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दिल्ली के स्कूलों में सीसीटीवी : सुरक्षा के नाम पर निजता का हनन

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने, स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के मुद्दे पर एक प्रो-एक्टिव कदम उठाते हुए ये फैसला किया कि सभी सरकारी स्कूलों के क्लासरूम में सीसीटीवी कैमरा लगवाएंगे

Updated On: Jan 22, 2018 07:03 PM IST

Swati Arjun Swati Arjun
स्वतंत्र पत्रकार

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दिल्ली के स्कूलों में सीसीटीवी : सुरक्षा के नाम पर निजता का हनन

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने, स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के मुद्दे पर एक प्रो-एक्टिव कदम उठाते हुए ये फैसला किया कि सभी सरकारी स्कूलों के क्लासरूम में सीसीटीवी कैमरा लगवाएंगे. हालांकि, फैसला आए अभी कुछ ही दिन गुजरे हैं तो इस पर बहुत ज्यादा प्रतिक्रिया सामने नहीं आ रही है लेकिन इसे बहुत आसानी से स्वीकार करना भी मुश्किल हो रहा है.

स्वीकार न करने की वजहें बहुत सारी हैं, जिसमें सबसे अहम है बच्चों की सुरक्षा का मुद्दा. हाल-फिलहाल के दिनों में जिस तरह से एक के बाद एक बच्चों पर स्कूलों के भीतर हमले हुए हैं, वो भी स्कूल के बच्चों और अन्य कर्मचारियों के द्वारा उससे अभिभावक काफी हद तक डरे और सहमे हुए हैं. भय के इस माहौल में उन्हें लगता है कि बच्चों की शायद जितनी ज्यादा निगरानी की जा सके उतना अच्छा हो.

लेकिन क्या सच में ऐसा मुमकिन है? क्या बच्चों को हर समय सीसीटीवी कैमरे की जद में रखकर हम उनका भला करेंगे. क्या ये मानव होने के मूल सिद्धातों के विपरीत नहीं है, क्या हम बच्चों के मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं कर रहे हैं? बचपन वो समय होता है जब बच्चा एक निश्छल और आजाद जिंदगी जीता है, उस पर जिम्मेदारियां कम होती हैं, उसकी जवाबदेही कम होती, उसे दिन में क्लासरूम में बैठे-बैठे, खिड़की से बाहर देखने की आजादी होती है, टीचर से छुपकर टिफिन खाने की आजादी होती है, दोस्तों को चिट की मदद से कोई बात कहने की आजादी होती है, उसे दिन में खुली आंख से सपने देखने और उन सपनों में रंग भरने की आजादी होती है.

school student

हम ये भूल रहे हैं कि स्कूल सिर्फ पढ़ाई-लिखाई करने और करियर डेवेलप करने की जगह नहीं है. स्कूल वो नैचुरल स्पेस है जहां एक बच्चा शारीरिक, मानसिक, साईकोलॉजिकल और क्रिएटिव तौर पर विकास करता है. इंसानी बस्तियों और नियम-कायदों के समाज में ये वो स्पेस होता है जहां बच्चों को ऊंची उड़ान भरना सिखाया जाता है, ये वो जगह होती है जब एक बच्चे के शरीर और मन में होने वाले बदलावों को मजबूत जमीन मिलती है. बच्चा प्यूबर्टी से गुजरता है, उसकी आवाज भारी होती है, उसका विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण पैदा होता है, लड़कियों के भीतर भी इतने ही बदलाव होते हैं, उनके शरीर में भी हार्मोनल चेंज होते हैं, उन्हें भी लड़कों के साथ नए तरीके से संबंध विकसित करने होते हैं.

हममें से कौन इस बात से इंकार कर सकता है कि सबसे पहले हमें सबसे पहले जो आकर्षण की अनुभूति हुई वो क्लास के या की किसी सहपाठी के लिए हुई, कैसे हम उनके साथ घंटो बातें करते हैं, अपनी समस्याएं शेयर करते और सुलझाते रहे, प्ले-ग्राउंड के किसी कोने में हाथ पकड़ कर बैठे रहे, झूले में साथ झूलते रहे, कॉरिडोर में हंसी मजाक और फ्लर्टिंग भी की. वैलेंटाइन-डे पर एक-दूसरे को कार्ड्स भी गिफ्ट किए और गुलाब भी. इन सारी बातों का उल्लेख यहां करने के पीछे का मकसद ये नहीं है कि, हमें सिर्फ इस बात की चिंता है कि स्कूली बच्चों की दोस्ती कम हो जाएगी. चिंता इससे कहीं ज्यादा की है.

