live
S M L

70-80 चरणों से गुजरने के बावजूद क्यों हो जाते हैं रक्षा घोटाले?

अगर कहीं घोटाला हुआ है तो उसके लिए पूरा तंत्र जिम्मेदार है.

Updated On: Dec 11, 2016 10:58 AM IST

Prakash Nanda

0
70-80 चरणों से गुजरने के बावजूद क्यों हो जाते हैं रक्षा घोटाले?

अगस्ता-वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीद घोटाले में शामिल होने के आरोप में पूर्व एयरफोर्स चीफ एस पी त्यागी की सीबीआई द्वारा गिरफ्तारी एक असामान्य मामला है. 2010 में वीवीआईपी हेलिकॉप्टरों की खरीद के सौदे (एडब्ल्यू-101 डील) में 3,700 करोड़ रुपये का घोटाला होने का शक है. सीबीआई शायद मान रही है कि रिटायर्ड एयर चीफ मार्शल ने 12 हेलिकॉप्टरों की खरीद के फैसले को प्रभावित किया. ये हेलिकॉप्टर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति समेत देश के प्रमुख नेताओं के लिए इस्तेमाल होने थे.

माना जा रहा है कि इस प्रक्रिया में त्यागी और उनके चचेरे भाइयों को मोटी रकम मिली है. त्यागी के चचेरे भाई हथियारों के जाने-माने बिचौलिए हैं. हालांकि पूर्व वायुसेना प्रमुख ने हमेशा से ही इस मामले में अपनी भूमिका से इनकार किया है. 2013 में यूपीए सरकार ने इस घोटाले की सच्चाई सामने लाने के लिए जब से सीबीआई को जांच की जिम्मेदारी सौंपी है, तब से ही त्यागी इसमें अपनी संलिप्तता से इनकार कर रहे हैं.

फोटो. विकीमीडिया

एसपी त्यागी.

सीबीआई जांच से कुछ हाथ लगेगा?

मेरे विचार से यह पूरा मामला दो अहम बिंदु सामने लाता है. रक्षा खरीदारी से जुड़े मामलों में मजबूत केस पेश करने का सीबीआई का रिकॉर्ड और रक्षा उपकरणों की खरीदारी की प्रक्रिया, जिसमें लॉबिंग का रोल भी शामिल है.

हालांकि अब तक रक्षा घोटालों के खुलासे में सीबीआई का रिकॉर्ड निराशाजनक ही रहा है. इस तरह के घोटालों में ऐसा कोई केस नहीं, जिसे सीबीआई हल कर पाई हो. हम सब जानते हैं कि किस तरह से यूपीए सरकार ने सीबीआई को अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में रक्षा सौदों की जांच करने के लिए कहा था. वैसे इन जांच में कुछ भी निकलकर नहीं आया लेकिन इससे कई अधिकारियों की साख को गहरी चोट पहुंची.

उम्मीद है कि ऐसा पूर्व वायुसेना प्रमुख के साथ नहीं होगा. अगर वह आखिर में दोषी पाए जाते हैं, तो उनके लिए आंसू बहाने वाला कोई नहीं होगा. लेकिन अगर बड़े राजनीतिक और ब्यूरोक्रेट को बचाने के लिए उन्हें एक आसान शिकार के तौर पर इस्तेमाल किया गया होगा तो इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता.

त्यागी बिना पावर के क्या कुछ कर सकते थे?

मेरे लिए यह आश्चर्य की बात है कि एक रिटायर्ड वायुसेना प्रमुख किसी सौदे में रिटायरमेंट के तीन साल बाद भी कोई भूमिका निभा सकता है. त्यागी 2007 में रिटायर हो गए और डील पर 2010 में दस्तखत हुए. ये हेलिकॉप्टर हालांकि वायुसेना द्वारा खरीदे जा रहे थे लेकिन इनका इस्तेमाल वायुसेना की बजाय राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे वीवीआईपी करने वाले थे.

ऐसे में वायुसेना को इन हेलिकॉप्टरों की खरीदारी करने के लिए क्यों कहा गया? इनकी खरीदारी नागरिक उड्डयन मंत्रालय कर सकती थी.

