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बड़े पर्यावरण संकट को टाल सकता है पराली को खाद में बदलने का आइडिया

किसानों को पराली के जरिए खाद बनाने के तरीकों पर गंभीरता से ध्यान देना होगा अन्यथा पराली जलाने की वजह से पैदा हो रहा पर्यावरण संकट और भयावह होता जाएगा

Updated On: Nov 02, 2018 08:59 PM IST

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada

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बड़े पर्यावरण संकट को टाल सकता है पराली को खाद में बदलने का आइडिया
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राष्ट्रीय राजधानी में हर शख्स की दाल की कटोरी के बगल में प्लेट पर मौजूद सफेद चावल का अप्रत्यक्ष तौर पर संबंध हवा में घुले पार्टिक्युलेट मैटर (पीएम) से है. बहरहाल, इस बात में कोई दो राय नहीं है कि यह चावल पोषण और अस्तित्व बचाने का प्रतीक है. हालांकि, चावल के खेत से प्लेट तक के सफर के बारे में बयां करना भी आसान नहीं है और जाहिर तौर पर यह खाद्यान्न भी सांस लेने जैसा ही अहम है.

राष्ट्रीय राजधानी से 350 किलोमीटर उत्तर और पंजाब राज्य की दक्षिण पश्चिम दिशा में सूबे का श्री मुक्तसर साहिब जिला है, जहां बड़े पैमाने पर धान की खेती होती है.

इस बार पराली जलाने के खिलाफ काफी हद तक बढ़ी जागरूकता

यहां पर पिछले साल तक उदेकरण ग्राम पंचायत के किसान सुखचैन सिंह जैसे लोग गेहूं की अगली फसल की बुआई से पहले धान की फसल के अवशेषों (पराली) को जला दिया करते थे. उन्होंने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि हर एक एकड़ जमीन में 10 टन पराली (धान की फसल का अवशेष) होता है, जिसे जानबूझकर जलाया जाता था. दरअसल, इससे छुटकारा पाने का एकमात्र जरिया इसे 2,000 रुपये में ठेकेदार को बेचना होता था. पराली जलाने में सब्सिडी की कमी के कारण किसानों ने ऐसी प्रणाली का सहारा लिया, जो बेहद सस्ता हो और खेतों को तुरंत साफ कर देता हो. जब पराली जलाने के कारण राष्ट्रीय राजधानी में इसके दुष्परिणाम नजर आने लगे तो राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने 2016 में इस सिलसिले में जुर्माने का प्रावधान किया.

एनजीटी की तरफ से आदेश दिया गया कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर में कहीं भी पराली जलाने संबंधी प्रतिबंध के नियमों का उल्लंघन करने पर 2,500 रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा. सुखचैन ने बताया कि हालांकि, इससे समस्या का हल इसलिए नहीं निकल पा रहा है, क्योंकि यहां किसान गरीब और भूखे हैं. साथ ही, ऐसा नहीं है कि वे अक्खड़पन, अवज्ञा या कुख्याति की नीयत से फसल की पराली जला रहे हैं.

यहां यह भी बताना जरूरी है कि जुर्माने वाले नियम के परिणामस्वरूप किसान रातों में पराली जलाने लगे या स्थानीय प्राधिकरणों से बचने के लिए खुद को एकजुट करने के लिए सक्रिय हो गए. सुखचैन सफाई अभियान और शौचालयों के निर्माण जैसे स्वच्छ भारत अभियान से संबंधित गतिविधियों में भी नगर निकाय कर्मियों के साथ मिलकर भूमिका निभाते हैं. उन्होंने बताया कि इस साल पर्यावरण संबंधी नुकसान को लेकर जागरूकता में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी नजर आ रही है.

