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असम NRC: सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच अटके मुद्दे में आगे भी हैं कई पेंच

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को ओसीपी लाने को कहा है. सरकार के पास भी रिकॉर्ड के मिलान की मुश्किल है

Updated On: Aug 12, 2018 11:54 AM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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असम NRC: सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच अटके मुद्दे में आगे भी हैं कई पेंच

एनआरसी का ड्राफ्ट जारी होने के बाद राजनीतिक हंगामा चल रहा है. बीजेपी और कांग्रेस दोनों वोट बैंक की जुगत में हैं. दोनों दल एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर रहे हैं. हालांकि तकरीबन चालीस लाख लोगों के नाम एनआरसी में दर्ज ना होना चिंता का विषय है. कांग्रेस इस पूरी एनआरसी की प्रक्रिया को अपना बता रही है. कांग्रेस कार्यसमिति ने बाकायदा इसका क्रेडिट लिया. बताया गया कि ऐतिहासिक असम एकार्ड का एनआरसी अहम हिस्सा था. जिसको कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने फास्ट ट्रैक किया है. इससे पहले कांग्रेस का रूख स्पष्ट नहीं हो पा रहा था.

बीजेपी की असम में सरकार है. पार्टी में ऐसा दिखाने की कोशिश की है. जैसा सारे घुसपैठियों को पार्टी ने बाहर निकाल दिया है. बीजेपी ने कांग्रेस के खिलाफ इसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया है. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को लग रहा है कि इस चुनावी साल में इससे बढ़िया मुद्दा नहीं मिल सकता है.

क्या कहता है सिटीज़नशिप एक्ट?

सिटीज़नशिप एक्ट 1955 के सेक्शन 3 के मुताबिक जो भी शख्स 1950-1987 के बीच पैदा हुआ है. उसे भारत की नागरिकता हासिल है. 1987-2003 के बीच जन्म लिए हुए व्यक्ति के माता-पिता में से कोई एक का भारत का नागरिक होना आवश्यक है. 2003 के बाद पैदा हुए व्यक्ति के दोनों माता-पिता का भारतीय होना ज़रूरी है. हालांकि असम को लेकर अलग कानून है, जिसकी वजह से एनआरसी का काम अमल में लाया जा रहा है.

असम के लिए कानून अलग

सिटीज़नशिप एक्ट में असम के लिए अलग कानून बनाया गया है, जिसमें 1971 से पहले आए सभी को भारत का नागरिक माना जा रहा है. इस एक्ट के सेक्शन 6ए में दिए गए प्रावधान के हिसाब से नागरिकों की पहचान की जा रही है, जिसमें कई दस्तावेज़ देने के बाद एनआरसी में नाम दर्ज किया जा रहा है. जिसमें 1971 से पहले आए लोगों की पहचान करके एनआरसी में दर्ज किया जा सकता है. हालांकि इस प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच में सुनवाई हो रही है. इस सेक्शन को असम के एक संगठन ने चुनौती दी है. रिट पेटीशन नंबर 562/2012 के ज़रिए चुनौती दी गई है. जब पूरे देश में नागरिकता पाने की कट ऑफ डेट 1950 है तो असम के लिए 1971 क्यों है. इस मुकदमे में फैसला आना बाकी है, जिस पर एनआरसी का भविष्य तय हो सकता है. सेक्शन 6ए पर कोर्ट के रूख पर निर्भर है कि आखिर कट ऑफ डेट क्या होनी चाहिए. ये घट और बढ़ सकती है.

असम के कई ज़िलों में दस्तावेज़ नहीं

सरकार के पास मिलान के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ नहीं है. जो कानूनन सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है. जो लोग ऐसे दस्तावेज दे रहे है जिसका रिकॉर्ड सरकार के पास नहीं है, उनका नाम एनआरसी में नहीं है जिससे ऐसे लोग कोर्ट की शरण में जा सकते हैं. असम सरकार ने विधानसभा में 16 जुलाई 2012 को बताया कि कारबी, आंलान्ग, चिरांग, दीमा, हसाओ और सिवासागर ज़िले में रिकॉर्ड नहीं है, इसके अलावा उन्होनें दूसरे ज़िले के कई गांवों के रिकॉर्ड ना होने की बात कही है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार वकील फुज़ैल अहमद अय्यूबी का कहना है कि अब ऐसे लोग क्या करें जिनके पास रिकॉर्ड है. लेकिन सरकार के पास उसको वेरीफाई करने के लिए ज़रूरी कागज़ात गायब है. ऐसे लोगों को कोर्ट ही राहत दे सकती है.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

