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हिंदु-मुस्लिम परिवारों के बच्चों की अदला-बदली केस में कोर्ट का गजब फैसला

कोर्ट ने कहा कि वयस्क होने पर बच्चे इसका फैसला खुद करेंगे कि वो पालन-पोषण करने वाले पिता के पास रहेंगे या फिर अपने जैविक माता-पिता के साथ

Updated On: Jan 25, 2018 08:23 PM IST

FP Staff

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हिंदु-मुस्लिम परिवारों के बच्चों की अदला-बदली केस में कोर्ट का गजब फैसला

असम के एक अस्पताल में बच्चा बदलने वाले मामले का कोर्ट में सुखद अंत हो गया. कोर्ट ने मुस्लिम परिवार को हिंदू बच्चे और हिंदू परिवार को मुस्लिम बच्चे के पालन पोषण की अनुमति दे दी. अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि वयस्क होने पर बच्चे इसका फैसला खुद करेंगे कि वो पालन-पोषण करने वाले पिता के पास रहेंगे या फिर अपने जैविक माता-पिता के साथ. बच्चों का परिवार उन्हें बदलना नहीं चाहता है लेकिन वो चाहते हैं कि इस मामले में अस्पताल को दंडित किया जाए.

ये किसी बॉलीवुड फिल्म की कहानी जैसा है. 2015 में दो बच्चों का जन्म होता है, एक का जन्म होता है बोडो परिवार में और दूसरे का जन्म होता है असम के डारंग जिले के मुस्लिम परिवार में. लेकिन जन्म के बाद दोनों बच्चे अस्पताल में बदल जाते हैं. घटना के तीन साल बाद, कई प्रयासों परामर्श और डीएनए परीक्षण के बाद दोनों परिवारों ने बच्चों के आदान-प्रदान पर सहमति व्यक्त की. लेकिन जब बच्चों को सौंपने का दिन आया तो दोनों ही बच्चों ने अपनी उन मांओं को छोड़ने से मना कर दिया, जिन्होंने उन्हें अभी तक पाला था. डर की वजह से दोनों बच्चे अपनी मां से चिपके रहे. इसके बाद भावनाओं से ऊपर उठते हुए परिवार ने बच्चों की अदला-बदली के खिलाफ फैसला किया.

यह सब 11 मार्च 2015 को मंगोलदेवी सिविल अस्पताल में शुरू होता है, जहां शहाबुद्दीन अहमद की पत्नी सलमा परबिन ने एक लड़के को जन्म दिया. जन्म के बाद से ही सलमा को बच्चे पर कुछ संदेह हुआ. सलमा ने कहा कि जब उसने बच्चे का चेहरा देखा, तो उसका चेहरा परिवार में किसी के साथ कोई मेल नहीं खा रहा था. बल्कि बच्चे का चेहरा एक बोडो महिला से मिल रहा था जिसे उसी दिन अस्पताल में डिलीवरी के लिए भर्ती कराया गया था.

सलमा ने अपने मन में आ रहे विचारों को अपने पति को बताया, जिन्होंने अस्पताल से संपर्क किया. वहीं दूसरे जोड़े अनिल और शेवाली बोरो को तब तक संदेह नहीं था कि उनका बच्चा अस्पताल में बदल गया था, जब तक उन्हें अहमद के पत्र नहीं मिला. बोडो परिवार इस पर विश्वास नहीं कर पा रहा था कि ऐसा अस्पताल में संभव है, ना ही उसकी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्य. लेकिन जब दोनों परिवारों ने मुलाकात की तो चीजें बदल गईं.

शाहबुद्दीन अहमद ने बताया कि अब हम हमारे बच्चों को नहीं बदलेंगे. हालांकि, अगर वे निकट भविष्य में अपने जैविक माता-पिता के पास वापस जाना चाहते हैं, तो वे जाने के लिए स्वतंत्र हैं. इस मामले पर अदालत अपनी फैसले देगी, लेकिन अब हम यही चाहते हैं. अहमद ने बताया कि अस्पताल के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई ताकि निकट भविष्य में ये कहानी दोहराई न जाए. हम एक दूसरे के घर जा रहे हैं और लगातार संपर्क में हैं.

दोनों परिवारों ने पुलिस से परामर्श करने के बाद बच्चों को बदलने के लिए अदालत में एक संयुक्त याचिका दायर की. अदालत ने 4 जनवरी का दिन बच्चों की अदला-बदली का तय किया. दोनों पक्ष तय दिन पर कोर्ट में आते हैं. लेकिन कोर्ट में दोनों बच्चे ने अपने जैविक माता-पिता के पास जाने से इनकार कर दिया. दोनों ने अपने वर्तमान मां और पिता के साथ रहना पसंद किया. इस पर कोर्ट ने अगली तारीख 24 जनवरी निर्धारित कर दी. 24 जनवरी यानि बुधवार को दोनों परिवार एक बार फिर अदालत में पहुंचे, लेकिन एक अलग अनुरोध के साथ. उन्होंने कोर्ट में कहा कि हमारे बच्चे जैसे थे और जिसके साथ थे वैसे ही रहेंगे. हमेशा के लिए.

अदालत से बाहर निकले शाहबुद्दीन के वकील ने बताया कि दोनों परिवार ने बच्चों के भविष्य को देखते हुए उन्हें नहीं बदलने का फैसला किया है, हालांकि, भविष्य में अगर बच्चे स्विच करना चाहते हैं तो वे सिविल कोर्ट के माध्यम से ऐसा कर सकते हैं. दोनों परिवार ने समाज के लिए एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है. अदालत ने इस घटना पर यथास्थिति बरकरार रखी है जैसा माता-पिता ने मांग की थी.

(साभार न्यूज18)

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