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शेफ अतुल कोचर मामला: इस्लामी कट्टरपंथ को लेकर नरम क्यों पड़ जाते हैं उदारवादी?

इस पूरे वाकये से एकमात्र सबक यह हासिल किया जा सकता है- उदारवाद मर चुका है.... RIP

Updated On: Jun 15, 2018 01:02 PM IST

Sreemoy Talukdar

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शेफ अतुल कोचर मामला: इस्लामी कट्टरपंथ को लेकर नरम क्यों पड़ जाते हैं उदारवादी?

अतुल कोचर की घटना एक कड़वे अनुभव की तरह है. वह यह कि महज अपनी राय जाहिर करने (जिस पर उन्होंने बाद में खेद भी प्रकट किया) पर पलक झपते ही किसी की आजीविका छीनी जा सकती है. बहरहाल, यह काफी बुरी बात है. यह देखा जाना और खराब है कि भारतीय 'उदारवादी' (अभिव्यक्ति की आजादी के कथित रक्षक) मिशेलिन स्टार हासिल कर चुके इस जाने-माने शेफ को हटाए जाने और अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटे जाने को लेकर जीत के अंदाज में जश्न मनाते हैं.

यह उनकी नीयत को लेकर कठोर बयान की तरह है और पाखंड का खुल्लम-खुल्ला इजहार भी. इरादा साफ है. असहमति की आवाजों को झुकने या आत्मसमर्पण के लिए डराना-धमकाना और दूसरों के सामने ऐसा उदाहरण पेश करना, ताकि उनसे अलग राय रखने वाले या तो चुप हो जाएं या उनके साथ होकर उन्हीं की राह पर चलने को मजबूर हो जाएं. दरअसल, इस तरह की गतिविधियों का मकसद असहमति की आवाजों के बीच डर पैदा कर आत्म-नियंत्रण के लिए गुंजाइश बनाना है, ताकि विचारधारा के आधार पर दबदबा बनाए रखने का मामला आसान हो जाए. एक तरह से कहा जाए तो इस तरह के जबरिया उपायों को असामान्य बात नहीं माना जा सकता. इंसानी सभ्यता का पूरा इतिहास ही मुख्य तौर पर गुलामी और आजादी के बीच तनाव की हिंसक गाथा रहा है.

आंतरिक विरोधाभासों का शिकार हो चुका है उदारवाद

मानव सभ्यता के विकास की निशानी के तौर पर स्वतंत्र विचार का ऊंचा आदर्श हमें पूर्वग्रहों और भेदभाव वाली परंपराओं से मुक्त करने की हरमुमकिन कोशिश करने के लिए प्रेरित करता है. इसे बड़ा विश्वासघात ही कहा जाएगा कि अभिव्यक्ति की आजादी के स्व-नियुक्त या घोषित प्रतिनिधियों ने कोचर के साथ हुए व्यवहार के खिलाफ खड़ा होने के बजाय बेफिक्री के साथ उनकी हालत को लेकर मजा लिया. इसे पूरी तरह से दोहरा पाखंड जैसा मामला ही कहा जाएगा कि 'उदारवादी' कोचर को डराने-धमकाने के लिए अधिनायकवाद से जुड़े हर दांव को आजमाते हैं. फिर बाद में उदारवाद के नाम पर इस तरह की गतिविधियों को अंजाम देने के बहाने बनाते हैं. इससे ज्यादा विकृत नैतिक अपराध को ढूंढना मुश्किल है.

अब यह पूरी तरह से साफ जान पड़ता है कि 'उदारवाद' अपने ही आंतरिक विरोधाभासों का शिकार हो चुका है और इसके स्व-घोषित अनुयायी-समर्थक अब किसी भी लिहाज से 'गैर-उदारवादियों ' के मुकाबले बेहतर नहीं हैं. दरअसल, उदारवादी असहिष्णुता का मामला ज्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि यह धोखे में डालने वाली चीज है.

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक मार्क ब्रैंड्ट ने नीदरलैंड की तिलबर्ग यूनिवर्सिटी में 2013 में पेश किए गए पेपर में कहा था, 'मुमकिन है कि उदारवादी खुद को ज्यादा खुले दिमाग वाला मानते हों, लेकिन वे अपने से उलट लोगों को लेकर परंपरागत सोच वाले अपने समकक्ष लोगों की तुलना में ज्यादा सहिष्णु नहीं होते. हालांकि, इस तथ्य को भी पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि उदारवादियों की शख्सियत में 'विविधता और नैतिक मूल्यों का दायरा व्यापक होता है और जाहिर तौर पर इस वजह से उन्हें (उदारवादियों को) पूर्वग्रह से बचे रहने में मदद मिलनी चाहिए.' मार्क ने ज्यॉफ्री वेदरेल (सामाजिक मनोविज्ञान) और क्रिस्टिन रेयना (शख्सियत विज्ञान) के साथ मिलकर यह पेपर तैयार किया था.