बीजेपी की राजनीति

बीजेपी कह रही है कि वो गैर मुस्लिम सभी लोगों को भारत में रहने का अधिकार दे सकती है. इसके ज़रिए बीजेपी अपना राजनीतिक एजेंडा आगे कर रही है. जिसकी वजह ये है कि सरकार की तरफ से एक संशोधन विधेयक लाया गया है, जिसमें प्रावधान है कि पाकिस्तान, बंग्लादेश और अफगानिस्तान से आए धार्मिक अल्पसंख्यकों को देश में बसाया जाए. लेकिन उनको ये साबित करना होगा कि उनके मूल देश में उनको धर्म की वजह से प्रताड़ित किया जा रहा है. इसमें भी 2015 का कट ऑफ साल दिया गया है. हालांकि ये विधेयक अभी संसद में लंबित है. कानून के जानकार बता रहे हैं कि जो लोग 2015 से पहले आए हैं, उनके लिए इन नियमों के मुताबिक दस्तावेज़ देना मुश्किल हो सकता है. इसके अलावा भेदभाव के लिए इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. इस कानून के अमल में आने के बाद भी ऐसे लोगों को लॉग टर्म वीज़ा ही दिया जा सकता है.

बीजेपी ने बनाया हिंदू-मुस्लिम मुद्दा

असम में बाहरी और घरेलू का मुद्दा था. एनआरसी में बाहरी लोगों की पहचान होनी थी. धर्म का कोई प्रावधान नहीं था. लेकिन बीजेपी को लगा कि इससे राजनीतिक फायदा उठाया जा सकता है. इसलिए तरीके से इस मसले को हिंदू बनाम मुसलमान बना दिया गया है. जिसका विरोध कांग्रेस की तरफ से किया जा रहा है. लेकिन राजनीतिक दबाव की वजह से मानवीय पहलू पर ज़ोर दिया जा रहा है.

कोर्ट का रूख

सुप्रीम कोर्ट सरकार से एसओपी लाने की बात कह रही है, जिसका इंतज़ार है. कोर्ट ने एनआरसी से जुड़े दो अधिकारियों को फटकार लगाई है कि बिना कोर्ट से पूछे बयानबाज़ी ना करे, कोर्ट ने कहा कि ये अधिकारी अवमानना के दोषी हैं. ज़ाहिर है कोर्ट का रवैया सख्त है. अदालत ने कहा है कि एनआरसी अभी ड्राफ्ट है इसलिए कोई कार्रवाई ना की जाए. सुप्रीम कोर्ट भी इतनी ज्यादा संख्या से चितिंत है.

फाइनल सूची से बाहर रहने वालों का क्या?

फाइनल सूची से बाहर रहने वालों को देश से बाहर करना आसान नहीं है. इनको डिटेंशन सेंटर में रखा जा सकता है. लेकिन इतनी बड़ी तादाद को रखना भी आसान काम नहीं है. असम में अभी तकरीबन 1000 लोग डिटेंशन सेंटर में रह रहे हैं. बांग्लादेश ने ऐसे लोगों को अपना नागरिक मानने से इनकार कर दिया है, जो लोग वापिस भेजे गए है, उनको कैसे भेजा गया है. एक सवाल है. जब बांग्लादेश उनको लेने से इनकार कर रहा है तो क्या सीमा पर पुशबैक किया गया है? अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट से ऐसे लोगों के बॉयमीट्रिक कराने का सुझाव दिया है, जिससे एनआरसी से बाहर रह गए लोग असम से बाहर ना जा पाए. जानकार मानते हैं जिन लोगों को वापिस भेजना मुश्किल है, उनको लॉन्ग टर्म वीज़ा पर रखने की मजबूरी बन सकती है. हालांकि देश में रिफ्यूजी कानून के अभाव में सरकार को नया तरीका अख्तियार करना पड़ सकता है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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