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बाबरी विध्वंस : वर्तमान को हरा-भरा रखने के लिए अतीत के घावों को समझना पड़ता है

इसमें कोई शक नहीं कि इतिहास के कुछ प्रसंगों को दबाने का ज्यादातर काम नेहरूवादी तर्ज की धर्मनिरपेक्षता की चौहद्दी में वामपंथी इतिहासकारों ने किया

Sreemoy Talukdar Updated On: Dec 07, 2017 06:44 PM IST

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बाबरी विध्वंस : वर्तमान को हरा-भरा रखने के लिए अतीत के घावों को समझना पड़ता है

मौजूदा वक्त के मायने जानने के लिए अक्सर हमें अतीत की तरफ गहरी नजर डालनी पड़ती है. बाबरी मस्जिद का विध्वंस कई वजहों से आधुनिक भारत के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ है और इस घटना की 25वीं बरसी पर उन भावनाओं को परखना ठीक होगा जिनके नतीजे में एक मस्जिद ढहाई हुई. जरूरी हो सकता है यह खोजना कि सुदूर अतीत का लंबे वक्त से दबा चला आ रहा भावनाओं का ज्वार कैसे हमारे आज की सियासी सच्चाइयों को शक्ल दे रहा है.

जो इतिहास की विधा के पारंगत नहीं या फिर जो जानते-बूझते सच्चाइयों को मानने से इनकार करते हैं उनका ख्याल कर कहा जा सकता है कि सोलहवीं सदी की वह मस्जिद सांप्रदायिक स्वेच्छाचार का शिकार हुई और इस घटना ने भारत में धर्मनिरपेक्षता की रीढ़ तोड़कर एक ऐसे भूत को खुला घूमने के लिए छुट्टा छोड़ दिया जिसे अब वापस उसकी डाल पर नहीं बैठाया जा सकता. यही वो एकमात्र पाठ है जिसे वजूद में रहने की इजाजत दी गई है और इस पाठ का अर्थ एक ऐसे क्षण से जुड़ा है जिसे बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच करार दिया जाता है.

किसी भी चर्चा की शुरुआती बिंदु यही होता है— एक ऐसा सिद्ध सच जिसे बुनियाद बनाकर भविष्य की सारी बहसों की तामीर की जानी है.

सच्चाई के साथ दिक्कत ये है कि उसके बहुत सारे पहलू होते हैं. कभी-कभी सच्चाई के ये अलग-अलग पहलू आपस में टकरा भी जाते हैं और जब भी ऐसा होता है सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग जारी बहस को मनमाना रूप देने के लिए सच्चाई के कुछ हिस्से को अपने चेतना के रसातल में छुपा देते हैं ताकि घटनाओं के बारे में गढ़ी जाने वाली कहानी उनके मन के माफिक जान पड़े.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

छुपा दी गई सच्चाइयां अलग-अलग रूप धरकर सामने आती हैं, वे अपने को एकदम अप्रत्याशित तरीके से जाहिर करती हैं और उनमें प्रतिशोध का भाव भरा हो सकता है और जो राष्ट्र सच्चाई के इन टुकड़ों से ईमानदारी का बर्ताव नहीं करता उसे आखिर को भारी कीमत चुकानी पड़ती है.

अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 के दिन विध्वंस का शिकार हुई मस्जिद को वक्त के किसी बिचले बिंदु से देखना भ्रामक और गलत होगा.

यह ऐसी घटना नहीं थी जिसका कोई संदर्भ ही ना हो और यह बात भी नहीं कह सकते कि इस घटना का आरंभ और अंत बीजेपी के मस्जिद के विध्वंस को बुनियाद बनाकर सत्ता पाने की महत्वाकांक्षा तक सीमित है.