कई तरह की अंदरूनी हकीकत को बयां करता है कोचर प्रकरण

कोचर वाकया कई तरह की अंदरूनी हकीकत के बारे में बयां करता है. खास तौर पर भारत से जुड़ी हकीकतों के बारे में इस तरह की बात कही जा सकती है. संस्कृति की लड़ाई जीतने के बाद 'उदारवादी' और वामपंथी सॉफ्ट पावर के ठिकानों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए पहले के मुकाबले कहीं अधिक बेचैन हैं.

दरअसल, वे राजनीतिक सत्ता गंवाने को लेकर अपमानित जैसा महसूस कर रहे हैं. 'उदारवादी' हमलवार कुनबे की तरफ से कोचर पर हमले को तैयारी के साथ अंजाम दिया जाना, उनका (कोचर का) नुकसान सुनिश्चित करना और इन तमाम घटनाक्रम के बाद संतुष्ट महसूस करना इस बात का सटीक उदाहरण है कि उदारवादी किस तरह से बेचैन और परेशान महसूस कर रहे हैं. जाहिर तौर पर इस तरह के घिनौने हमले बार-बार होने की संभावना है.

उदारवाद के साथ जो मूल समस्या है, वह इसके फर्जी समर्थकों के मुकाबले कहीं ज्यादा गहरी है. दरअसल, उदारवाद एक विचारधारा के तौर पर इस्लाम से जुड़ी दिक्कतों और गड़बड़ियों को स्वीकार पूरी तरह से नाकाम रहा है. यह (उदारवाद) समस्या से निपटने के बजाय अतीत से बचता रहा या जानबूझकर उस चुनौती के बारे में अनजान बना रहा, जो इस्लाम उसके बुनियादी सिद्धांतों के लिए पेश करता है. चूंकि इस समस्या को काफी लंबे समय तक बने रहने के लिए छोड़ दिया गया है, लिहाजा इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अब उदारवाद को अब अपने साथ मौजूद कई विरोधाभासों के बारे में स्पष्टीकरण पेश करने के लिए निश्चित तौर पर दोहरे मापदंडों का सहारा लेना पड़ेगा.

मिसाल के तौर पर जहां हिंदू देवता और देवियों (पोप का मजाक उड़ाना) की मानहानि का मामला 'उदारवाद' के तहत पूरी तरह से सुरक्षित है, लेकिन इस्लाम के मामले में ऐसी उदारता बरते जाने की तनिक भी इजाजत नहीं है. उदारवादियों की तरफ से इस पाखंड को इस तरह से स्वीकार कर लिया है कि वे अब या तो इसे ढूंढ पाने में सक्षम नहीं हैं या डर की वजह से तुष्टिकरण वाला रवैया अपनाने को मजबूर हैं.

कोचर के मामले ने फिर से खोली उदारवादियों के पाखंड की पोल

कोचर का मामला इस पाखंड को पूरी तरह से साबित कर देता है. लंदन के इस शेफ का दुबई मे जेडब्ल्यू मैरियट एम होटल के साथ कॉन्ट्रैक्ट था. इस होटल से कोचर का रंग महल रेस्टोरेंट जुड़ा हुआ था. उन्होंने 10 जून को अपने ट्वीट के जरिये प्रियंका चोपड़ा से जुड़े क्वांटिको विवाद पर प्रतिक्रिया दी थी और वह अब इस ट्वीट को डिलीट भी कर चुके हैं. उन्होंने अपने इस ट्वीट के जरिये कहा था, 'यह दुखद है कि आपने (चोपड़ा) हिंदुओं की भावना का सम्मान नहीं किया, जिन्हें 2,000 साल से भी ज्यादा से इस्लाम द्वारा आतंकित किया गया है. आपको शर्म आनी चाहिए.'

कोचर भले ही अपने इस ट्वीट में जिक्र की गई तारीखों को लेकर गलत हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने मुख्य तौर पर जो बात कही, वह ऐतिहासिक सच है और दस्तावेजों में मौजूद है. उन्होंने इस मामले में तारीख और साल के आंकड़ों के लिहाज से एक हजार साल की गलती कर दी. हालांकि, इस बात का स्वांग करना कि भारत में इस्लाम का आगमन सभ्यता और शिष्टता के जरिये हुआ, बेतुका है. इसे बेवकूफी भरा झूठ के सिवा कुछ नहीं माना जा सकता. इसको लेकर काफी अर्सा पहले ही एक सच आयोग का गठन किया जाना चाहिए था.