इन वीवीआईपी हेलिकॉप्टरों को खरीदने की प्रक्रिया वाजपेयी सरकार के वक्त शुरु हुई थी. उस वक्त के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा गुणवत्ता आवश्यकताओं (क्यूआरएस) में तब्दीली चाहते थे. इस पर सहमति बनी और बाद में इस पर तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी ने दस्तखत किए. उस वक्त वायुसेना प्रमुख त्यागी का इसमें कोई रोल नहीं था.

फोटो. विकीमीडिया

हकीकत यह है कि उनको क्यूआरएस में तब्दीली करने का अधिकार ही नहीं था. यह शायद कम लोगों को ही पता होगा कि हमारे तीनों रक्षा अंगों में खरीदारी से संबंधित कोई भी प्रस्ताव रक्षा मंत्री को भेजे जाने से पहले उस पर आगे बढ़ने की इजाजत उस सेवा में नंबर दो पर बैठा हुआ शख्स देता है. त्यागी तो उस वक्त उप वायुसेना प्रमुख भी नहीं थे, जब एडब्ल्यू-101 का सुझाव वायुसेना ने वीवीआईपी को लाने-ले जाने के लिए दिया था.

क्या त्यागी ने बिचौलिए की भूमिका निभाई थी?

इस सबके बावजूद अगर त्यागी ने 2010 में डील को फाइनल करने में कोई रोल निभाया भी तो रिटायरमेंट के बाद यह भूमिका एक बिचौलिए के तौर पर रही होगी. लेकिन क्या वह एक बिचौलिया थे? चूंकि उनके दो चचेरे भाई बिचौलिए हैं और पूर्व वायुसेना प्रमुख को अपने चचेरे भाइयों के साथ कई मौकों पर सोशल और पारिवारिक कार्यक्रमों में देखा गया है, इसलिए यह निष्कर्ष निकाला गया कि वह भी बिचौलिया हैं.

मेरी राय में रिश्तेदारों के साथ दिखाई देना यह नहीं माना जा सकता है कि आप उनसे सहमत हों या उनके साथ साझेदारी कर रहे हों. क्या किसी शख्स को अपने वयस्क बच्चों के किए गए कार्यों के लिए उत्तरदायी माना जा सकता है? क्या किसी को अपने भाई या बहन के किसी कार्य के लिए उत्तरदायी माना जाना चाहिए? चचेरे भाई तो दूर की बात है. भारत में हम ऐसे कई परिवारों को जानते हैं जहां एक ही परिवार के सदस्य अलग-अलग पार्टियों में होते हैं. क्या राहुल गांधी को उन चीजों के लिए जवाबदेह होना चाहिए जो उनके चचेरे भाई वरुण गांधी कहते या करते हैं?

मेरा तर्क यह है कि हमें किसी शख्स पर केवल इसी वजह से उग्र नहीं हो जाना चाहिए और उसकी प्रतिष्ठा को खत्म कर देना चाहिए क्योंकि वह किसी मामले में आरोपी है. भारत में आरोप लगाना सबसे आसान काम है, लेकिन आरोपी को दोषी साबित करना सबसे मुश्किल काम है.

आखिर सिस्टम भ्रष्टाचार का शिकार कैसे हो जाता है?

इस पूरे मामले से मेरे सामने एक दूसरा बिंदु आता है. यह है हमारी रक्षा खरीद प्रक्रिया पर फिर से गौर करना. हमें यह पूछना चाहिए कि आखिर मौजूदा सिस्टम भ्रष्टाचार का शिकार आसानी से क्यों हो जाता है? इसका आसान हल है. हमें हथियार खरीदने में ‘वैल्यू फॉर मनी’ होना चाहिए. यह चीज क्यूआर से शुरू होकर टेंडर जारी करने और कम से कम वक्त में प्रक्रिया को पूरी करने से जुड़ी हुई है. गुणवत्ता मानकों को इस तरह से बनाया जाना चाहिए कि वे देश की जरूरतों को पूरा करें. साथ ही सेंट्रल विजिलेंस कमीशन, कैग और केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) जैसी संस्थाओं की इस पर निगरानी होनी चाहिए.