इन सियासी भावनाओं को नकारा नहीं जा सकता और शायद बीजेपी भी इससे इनकार नहीं करे. लेकिन अगर बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर हम एक बड़े फलक पर बहस करना चाहते हैं, बहस को संतुलित रूप देना चाहते हैं तो ऐसा कर पाना तब तक असंभव है जबतक हम अपने से ये ना पूछ लें कि आखिर ऐसी क्या बात है जो तकरीबन ढाई दशक बाद भी यह मुद्दा प्रासंगिक बना हुआ है और हमारी सियासी बहसों को एक खास शक्ल में ढाल रहा है.

बाबरी मस्जिद के विध्वंस से जुड़ी कोई भी बहस तभी उपयोगी हो पाएगी जब वह विचारों की उस हदबंदी को तोड़े जिसके भीतर मानकर चला जाता है कि मस्जिद का गिराया जाना एक शैतानी काम था और इस काम को धुर दक्षिणपंथी तथा पुनरुत्थानवादी कार्यक्रम के तहत भारत की मिली-जुली संस्कृति के विचार के विरुद्ध अंजाम दिया गया. दरअसल विचार की यही हदबंदी है जो हम बाबरी मस्जिद के विध्वंस की चर्चा करते हुए गोल-गोल घूमते रह जाते हैं, किसी मंजिल तक नहीं पहुंचते.

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इतिहास में दर्ज हो चुकी उस तारीख को जब कारसेवक नारे उछाल रहे थे कि ‘एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो’ तो वे सिर्फ अपने समय के सियासी भावनाओं भर को आवाज नहीं दे रहे थे, दरअसल उनकी आवाज में दबा दिए गए इतिहास का क्रोध बोल रहा था, ऐसा इतिहास जिसे अपने को जाहिर करने की इजाजत नहीं मिली. भावना बहुत गहरी और मजबूत थी, उसके भीतर छिपी प्रेरणा से निबटना आसान नहीं और ऐसी भावनाओं का उभार जिस बिंदु से होता है वहां राजनीति में प्रचलित अच्छे-बुरे की परिभाषाएं दम तोड़ देती हैं.

जिन चंद लेखकों और चिंतकों ने  साहस दिखाते हुए अलिखित इतिहास के प्रसंग पर रोशनी डालने की कोशिश की है उन्हें एक खास लकब जड़ते हुए बड़े जाहिर से खेमे में डाल दिया गया है, चाहे अपने क्षेत्र में उन्होंने उपलब्धियों के जो भी कीर्तिमान बनाए हों.

vs naipaul

वीएस नॉयपाल ( रायटर इमेज)

मिसाल के लिए इतिहासकारों ने नोबेल पुरस्कार विजेता वी.एस नायपाल को हिंदू सभ्यता के इतिहास के बारे में उनके ख्याल के कारण बीजेपी के हमदर्दों की श्रेणी मे डाल रखा है. लेखक और पत्रकार स्वर्गीय खुशवंत सिंह के साथ अपनी बातचीत में वीएस नॉयपाल ने एक दफे मस्जिद गिराने की घटना के बारे में कहा था कि यह इतिहास में संतुलन पैदा करने वाला काम है. इसके बरक्स खुशवंत सिंह के विचार बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर चली आ रही लीक पर थे. सोच की इस लीक के मुताबिक बाबरी मस्जिद का विध्वंस बीजेपी की फैलाई सांप्रदायिकता का नतीजा है.

नॉयपाल और खुशवंत सिंह के बीच बातचीत 17 साल पहले मई महीने में हुई थी और आउटलुक पत्रिका में इसका प्रकाशन हुआ था. सर विद्या ने खुशवंत सिंह से कहा ‘हिन्दू पुनरुत्थानवादी विध्वसंक सोच के मामले में इस्लामी कट्टरपंथियों की नकल कर रहे हैं और विध्वंस की सोच बदले की भावना से प्रेरित है क्योंकि अयोध्या में बाबर की बनाई मस्जिद को हिकारत की नजर से देखा जाता था. बाबर कोई भारत प्रेमी नहीं था. मुझे लगता है यह बात सभी मानते हैं कि बाबर को भारत, भारत के लोग और उनके धर्म से नफरत थी.’

