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किस वजह से गोलवलकर ने थपथपाई थी युवा अटल की पीठ

अटल जी 16 साल की आयु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे. इसी क्रम में उन्होंने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए एक कविता भी लिखी थी- हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय...

Updated On: Aug 18, 2018 09:10 AM IST

Puneet Saini Puneet Saini
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किस वजह से गोलवलकर ने थपथपाई थी युवा अटल की पीठ

भारत की आजादी से करीब 9 साल पहले 1938 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पैर अटल बिहारी वाजपेयी के गृहनगर ग्वालियर में जमना शुरू हुए थे. संगठन की जड़ों को मजबूत करने के लिए नारायण राव तर्टे को प्रचारक बनाकर भेजा गया था. तर्टे से अटल बिहारी की पहली मुलाकात 1940 में हुई थी और इस मुलाकात ने ही अटल के स्वयंसेवक बनने की आधारशिला रखी. अटल जी 16 साल की आयु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे. संघ हिंदुत्व को परिभाषित करने की कोशिश में लगा हुआ था. ऐसे में अटल बिहारी जैसे युवा के संगठन में जुड़ने का असर क्या हुआ, ये उदारहण से समझा जा सकता है.

अटल जी वाकपटुता और कवित्व किशोरावस्था से ही लय पकड़ने लगे थे. दरअसल युवा अटल की कविताओं का लाभ संगठन के फैलाव में भी खूब मिला. असरदार भाषण वो भी  बेहतरीन कविताओं के साथ बाहरी लोगों के साथ-साथ संगठन के कार्यकर्ताओं में भी असर करने लगे थे. इसी क्रम में उन्होंने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए एक कविता लिखी थी- हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय... वैसे तो अटल जी ने बहुत सारी कविताएं लिखी हैं, लेकिन यह कविता अटल जी के बेहद करीब थी. बल्कि अटल जी ही नहीं बीजेपी कार्यकर्ताओं और संघ के स्वयंसेवक भी इस कविता को बेहद पसंद करते हैं.

इस कविता को अटल जी ने 18 वर्ष की आयु में 1942 में लिखा था. युवा अटल ने जब यह कविता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में पढ़ी तो तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) अटल जी को देखते ही रह गए. इतना ही नहीं उन्होंने अटल जी को अपने पास बुलाया और उनकी पीठ थपथपाकर उन्हें आशीर्वाद भी दिया.

यह कविता इतनी प्रसिद्ध हुई कि अटल जी जहां भी जाते उनसे यह कविता सुनाने की फरमाइश की जाती. यह कविता स्वयंसेवकों की प्रेरणा बन गई थी. स्वयंसेवकों ने इस कविता को मुंहजुबानी याद कर लिया था. संघ में होने वाले कार्यक्रमों में इस कविता का पाठ होने लगा. तब से लेकर आजतक संघ की शाखाओं में अटल जी की इस कविता को याद किया जाता है. अटल जी ने वैसे तो कई कविताएं लिखी हैं, लेकिन इस कविता से उन्हें पहचाना जाने लगा. इस कविता का इस्तेमाल स्वयंसेवक अपने साथियों को प्रेरित करने के लिए भी करने लगे

शाखा कार्यवाह से विस्तारक और फिर प्रचारक

अटल जी अपने शुरुआती दिनों में कम्युनिस्ट हुआ करते थे, लेकिन कुछ समय बाद अटल जी दक्षिणपंथी संगठन संघ के स्वयंसेवक बने. अटल जी संघ की शाखा में पहली बार अपने मोहल्ले में रहने वाले साथी के साथ गए थे, लेकिन उन्हें भी क्या पता था यह संघ उनके रोम-रोम में बस जाएगा और पिता के मना करने के बाद भी वह इस संघ के लिए चोरी-छिपे काम करेंगे. अटल जी के मोहल्ले में बाबा साहब खानवलकर रहते थे. वह संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे. उनके साथ अटल जी ने स्थानीय शाखा में जाना शुरू कर दिया. तब ग्वालियर में प्रवर्तक और प्रचारक नारायण राव तर्टे थे. यह 1940 की बात है. तर्टे की जीवनशैली से अटल जी इतने प्रभावित हुए कि वह लगातार संघ की शाखा में जाने लगे और संघ के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे. 1941 में अटल जी ने नागपुर से प्रथम वर्ष किया और लखनऊ से 1942 में द्वितीय वर्ष पूर्ण किया. अटल जी का संघ के प्रति बढ़ता आकर्षण उनके पिता कृष्ण बिहारी को बिल्कुल भी पसंद नहीं था. जिसके कारण उनके पिता ने उन्हें संघ से दूर रखने का फैसला किया, लेकिन अटल जी नहीं माने. वह चोरी-छिपे संघ के लिए कार्य करने लगे. इसके बाद अटल जी ने 1944 में तृतीय वर्ष किया और जीवनभर संघ के लिए कार्य करने का फैसला किया.

Jammu: Schoolchildren pay tribute to the former prime minister Atal Bihari Vajpayee at a school in Jammu on Friday, Aug 17, 2018. (PTI Photo) (PTI8_17_2018_000084B)

पिता के साथ एलएलबी की पढ़ाई

अटल जी ने कानपुर में एमए राजनीतिशास्त्र में दूसरा स्थान पाने के साथ ही एलएलबी में एडमिशन ले लिया था. अटल जी के साथ उनके पिता कृष्ण बिहारी ने भी वकालत की पढ़ाई करने के लिए एलएलबी में दाखिला लिया. पिता और पुत्र दोनों ने एक साथ एलएलबी करनी शुरू की. तब एलएलबी की क्लास डीएवी कॉलेज में लगा करती थी. कई बार अटल जी क्लास में आते थे तो उनके पिता नहीं आते थे. पिता के साथ अटल जी नहीं आते थे. हालांकि उन्होंने अपनी एलएलबी पूरी नहीं की और एक साल के बाद ही वह संघ की मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ की जिम्मेदारी संभालने के लिए ग्वालियर चले गए.

पांचजन्य के संपादक अटल

मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म की सफलता के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय और तत्कालीन प्रांत प्रचारक भाऊराव देवरस ने साप्ताहिक पत्र निकालने की योजना बनाई. इसका नाम पांचजन्य रखा गया. पांचजन्य के संपादन की जिम्मेदारी अटल जी को दी गई. 14 जनवरी 1948 को पांचजन्य का पहला संस्करण बाजार में आया. अभी तक तीन ही संस्करण बाजार में आए थे कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई. संघ पर प्रतिबंध लग गया और पांचजन्य के प्रकाशन पर भी रोक लगा दी गई. दीनदयाल उपाध्याय समेत संघ के कई वरिष्ठ नेता गिरफ्तार कर लिए गए. कुछ समय बाद जब संघ के प्रतिबंध हटाया गया तो पांचजन्य का फिर से प्रकाशन शुरू हुआ और एक बार फिर अटल जी को संपादक की जिम्मेदारी सौंपी गई. इसके लिए अटल जी ने जी-तोड़ मेहनत की.

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