सैद्धांतिक रूप से हमारे पास ऐसा सिस्टम है. लेकिन हकीकत यह है कि चीजें काम नहीं कर रही हैं. हमारा तकनीकी आकलन तंत्र हरी झंडी देने में काफी वक्त लगाता है. निगरानी रखने वाली एजेंसियां खरीदारी के फैसले पर सवाल उठाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाती हैं. इसके चलते रक्षा मंत्रालय मुश्किल में है.

कई चरणों से गुजरती है खरीदारी प्रकिया

इस सिस्टम को बेहतर बनाए जाने की गुंजाइश मौजूद है. एक स्टडी बताती है कि किसी कॉन्ट्रैक्ट की शुरुआत होने से उस पर दस्तखत होने तक किसी खरीदारी मामले को 7 अलग-अलग चरणों से गुजरना पड़ता है. इनमें ‘एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी’, ‘सॉलिसिटेशन ऑफ ऑफर्स’ और ‘ट्रायल इवैलुएशन’ जैसे चरण शामिल हैं. हर चरण में 6-10 एप्रूवल पॉइंट्स होते हैं जिनमें हर मंजूरी बिंदु में कम से कम 2 सबमिशन पॉइंट्स होते हैं. ऐसे में किसी खरीदारी को करीब 60 से 80 प्रॉसेसिंग पॉइंट्स से गुजरना होता है.

फोटो. विकीमीडिया

इस प्रक्रिया में सैन्य अधिकारियों, नागरिक अधिकारियों से लेकर रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री तक शामिल होते हैं. इसे देखते हुए एडब्ल्यू-101 डील हो या कोई अन्य रक्षा सौदा, अगर कहीं घोटाला हुआ है तो उसके लिए पूरा तंत्र जिम्मेदार है. और जब हम पूरे तंत्र की बात करते हैं तो गड़बड़ी की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी उन मंत्रियों की होती है जो अंतिम मंजूरी देते हैं.

जब प्रक्रिया ही इतनी जटिल है और इसमें कई सारी मंजूरियों की जरूरत होती है साथ ही जब ये सब ट्रांसपेरेंसी के नाम पर किया जाता है तब इसका नतीजा उलटा क्यों निकलता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि किसी भी लाइसेंस-परमिट राज में भ्रष्टाचार पनपता है. यही चीज रक्षा मंत्रालय में हो रही है.

लॉबिंग को कानूनी जामा पहनाना हो सकता है मददगार

आखिर में, लॉबिंग एक अहम बिंदु है और एक आम गतिविधि है. हकीकत यह है कि पिछले दो दशकों में रक्षा खरीदारियों में कई घोटाले सामने आए हैं. इसकी मुख्य वजह यह है कि हमने लॉबिंग को अवैध बना दिया है. लॉबिंग करने वाले को एक वकील जैसा माना जा सकता है. अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और फ्रांस जैसे लोकतांत्रिक देशों में यह एक कानूनी गतिविधि है. लॉबिंग को अवैध मानकर हम फैसले लेने की प्रक्रिया को गैर-पारदर्शी बनाते हैं. इससे भ्रष्टाचार पनपता है.

हमें ऐसे लोगों की जरूरत है जो फैसला लेने वालों के सामने अपनी राय रख सकें. अगर लॉबिस्ट खुद को रजिस्टर कराएंगे और अपनी गतिविधियों का खुलासा करेंगे तो कहीं ज्यादा ट्रांसपेरेंसी आ पाएगी. एक बार ये गतिविधियां पारदर्शी तरीके से चलने लगेंगी तो हमें पता रहेगा कि कौन से चुने हुए नुमाइंदे और प्रशासनिक अधिकारी किस लॉबिस्ट से मिले हैं. इससे फैसला लेने में कहीं ज्यादा आसानी होगी. निश्चित तौर पर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर इस तरह की प्रक्रिया के हिमायती रहे हैं. जितनी जल्दी वह इसे लागू कर लेंगे उतना ही अच्छा होगा.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi