केंद्र और राज्य की सरकारें आसानी से वहन करने में सक्षम हैं.

वैसे इस बीमा से लाभान्वित कौन लोग होंगे इसका फैसला राज्य सरकार पर छोड़ा गया है लेकिन सोशियो इकॉनोमिक कास्ट सेंशस (SECC) के मुताबिक deprivation no 1,2,3,4,5 और 7 के तहत जो लोग नामित हैं, उनका इस योजना का लाभकारी होना तय है और देश में इनकी कुल संख्या 10.74 करोड़ परिवार है.

वैसे राज्य सरकार और किन-किन लोगों को इस योजना का लाभार्थी बनाएगी, ये उस पर निर्भर करता है. छत्तीसगढ़ अपनी जनसंख्या का कुल आबादी को आयुष्मान भारत का लाभकारी बनाएगा. वहीं आंध्रप्रदेश 85 फीसदी लोगों को मोदी केयर के तहत लाएगा. जबकि राजस्थान भी 75 फीसदी लोगों को प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत नामित कर चुका है. जाहिर है राज्य सरकार एसइसीसी के अलावा जिन्हें इस बीमा और योजना के लिए उपयुक्त समझती है उन्हें नामित कर इस योजना का लाभ देगी.

सरकार अस्पताल को सीजीएचएस से तय किए हुए रेट से 15 फीसदी कम रेट देगी. सीजीएचएस में प्राइवेट वार्ड का प्रावधान है और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में जनरल वार्ड का. हां, जो अस्पताल एनएबीएचएल से मान्यता प्राप्त होंगे, उन्हें 10 फीसदी ज्यादा राशि दी जाएगी. दरअसल एनएबीएचएल से मान्यता प्राप्त लैब रिपोर्ट की मान्यता दुनियाभर में हैं और इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता देश ही नहीं विदेशों में भी है. इतना ही नहीं सरकार रिमोर्ट एरियाज में अस्पताल खोलने को बढ़ावा देने के लिए तय राशि से 10 फीसदी ज्यादा देगी.

नीति आयोग के मुताबिक आर्थिक व्यवहारिकता पर सवाल करना बेमानी है. उनके मुताबिक, 'रेट्स तय वही हुए हैं, जो तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में चल रहे हैं. बड़ा चैलेंज कीमत से ज्यादा समय पर पैसे देने का है. और लो वॉल्यूम हाई मार्जिन बिजनेस से हाई वॉल्यूम लो मार्जिन पर स्वीच ओवर करने का है. य़े जिसने कर लिया उसका सफल होना तय है.'

PM Modi Ayushman Bharat

नीति आयोग इस बात पर भी जोर दे रहा है कि प्राइवेट अस्पताल जेनरल वार्ड खोलें और सरकार उसे समय पर भुगतान कर दे. ये दोनों काम ठीक से हो गया तो लोगों और प्राइवेट प्लेयर्स को कोई दिक्कत आने वाली नहीं है. ध्यान देने वाली बात यह है कि तमिलनाडु और महाराष्ट्र को छोड़कर सभी राज्यों इसको लेकर ट्रस्ट बना रहे हैं. जाहिर है सरकार सर्विस चाहती है, जो उसके लोगों को मिले. बाकी ये सर्विस सरकारी अस्पताल देगा या प्राइवेट इससे सरकार को लेना देना नहीं हैं.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्राइवेट अस्पतालों में 25 फीसदी डॉक्टर कार्यरत हैं. वहीं सरकारी अस्पताल में 75 फीसदी कार्यरत हैं. ऐसे में सरकार मानती है कि प्राइवेट प्लेयर्स को इग्नोर करना अपने लोगों को स्वास्थ्य सेवा से वंचित करना है.

प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत सारे सरकारी इंस्टीच्यूट जुड़े हैं. ऐसे में वहां इलाज कराना और आसान होगा. केरल में इस तरह कई अस्पतालों का कायाकल्प हो चुका है. जाहिर है सरकार का पूरा फोकस बेहतर सर्विस पर है. और इसे जो मुहैया कराएगा सरकार उसे तय रेट के हिसाब से पैसे मुहैया कराएगी.

सरकार मानती है कि विश्व में दोनों तरह के मॉडल सफल हैं. कनाडा, जर्मनी और निदरलैंड में स्वास्थ्य सेवा लगभग प्राइवेट लोगों के हाथों में है जो पूरी तरह सफल है. ऐसे में प्राइवेट प्लेयर्स पर अविश्वास करना जनता को समुचित लाभ से वंचित करने जैसा होगा.

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