इस्लामी बर्बरता को लेकर नायपॉल और अन्य लेखकों के विचार पर भी गौर करना बेहद जरूरी

इस्लामी आक्रमण की बर्बरता से न तो इनकार किया जा सकता है और न ही इसे भूला जा सकता है. जाने-माने लेखक वी एस नायपॉल ने 1999 में आउटलुक के लिए तरुण तेजपाल को दिए गए इंटरव्यू में कहा था, 'आर्ट्स और इतिहास से संबंधित किताबों में लोग मुसलमानों के भारत में 'आगमन' के बारे में लिखते हैं, मानो मुसलमान टूरिस्ट बस पर आए और फिर चले गए. भारत पर फतह का उनका अपना मुस्लिम नजरिया ज्यादा सच है. वे मजहब की जीत, मूर्तियों और मंदिरों के विध्वंस, लूट और स्थानीय लोगों को बड़ी संख्या और सस्ते में गुलाम बनाए जाने की बात करते हैं, इतना सस्ता कि कुछ रुपयों में उन्हें (स्थानीय लोगों को) बेचा जा रहा था'

सर वी एस नायपॉल ने मंदिरों को तोड़े जाने को लेकर भी साफ-साफ बात की थी. उनके मुताबिक, यह बात मंदिरों की मौजूदगी और गैर-मौजूदगी दोनों चीजों से जाहिर होती है. उनका कहना था, 'वास्तुकला से संबंधित प्रमाण- उत्तर भारत में हिंदू स्मारक चिन्हों की गैर-मौजूदगी इस बात को समझाने के लिए पर्याप्त है. यह फतह इससे पहले की अन्य राजाओं और शासन व्यवस्था की जीत की घटनाओं के मुकाबले बिल्कुल अलग था. इस अवधि का कोई हिंदू रिकॉर्ड नहीं है. हारे हुए लोग कभी अपना इतिहास नहीं लिखते हैं. विजेता अपना इतिहास लिखते हैं. फतह करने वाले, जीत हासिल करने वाले मुसलमान थे. विजेताओं से इतर दूसरी तरफ खड़े लोगों के लिए यह अंधेरे का दौर था.'

अखिलेश पिल्लालमारी 'द डिप्लोमेट' मैगजीन में लिखते हैं कि अपमान का संदेश फैलाने के लिए किस तरह से इन विध्वंसकारी गतिविधियों को अंजाम दिया गया. उन्होंने लिखा है, 'आज देश में ज्यादातर बड़े और अहम ऐतिहासिक हिंदू मंदिर दक्षिण भारत (तिरुपति, मदुरै) या उड़ीसा में, पूर्वी तट आदि के आसपास पाए जाते हैं. ये इलाके अपने ऐतिहासिक काल में अधिकांश वक्त इस्लामी शासन के दायरे से बाहर रहे. हिंदू धर्म के पारंपरिक गढ़ गंगा नदी घाटी (आधुनिक उत्तर प्रदेश और बिहार) और पंजाब और सिंध के इलाकों में कोई बड़ा मंदिर नहीं नजर आता है. इन इलाकों के ज्यादातर मंदिरों को इस्लामी मूर्तिभंजनों द्वारा तोड़ डाला गया. इस तरह की ज्यादातर विध्वसंकारी गतिविधियां इन इलाकों में मुस्लिम फतह के शुरुआती दौर में हुईं और इसका अवधि 1000-1300 ईस्वी के दौरान की है. कई इतिहासकारों का यह भी कहना है कि ज्यादातर मंदिरों को नहीं बल्कि प्रमुख और बड़े मंदिरों को तोड़ा गया और इसका मुख्य मकसद हिंदुओं पर अपना असर डालना था.'

मामले का सबक? उदारवाद मर चुका है....RIP

बहरहाल, यहां इस बात का भी उल्लेख करना जरूरी है कि ऐतिहासिक तथ्य को काफी हद तक साफगोई से कहने के बाद कोचर ने दो बार इस सिलसिले में (अपने ट्वीट को लेकर) बिना शर्त माफी मांगी.

उन्होंने कहा, 'मेरी ट्वीट का कोई औचित्य नहीं है, रविवार को गरमा-गरमी और गुस्से के पलों में बड़ी गलती हो गई. मैं पूरी तरह से अपनी गलती को स्वीकार करता हूं. इस्लाम की स्थापना तकरीबन 1400 साल पहले हुई थी और मैं इस संबंध में अपनी गलती के लिए माफी मांगता हूं. मैं बेवजह इस्लाम से पूर्वग्रह रखने या नफरत करने वालों में से नहीं हूं. मैं अपनी उस टिप्पणी के लिए खेद प्रकट करता हूं, जिसने कई लोगों को आहत किया.'

