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अयोध्या: हनुमान गढ़ी की मदद से बन रही है जर्जर मस्जिद

ऐसा लग रहा है कि जो 70 साल में नहीं हुआ, वो अगले 7 महीनों में हो जाएगा

Nazim Naqvi Updated On: Feb 14, 2018 04:44 PM IST

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अयोध्या: हनुमान गढ़ी की मदद से बन रही है जर्जर मस्जिद

अयोध्या में फिर हलचल है. अदालत तैयार बैठी है. अदालत के बाहर लोगों ने कमर कसनी शुरू कर दी है. कानून से, समझौते से, मुहब्बत से या धमकी से, बस हर पक्ष नतीजा चाहता है. इनमें से कोई जीत भी जाए लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अयोध्या हारेगी नहीं.

रामलला की बात थोड़ी देर बाद. पहले मस्जिद की सुन लीजिए. अयोध्या की ज़मीन पर एक मस्जिद फिर से तामीर हो रही है. सैकड़ों साल पुरानी ये मस्जिद बुजुर्गियत की दहलीज पार कर जर्जर नहीं बल्कि जरजरा चुकी थी. 92 की तरह इसे ढहाने की भी जरूरत नहीं थी. यह खुद ही कभी भी ढह जाती. अयोध्या प्रशासन की नज़र पड़ी. कोई बवाल न हो, बाल की खाल न हो, लिहाज़ा प्रशासन ने दो टूक शब्दों में कहा ‘या तो मस्जिद को संभाल लो या फिर हमें मजबूरन इसे ढहाना पड़ेगा, क्योंकि इससे आपके नमाजियों को ख़तरा है’. अब दिक्कत यह थी कि इस मस्जिद की मिलकियत किसी मुसलमान के पास नहीं बल्कि हिन्दू के पास थी. कागज़ पर मस्जिद का असली मालिक ‘हनुमान-गढ़ी’ था, और बिना मालिक की इजाज़त के मस्जिद की तामीर नामुमकिन थी.

जगदंबाशरण तिवारी

जगदंबाशरण तिवारी

अयोध्या के मुसलमान अपनी समस्या लेकर हनुमान गढ़ी के महंत के पास पहुंचे. महंत ने फ़रियाद सुनते ही, बिना कोई वक्त गवांए कहा, जाइए मस्जिद का जीर्णोद्धार कीजिये. पहली अड़चन ख़त्म हो चुकी थी. मुसलामानों ने मस्जिद की मरम्मत की तैयारी शुरू कर दी, पर पहली सीमेंट की बोरी लाने के बाद ही वे जान चुके थे कि चंद मुस्लिम घरों की मदद से मस्जिद की तामीर मुश्किल है.

अपनो ने लटकाए रखा

बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि ने अयोध्या के कई हिन्दू मुसलमानों को मशहूर कर दिया है. इन्हीं में से एक, बाबू खान ने, अपनी मकबूलियत का सहारा लेकर और स्थानीय मीडिया के चंद दोस्तों की मदद से यह मसला बड़े-बड़े मुस्लिम नेताओं और सूरमाओं तक पहुंचाया. बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी से लेकर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तक सबने उन्हें सुना, मुस्लिम नेताओं ने भी जाकर अमीर मुसलामानों के कानों तक यह बात पहुंचाई. डेढ़ साल बीत गए पर यह मस्जिद आज भी अयोध्या के बाहर से एक अदद सीमेंट की बोरी का इन्तेजार कर रही है.

माफ़ कीजियेगा आपको बताना तो भूल ही गया कि ‘शाह आलम मस्जिद’ के नाम से जानी जाने वाली यह मस्जिद, ढह चुकी बाबरी मस्जिद से भी पुरानी है और उस विवादित स्थल से फकत दो किलोमीटर के दूरी पर है.

बाबू खान

बाबू खान

खुदा ने बेशक न किया हो लेकिन खुदा के बंदों ने मस्जिद-मस्जिद में फर्क कर डाला. क्या करें? इनकी भी मजबूरी है साहब. बाबरी मस्जिद से इनकी दुकानें चलती हैं और ‘मस्जिद शाह आलम’ की दुकान अभी खुली नहीं है. यकीन मानिए अगर शाह आलम मस्जिद का दर्जा भी बाबरी मस्जिद के समान होता तो एक अदद सीमेंट की बोरी क्या, यही लोग यहां सीमेंट की फैक्ट्री तक लगाने आ जाते.

जो नहीं है उसके लिए आसमां सर पर उठा रखा है, जो है, उसकी तरफ देखना भी गवारा नहीं. यह अयोध्या का वह सच है जिसे जानने के बाद हिन्दुस्तान का कोई भी मुसलमान जान जाएगा कि बाबरी मस्जिद का मुद्दा उनके सामने हमेशा जिंदा और गरम क्यों रखा जाता है? वाह री सियासत, वाह रे मुस्लिम नेता, वाह रे मुस्लिम उलेमा, वाह रे मौलवी...