बड़े अधिकारियों की अगुवाई में पराली को कंपोस्ट बनाने का अभियान दरअसल, सुखचैन उन सैकड़ों किसानों की जमात में भी शामिल हैं, जो धान की पुआल को कंपोस्ट में बदलने के मकसद से लिए चलाए जा रहे अभियान में हिस्सा ले रहे हैं. इस पूरे अभियान का कॉन्सेप्ट सी श्रीनिवासन ने तैयार किया है, जो ठोस कचरे के प्रबंधन से जुड़े एसडब्ल्यूएम नियम 2016 के पालन के लिए बनी सर्वोच्च निगरानी कमेटी के सदस्य हैं.

पराली को गाय के गोबर और पानी के साथ मिलाकर कंपोस्ट बनाने की एक तस्वीर

पराली को गाय के गोबर और पानी के साथ मिलाकर कंपोस्ट बनाने की एक तस्वीर

छह दिनों तक चलने वाला यह कार्यक्रम करमगढ़ और उदेकरण ग्राम पंचायत में आयोजित किया जा रहा है और श्रीनिवासन का कहना है कि इसमें मुक्तसर के डिप्टी कमिश्नर अरविंद कुमार और एडिशनल डिप्टी कमिश्नर (जनरल) डॉ. ऋचा जैसे वरिष्ठ पदाधिकारियों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जा रही है. इससे जल्द कार्यक्रम का प्रचार-प्रसार अन्य जिलों में भी हो सकता है.

नगर निगम के सैनिटरी इंस्पेक्टर राजकुमार ने बताया, 'मैं आपको इस कंपोस्ट को लेकर मोटा-मोटा अनुमान के साथ तमाम प्रक्रिया के बारे में बताता हूं. इसके तहत हम दो किलो गाय का गोबर लेते हैं और इसे 100 लीटर पानी के साथ मिलाते हैं और इसके बाद इसे पराली के ढेर में भिगोते हैं, जो 6 फुट ऊंचा होता है. गोबर का बैक्टीरिया धीरे-धीरे पुआल में पहुंच जाता है और इसे खाद में बदल देता है.'

राजकुमार किसानों के साथ मिलकर इस प्रक्रिया को लेकर काम कर रहे हैं. उनका कहना था, 'अभी इस तरह के अभियान पर काम करने के लिए श्रम संबंधी लागत के रूप में करीब-करीब 4,000 रुपये खर्च करने होते हैं, जिससे किसानों को 30,000 का रिटर्न मिल सकता है. हालांकि, अगर मशीन द्वारा तमाम सामग्री को इकट्ठा कर इस दिशा में काम किया जाता है, तो लागत को काफी हद तक कम भी किया जा सकता है.'

इस मॉडल से खाद व्यापार और रोजगार को भी मिल सकता है बढ़ावा

ठोस और तरल संसाधन प्रबंधन (एसएलआरएम) के इस वेल्लोर मॉडल के पीछे मुख्य दिमाग सी श्रीनिवासन का ही है. इसके तहत कचरे को अलग कर इसकी प्रोसेसिंग की जाती है. इस मॉडल में दिन में दो बार कचरा इकट्ठा किया जाता है और रोजाना ऐसा किया जाता है.

इस मॉडल के तहत इकट्ठा किए गए गैर-जैविक कचरे को तुरंत साफ कर इसकी प्रोसेसिंग की जाती है. साथ ही, इसे तैयार कर बिक्री के लिए इसकी पैंकिंग की जाती है और बैक्टीरिया के रूप में गाय के गोबर के घोल को मिलाने के बाद जैविक कचरे को एरोबिक कंपोस्ट टैंकों या गट्ठरों में फैलाया जाता है.