अब इसे भड़काने की नीयत से दिया जाने वाला सतही बयान नहीं मान सकते. वीएस नॉयपाल की प्रसिद्धि अंग्रेजी के जीवित महानतम साहित्यकारों में है. खुशवंत सिंह से हुई चर्चा से पहले त्रिनिडाड में रहने वाले इस महान साहित्यकार ने आउटलुक के पत्रकार तरुण तेजपाल से अपनी बात को विस्तार से समझाते हुए कहा था कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने बड़े पैमाने पर हिंदू धर्म और संस्कृति का नाश किया.

यह इतिहास दर्ज तो नहीं हुआ लेकिन इसे भुलाया नहीं जा सका और इससे हिंदू धर्म के भीतर पुनरुत्थानवादी सोच का जन्म हुआ. उन्होंने इस विचार का खंडन किया था कि मुस्लिम आक्रमण से संस्कृतियों का मेल हुआ और उसमें समृद्धि आई, 'इतिहास और कला की किताबों में लोग तो यों लिखते हैं मानो मुस्लिम भारत में किसी टूरिस्ट बस पर चढ़कर आए हों और आकर फिर से चले गए हों.'

वीएस नॉयपाल की सोच इतिहास के मूल और स्रोत ग्रंथ मानी जाने वाली रचनाओं पर आधारित है, जैसे कि मोरक्कोवासी 14 वीं सदी के यात्री इब्नबतूता की चचनामा जिसमें अरब आक्रमणकारियों की सिंध-विजय का जिक्र है या फिर इस श्रेणी में फ्रेंच यात्री बर्नियर का नाम ले सकते हैं जो शाहजहां के वक्त में भारत आया था.

नॉयपाल ऐसे मूल ग्रंथों के पाठ के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मध्यकाल के भारत का मुसलमानी ब्यौरा कहीं ज्यादा सच्चा है बनिस्बत साफ-सुथरा बना कर परोसे गए उस इतिहास के जिस पर हमें विश्वास करना सिखाया जाता है.

तरुण तेजपाल से साक्षात्कार में नॉयपाल ने कहा, 'अपनी भारत विजय के बारे में मुसलमानों का ब्यौरा कहीं ज्यादा सच्चा है. उसमें इस्लाम की जीत, देवमूर्तियों और मंदिरों के विध्वंस, लूट और स्थानीय लोगों को गुलाम बनाने की बात लिखी है. ये लोग तादाद में इतने ज्यादा और कीमत में इतने सस्ते थे कि उन्हें चंद रुपयों की खातिर बेच दिया जाता था. उत्तर भारत में हिंदू स्मारकों का अभाव है, यह अपने आप में काफी विश्वसनीय प्रमाण है..इस वक्त का कोई हिंदू दस्तावेज नहीं है. हारे हुए लोग कभी अपना इतिहास नहीं लिखते, इतिहास तो विजेता लिखते हैं.'

उन्होंने विजयनगर साम्राज्य के विध्वंस (1565 ईस्वी) और अकबर के 1592 के ओडिशा विजय का उदाहरण देते हुए एक ज्यादा बड़े, ज्यादा दुखद और कहीं ज्यादा जानकारी से भरे विषय पर बातें रखीं. यह विषय हिंदू भारत के ढहने की बात बताता है.'

william dalrymple

विलियम डेरिम्पल

साल 2004 में आउटलुक में लिखे अपने लेख में भारत में जन्मे ब्रिटिश नाटककार फारुख धोंडी ने इतिहासकार विलियम डेरिम्पल को खरी-खोटी सुनाई. डेरिम्पल ने वीएस नॉयपाल के इतिहासकार होने पर सवाल उठाए थे. उन्होंने ध्यान दिलाया कि डेरिम्पल के उलट वीएस नॉयपाल ने अपनी बात मूल ग्रंथों के आधार पर कही है. धोंडी ने लिखा, 'नॉयपाल ने मूल ग्रंथों के आधार पर इतिहास लिखा है. जो प्रमाण बचे रह गए हैं उसी के आधार पर अपनी बात लिखी है.'