कोचर वाकये के मद्देनजर सोशल मीडिया पर इस घटना के खिलाफ

प्रतिक्रियाओं का दौर भी शुरू हो गया है. इसके तहत दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़े कुछ लोगों व संगठनों ने जेडब्ल्यू मैरियट होटल चेन का बहिष्कार करने का आह्वान किया है. यह एक तरह से बेवकूफी भरा रुख है. मैरियट अगर दुबई में अपना होटल का बिजनेस चलाना चाहता है, तो उसके लिए संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के सख्त इस्लामी कानूनों का पालन करना बेहद जरूरी है. जाहिर तौर पर ऐसे में इस लग्जरी होटल ब्रांड से इस तरह की उम्मीद करना गैर-वाजिब होगा कि वह अपने बिजनेस को नुकसान पहुंचाने से जुड़े खतरे की कीमत पर कोचर को अपने यहां बनाए रखे. इस मामले में विवाद बढ़ने के मद्देनजर होटल चेन ने जो फैसला लिया, उसे टाला जाना किसी भी तरह से मुमकिन नहीं रह गया था.

यहां सवाल यह है कि उदारवादी इस पूरे मामले में कोचर के पीछे इस तरह से हाथ-धोकर क्यों पीछे पड़ गए, जिसके कारण शेफ को '5 साल तक की कैद और 5 लाख से 10 लाख दिरहम के बीच जुर्माना' के खतरे का सामना करना पड़ रहा है.  क्या उन्हें इस पूरे मुद्दे को लेकर कोचर के बचाव को लेकर उनके पक्ष में अभियान नहीं चलाना चाहिए था, ताकि संयुक्त अरब अमीरात की सरकार महज एक ट्वीट के लिए उन्हें सजा नहीं दे?

यहां न सिर्फ पाखंड का मामला काम कर रहा है, बल्कि इस्लामी को अपवाद मानने संबंधी विचार का भी मामला है जो उदारवादियों को यह स्वीकार करने के लिए मजबूर करता है कि इस्लाम और मुसलमानों को उदारवाद के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए. निश्चित तौर पर यह पूरी तरह से गैर-सैद्धांतिक और उल्टा और अनैतिक रुख अख्तियार करने जैसा मामला है, लेकिन जैसा कि जेफरी टेलर 'क्विल्ट'(Quilette) मैगजीन में लिखते हैं- ये 'उदारवादी' किसी भी लिहाज से सच्चे प्रगतिशील नहीं है, जबकि ये गहरे स्तर तक दुविधा और भ्रम के शिकार और वास्तविक में सबसे गैर-उदारवादी धारणाओं के समर्थक रहे हैं: मानो इंसानों के एक समूह के पास अपने धर्म की वजह से वर्चस्व कायम करने और बाकी इंसानों के अपमान और उनसे बुरा सलूक करने का एकछत्र अधिकार है— और वह भी मानो बिना आलोचनाओं के ऐसा करने का अधिकार है.

यहां पर उनके एजेंडे और दांव का अंदाजा लगाया जा सकता है. अपनी 'गैर-उदारवादी' गतिविधियों को सही ठहराने के लिए 'उदारवादियों' ने कोचर के शब्दों को 'नफरत भरा और भड़काऊ बात' करार देने का पुराना दांव आजमाया और 'धर्मांधता/असहिष्णुता' के खिलाफ सजा की मांग को लेकर राय पेश की. उनके मुताबिक, इसका मतलब यह हो सकता है कि इस दांव के जरिये उन्हें उदारवाद का बोझ ढोने से मुक्ति मिल जाए और वे उन लोगों को डराने-धमकाने का अपना काम जारी रख सकते हैं, जिन्हें वह पसंद नहीं करते और जिनके साथ उनके विचार मेल नहीं खाते. यह फर्जी उदारवाद इसी तरह से उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के उन छात्रों के समर्थन में खड़े होने से रोकता है , जिन्हें रमजान के महीने के दौरान बार जाने पर डराया-धमकाया गया. इन छात्रों को इस मामले में जान से मारने की भी धमकी मिली.

कोचर मामले को लेकर हमें किसी तरह की हैरानी नहीं होनी चाहिए. इस पूरे वाकये से एकमात्र सबक यह हासिल किया जा सकता है- उदारवाद मर चुका है.... RIP.

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