श्रीनिवासन का कहना था कि इससे खाद संबंधी व्यापार और मनरेगा के तहत रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है. उन्होंने बताया, 'हम इस परियोजना पर अमल करने की खातिर किसानों से एक एकड़ के लिए 126 वर्ग फुट जमीन मुहैया कराने का अनुरोध कर रहे हैं,जहां पराली को कंपोस्ट बनने में करीब 60 दिनों का वक्त लगेगा. पराली नहीं जलाने और इस तरह से कंपोस्ट बनाने पर किसानों को 30 फीसदी पानी की बचत होगी और जाहिर तौर पर डीजल और ट्रांसपोर्ट लागत के मोर्चे पर भी किसानों को पहले की तुलना में कम खर्च करना होगा.'

स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने का भी प्रयास

स्वच्छ भारत अभियान के तहत सफाई की जिम्मेदारी आम लोगों को भी लेने की बात कही गई है. अभियान से जुड़ी इस भावना को ध्यान में रखते हुए कंपोस्टिंग की प्रक्रिया में स्थानीय लोगों के साथ मिलकर काम करने का अनुरोध किया जा सकता है, ताकि वित्तीय और पारिस्थितिक लिहाज से व्यावहारिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जा सके.

एसएलआरएम का पालन सुनिश्चित करने के लिए आस-पड़ोस के स्वयं-सहायता समूहों को जिम्मेदारियों के साथ कई तरह के अधिकार भी मुहैया कराए गए हैं और इन समूहों को सरकार की तरफ से कर्ज और सब्सिडी उपलब्ध कराया जाता है. एसएलआरएम संबंधी नियम के पालन के तहत 12 घंटे के भीतर कचरा उठाने की बात है.

मुक्तसर की एडिशनल डिप्टी कमिश्नर (जनरल) डॉ ऋचा के मुताबिक इस तरह के मामलों में जागरूकता का काफी अभाव है. उनका यह भी कहना था कि अगर सूखी पत्तियों से खाद बनाई जा सकती है, तो धान के अवशेषों यानी पराली से क्यों नहीं ऐसा किया जा सकता. उन्होंने बताया, 'यहां जो मॉडल तैयार हो रहा है, वह अन्य जिलों के किसानों को भी प्रेरित कर सकता है. हमारा अन्य जिलों के किसानों से उदेकरण आकर कंपोस्टिंग के फायदे को समझने का अनुरोध कर रहे हैं.'

श्री मुक्तसर साहिब के बागबानी विकास अधिकारी गुरप्रीत सिंह किसानों को पराली जलाए जाने से हवा, पानी और मिट्टी को होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी दे रहे हैं. उन्होंने बताया, 'हम किसानों को इस तथ्य से पूरी तरह अवगत करा रहे हैं कि 10 क्विंटल पराली जलाने से 70 फीसदी कार्बन डाइऑक्साइड, 7 फीसदी कार्बन मोनोक्साइड और 0.29 फीसदी मिथेन पर्यावरण में पैदा होता है.'

खेतों में जलती हुई पराली

खेतों में जलती हुई पराली

उन्होंने जीरो टिलिंग (जुताई) फार्मिंग का भी सुझाव दिया. इसमें रोटावेटर का इस्तेमाल जरूरी हो जाता है और इस रोटावेटर का इस्तेमाल पराली को पीसने और अवशेषों को हटाने और मिलाने में किया जाता है. इस समस्या से निपटने का एक और हल धान की छोटी अवधि की किस्म विकसित करना भी हो सकता है.

उत्तर भारत में किसान अगर पराली जलाते हैं तो वे उसके साथ ऑर्गेनिक कार्बन, फॉस्फेट, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस को भी मिट्टी से खत्म कर रहे हैं. और वे सिर्फ पैसा बचाने के लिए ऐसा कर रहे हैं, जो उन्होंने मेहनत से कमाया है और जिसके लिए उन्हें खेतों में कड़ी मशक्कत करने की जरूरत होती है. सी श्रीनिवासन को लगता है कि हर किसो को शिक्षित और जागरूक करने संबंधी मिशन और जिला प्रशासन के सहयोग से एक बड़े संकट को उसके जड़ से खत्म किया जा सकता है.

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