नॉयपाल की 2004 में बीजेपी के पदाधिकारियों के साथ मुलाकात हुई थी. कहा जाता है कि वे कांग्रेस के पदाधिकारियों से भी मिलना चाहते थे लेकिन उन्हें ऐसा कोई निमंत्रण नहीं मिला. बीजेपी के पदाधिकारियों के साथ हुई बैठक में धोंडी भी शामिल थे और आउटलुक के लेख में उन्होंने बाबर को लेकर नॉयपाल के विचारों के बारे में लिखा-

'नॉयपाल यह नहीं कह रहे कि अकेले बाबर ने ही हिंदू सभ्यता का विनाश कर दिया.. बैठक में तथा अन्य जगहों पर नॉयपाल ने 16 वीं सदी के उस आक्रमण के बारे में जो कुछ कहा है उसके बारे में बड़ी गलत खबर उड़ाई गई है. नॉयपाल ने कहा कि अयोध्या हिंदुओं के लिए क्या मायने रखती है यह बात बाबर जानता था. उसने अपने घमंड और विध्वंस के मजहबी जोश में उस जगह पर मस्जिद बनवाई जिसको लेकर लोगों में कथा चली आ रही थी.'

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यही बात हमें अंग्रेजी चाल-ढाल में रम चुके प्रसिद्ध बंगाली लेखक स्वर्गीय नीरद सी चौधरी के लेखन में मिलती है. वे प्रकांड विद्वान और लेखक थे. बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बारे में उन्होंने लिखा: अयोध्या में मस्जिद गिराए जाने पर मुसलमानों को शिकायक का जरा भी हक नहीं. साल 1000 से काठियावाड़ से लेकर बिहार तक, हिमालय से लेकर विंध्याचल तक हरेक मंदिर को गिराया गया, उसे अपवित्र किया गया.'

नीरद सी चौधरी ने बेलाग-लपेट के अपनी बात कही थी लेकिन उनकी बात की काट में कहा गया कि बूढ़े होने के साथ उनकी बुद्धि कुंद पड़ गई है. धोंडी के मुताबिक लूट और विध्वंस ने सभ्यता को घाव दिए, उसका मस्तक काट लिया और विकास अवरुद्ध हो गया. इस लूट और विनाश को छुपाने के लिए इतिहास के कुछ हिस्से को दबाकर रखना पड़ता है और दबाकर रखा हुआ इतिहास क्रोध को जन्म देता है. यह क्रोध अपने को कई रूपों में जाहिर करता है, क्रोध की ऐसी अभिव्यक्ति में कोई तारतम्य नहीं होता. वह बॉलीवुड की किसी फिल्म के खिलाफ भी उभरकर सामने आ सकता है.

क्रोध और बदले की यह भावना अपना इतिहास अपने चुने हुए शब्दों में लिखना चाहती है और पद्मावती फिल्म ऐसी ही भावनाओं का शिकार हुई. क्या इससे विध्वंस का एक और सिलसिला शुरू होगा ? नॉयपाल का ख्याल है कि ऐसा नहीं होगा. उन्होंने भारत को अपने लेखन में एक घायल सभ्यता करार दिया है और तरुण तेजपाल से कहा था कि हिंदू पुनरुत्थान इतिहास को दुरुस्त करने का जरूरी प्रयास है.

इसमें कोई शक नहीं कि इतिहास के कुछ प्रसंगों को दबाने का ज्यादातर काम नेहरूवादी तर्ज की धर्मनिरपेक्षता की चौहद्दी में वामपंथी इतिहासकारों ने किया और ऐसा करने के पीछे सांप्रदायिक सौहार्द्र का ऊंचा उद्देश्य काम कर रहा था. लेकिन बाद की घटनाओं ने हमें यही सबक दिया है कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ अच्छी नहीं होती. वर्तमान को हरा-भरा रखने के लिए अतीत के घावों को देखना-समझना पड़ता है.

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