दरअसल, स्कूल वो परिसर होता है जहां हम भविष्य के समाज का निर्माण करते हैं. वो समाज जहां मुख्य तौर पर दो विपरीत सेक्स के लोग रहते हैं- वो समाज जो स्त्री और पुरुष के आपसी सामंजस्य की बदौलत फंक्शन करता है. स्कूल आने वाली न सिर्फ पीढ़ी का निर्माण करता है बल्कि वो भविष्य के समाज, परिवार और रिश्तों का निर्माण करता है.

स्कूल हमें यानि लड़के और लड़की को आगे चलकर, साथ रहने का सलीका सिखाता है उन्हें सह-अस्तित्व की सीख देता है.

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सीसीटीवी कैमरे का इंस्टॉलेशन इस प्राकृतिक और सामाजिक प्रक्रिया के रास्ते में एक बड़ी बाधा साबित होगा. इस एहसास के साथ ही कि हमें 4 जोड़ी आंखें लगातार देख रही हैं या हम पर नजर रखी जा रही है- इससे न सिर्फ बच्चे या युवा होते छात्र न सिर्फ मानिसक तौर पर ज्यादा अलर्ट हो जाएंगे, बल्कि वे एक थोपा हुआ व्यवहार करने को बाध्य होंगे. जिसका असर उनके पूरी पर्सनैलिटी पर होगी.

हो सकता है कि ऐसे फोर्स्ड हालातों में एक तय नियम के तहत, व्यवहार करने की जो बाध्यता होगी उसका असर उनके दिमाग और हार्मोनल नेचर पर पड़े. ये प्रेशर बच्चों के शरीर में होने वाले प्राकृतिक बदलाव के खिलाफ होगा, जो उन्हें एक किस्म के दबाव में डाल देगा- और जिसका असर उनकी पूरी पर्सनैलिटी पर पड़ जाए. जो आगे चलकर समाज, परिवार और संबंधों के बहुत ही ज्यादा घातक साबित हो सकता है.

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बच्चों की सुरक्षा एक बेहद जरूरी विषय है जिस पर काफी काम करने की जरूरत है, लेकिन कोई भी समस्या को सुलझाने का तरीका एंटी-ह्यूमन या एंटी-नेचर नहीं होना चाहिए कि वो इंसान के मूल स्वभाव के लिए खतरा साबित हो जाए. केजरीवाल चाहें तो इसपर कुछ और विचार कर सकते हैं, एकस्पर्ट्स की राय ले सकते हैं. हालांकि कुछेक प्राइवेट और पब्लिक स्कूलों में ये अभी भी मौजूद है, पर ये कितना कारगर है ये कहना मुश्किल है.

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रहा सवाल स्कूल के कर्मचारियों को समय पर आने और नियम से काम करने के लिए प्रेरित करने की उसके लिए कई और उपाय मौजूद हैं. केंद्रीय और राज्य सरकारें ऐसे कई उपाय इस दिशा में लगातार कर रहे हैं, जिसका इन स्कूलों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है. ये पूरी तरह से एडमिनिस्ट्रेश से जुड़ा मसला है जिसका हल उसी स्तर पर निकाला जाना चाहिए.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

अंत में सबसे अहम बात, भारतीय संविधान ने अपने हर नागरिक को निजता को अधिकार दे रखा है, उसने कहीं पर ये भेद नहीं किया है कि ये अधिकार सिर्फ बालिग या किसी खास उम्र में ही दि जाता है. निजता का ख्याल तो हम अपने घर के पालतू जानवरों का भी करते हैं, ऐसे में इन स्कूली बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार कितना सही है..?

अपने देश के हर नागरिक को सुरक्षा मुहैया कराना हर सरकार की पहली जिम्मेदारी है- लेकिन सुरक्षा देने के नाम पर उनके निजी स्पेस को सार्वजनिक करना ये किसी चुनी हुई सरकार के अधिकारों में शामिल नहीं है, ऐसा करके वे हमारी आने वाली पीढ़ी के मौलिक अधिकार का हनन कर रही है. दिल्ली सरकार और मुख्यमंत्री केजरीवाल शायद इसे भूल रहे हैं.

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