26 साल बाद भी बेहाल

शाह आलम मस्जिद, अयोध्या

शाह आलम मस्जिद, अयोध्या

छब्बीसवां साल लग चुका है, 92 को बीते. इन 26 बरसों में कदम की तो छोड़िये, उस जमीन की तरफ नजर उठाने की भी किसी को इजाज़त नहीं है, जिसे विवादित-स्थल कहा जाता है. एक कड़वा सच सुनियेगा? 26 बरसों से बाबरी-मस्जिद मलबों की निशानी में जिंदा है और राम-लला एक छोटे से तंबू में... ये मलबा और ये तंबू... यही अयोध्या की पिछले 26 वर्षों की कमाई है. बिजली गायब, बेतरतीब सड़कें, खंडहरों में तब्दील होते मकान, बेरोजगार नौजवान, गरीबी, मुफलिसी, बस यही है अयोध्या.

जितनी बार भी अयोध्या आ जाइए, आपको वह एक सी ही लगेगी. एक फटा हुआ टायर जो पिछले दिसंबर में, सड़क किनारे पड़ा था, उससे इस बार फिर वहीँ मुलाक़ात हो गई. वही गिने-चुने चेहरे, वैसी ही उनकी बातें, वही राम-लला, वही बाबरी-मस्जिद, वही झगड़ा, वही सुलह की बातें, समय-समय पर (मौका देखकर) वैसे ही बाहरी लोगों का आना, मीडिया का जमावड़ा, कुछ भी नहीं बदला.

हां, बोलने वालों की उम्र और उनके चेहरे थोड़े-थोड़े जरूर बदलते जा रहे हैं. जो लोग लगातार बोले और मौका चुन-चुन कर बोले वो कहीं से कहीं पहुंच गए. इसी बोलने ने कईयों को देखते ही देखते लखपति, करोड़पति बना दिया. कईयों की हमेशा चलने वाली दुकानें खोल दीं और कुछ को तो सीधे संसद भवन तक पहुंचा दिया.

अयोध्या के किसी भी महंत के पास थोड़ी देर बैठ जाइये. ऐसे तमाम लोगों के नाम उनकी ज़बान पर रटे पड़े हैं. उन्हें याद है कि 92 के बाद विनय कटियार पहली बार जब अयोध्या आए तो चप्पल में थे इसके बाद वो जैसे-जैसे आते गए, कटियार से कटार बनते गए.

अब एक बार फिर अयोध्या, एपी सेंटर है. सरगोशियां हो रही हैं कि इस बार जो भी हो रहा है वह 19 के चुनाव के लिए है. दलील देने वाले दलील दे रहे हैं कि दिल्ली से लेकर यूपी तक अपनी ही सरकार है... मंदिर अब नहीं तो कब? 19 में क्या बहाना लेकर चुनाव में जायेंगे? बस इसलिए हलचल तेज़ है.

फार्मूले पर फार्मूला सामने आ रहा है. त्याग और कुर्बानी की बातें हो रही हैं. ऐसा लग रहा है कि जो 70 साल में नहीं हुआ, वो अगले 7 महीनों में हो जाएगा. पर क्या ऐसा सचमुच हो जाएगा? यह शक इसलिए कि जब भी सुलह की ऐसी कोई भी पहल होती है तो उससे ज्यादा विरोध के स्वर गूंजने लगते हैं.

रामजन्मभूमि का विवादित स्थल

रामजन्मभूमि का विवादित स्थल

मुसलामानों की तरफ से एक धड़े की राय है कि त्याग करते हुए राम-मंदिर बनने देना चाहिए. बदले में अयोध्या में कहीं भी एक मस्जिद और एक युनिवर्सिटी दे दें. दूसरी पेशकश आई कि राम-मंदिर तो बना लें पर जहां बाबरी मस्जिद थी, जमीन के उतने हिस्से को खाली छोड़ दें. पेशकश की इस झड़ी में कुछ लोगों ने यह भी सलाह दी कि इलाहाबाद हाई-कोर्ट के फैसले को ही आखरी मान लिया जाय तो कुछ का कहना है कि मसला अयोध्या का है इसलिए अयोध्या के लोगों पर ही फैसला छोड़ दिया जाय.

लेकिन सुलह के इन सारे सुझावों से हटकर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अब भी अपने पुराने स्टैंड पर अड़ा हुआ है कि अब तो जो भी फैसला होना होगा, वह सुप्रीम-कोर्ट ही करेगा. इस पूरे मामले में जहां तक बात बाबरी मस्जिद के पक्षकार हाशिम अंसारी के बेटे इकबाल अंसारी की है तो उसे कोई फैसला लेने देना ही नहीं चाहता, लिहाज़ा हार कर वह भी सुप्रीम-कोर्ट के ही फैसले का इंतज़ार कर रहे हैं.

अब इधर इतनी अड़चनें हैं तो उधर भी मामला आसान नहीं है. अयोध्या के अन्दर ही सुलह-सफ़ाई को लेकर कई खेमें हैं और अयोध्या के बाहर के तो कहने ही क्या. हां, मगर एक बात तो साफ़ है कि इन खेमों को इशारा लखनऊ और दिल्ली से ही मिलता है. अगर अपने स्तर पर ये कोई पहल कर भी लें तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाता क्योंकि नेता कभी मानेंगे नहीं. कुल मिलाकर हलचल तो है पर हल निकल आए, वह भी कोर्ट के बाहर, ऐसी उम्मीद नहीं.

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