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जेलीफिश की संख्या बनी दुनिया के लिए मुश्किल का सबब, हम क्या करेंगे?

मॉनसून की बारिश से धुले गोवा में मैंने हाल ही में एक हफ्ता बिताया लेकिन समुद्र-तट पर नहीं गई. पूछिए कि इसकी वजह क्या रही? बीच पर ना जाने की वजह रही जेलीफिश.

Updated On: Oct 31, 2018 09:12 PM IST

Maneka Gandhi Maneka Gandhi

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जेलीफिश की संख्या बनी दुनिया के लिए मुश्किल का सबब, हम क्या करेंगे?
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मॉनसून की बारिश से धुले गोवा में मैंने हाल ही में एक हफ्ता बिताया लेकिन समुद्र-तट पर नहीं गई. पूछिए कि इसकी वजह क्या रही? बीच पर ना जाने की वजह रही जेलीफिश.

गोवा की सरकार ने समुद्रतट पर जाने वालों के लिए चेतावनी जारी की थी बीच और तटीय इलाके के पानी में बड़ी संख्या में जीवित और मृत जेलीफिश भरी हुई है. जेलीफिश एक समुद्री जीव है. इसके तंतु लंबे और लसलसे होते हैं. जेलीफिश बहुत सुंदर होती है लेकिन घातक भी.

जेलीफिश की अबतक तकरीबन 1200 प्रजातियों का पता चला है. कुछ जेलीफिश इतनी छोटी होती है कि तैराकी के दौरान आपकी पेट में चली जाएं जबकि कुछ जेलीफिश 200 किलोग्राम की भी हो सकती है. भारतीय समुद्रतट पर फिलहाल ब्लू बॉटल और पुर्तगाली मैन ऑफ वार जेलीफिश ने धावा बोला है. इनके लंबे (तकरीबन 10 फीट तक) तंतुओं पर दंतकोशिका(निमेटोसिस्ट) होती है. निमेटोसिस्ट महीन और नोंकदार होता है. यह मनुष्य के शरीर को चीरकर उसमें जहर छोड़ सकता है. मरी हुई जेलीफिश समुद्र तट के किनारे जमा हो जाती हैं और इस अवस्था में भी यह घातक साबित हो सकती हैं क्योंकि निमेटोसिस्ट नमी वाले माहौल में महीनों तक कारगर बने रहते हैं.

जेलीफिश की चपेट में आए व्यक्ति को चमड़ी पर खुजली, मांसपेशियों में खिंचाव, सिरदर्द, मिचली, डायरिया (अतिसार) और बुखार का अनुभव हो सकता है. कुछ मामलों में ये लक्षण ज्यादा गंभीर रूप ले सकते हैं. ऐसी अवस्था में व्यक्ति बहुत ज्यादा दर्द का अनुभव करता है, उसे सांस लेने में दिक्कत पेश आती है. ऐसे में हार्टअटैक आ सकता है और मौत भी हो सकती है.

जेलीफिश की आबादी बेतहाशा बढ़ी है और इस कारण समुद्र तट पर जाना मनुष्यों के लिए खासा खतरनाक हो चला है. हर साल, हजारों लोग जेलीफिश की दंश के शिकार होते हैं. मुंबई, गोवा, केरल, तमिलनाडु तथा आंध्रप्रदेश के बिच(समुद्र-तट) पर मॉनसून के दिनों में ही जेलीफिश की परेशानी रहा करती थी. लेकिन अब जेलीफिश का खतरा सालों भर बरकरार रहता है. खबर आई है कि विशाखापट्टनम के समुद्र-तट पर भी जेलीफिश ने उत्पात मचा रखा है. विखापट्टनम के समुद्र तट पर ऐसा पहली बार हुआ है.

ऑस्ट्रेलिया और दक्षिणपूर्वी एशिया में अत्यंत घातक बॉक्स जेलीफिश पाई जाती हैं. इसके जहर के असर से हृदय काम करना बंद कर देता है. फिलीपीन्स में सालाना 20-40 लोग बॉक्स जेलीफिश की चपेट में आकर जान गंवाते हैं.

एक जेलीफिश का नाम है इरुकंडजी. यह चीनी के चौकोर टुकड़े के बराबर होती है और इसके डंक का पता नहीं चलता. इरुकंडजी का डंक लगने के दस मिनट के बाद इसकी चपेट में आए व्यक्ति को पीठ के निचले हिस्से में तेज दर्द का अहसास होता है. उसे लगातार उल्टी आती है. फेफड़े के जिन कोष्ठकों में हवा जाती है वो सिकुड़ जाते हैं और आखिर को हार्टअटैक आता है. जीवविज्ञानी टिम फेलेनरी ने लिखा है, 'इरुकंडजी ने कितने लोगों को शिकार बनाया है इसे जान पाना बेहद मुश्किल है. कई दफे स्ट्रोक, हार्टअटैक या फिर डूबने के कारण मौत हो जाती है.'

अभी हर साल गर्मी के मौसम में भूमध्यसागरीय इलाके में तकरीबन 150,000 लोगों को जेलीफिश के डंक का इलाज करवाना पड़ रहा है.

जेलीफिश सिर्फ डंक ही नहीं मारती. इस समुद्री जीव का आर्थिक और इकोलॉजिकल असर भी ज्यादा है. पूरी दुनिया में आहार-ऋंखला में व्यवधान पैदा करके जेलीफिश ने हंगामा बरपा कर रखा है. जेलीफिश के कारण पनबिजली बनाने के संयंत्रों में गड़बड़ी पैदा होती है और पर्यटन के अवसरों पर भी असर पड़ता है.

जेलीफिश का आहार है प्लेंक्टॉन और इक्थाइयोप्लांक्टॉन. यों जेलीफिश मछली का अंडा और लार्वा खाती है. वो छोटी-छोटी मछलियों को भी अपना आहार बनाती है. इसकी वजह से मछली की तादाद कम हो जाती है. जेलीफिश रोजाना अपने शरीर के भार से दस गुना ज्यादा भोजन कर सकती है.

सन् 1980 के दशक में ब्लैक सी में फॉरेन शिप(विदेशी जहाज) अपने ब्लास्ट वाटर में अमेरिका से कॉम्ब जेलीफिश लेकर आए. यह जेलीफिश ब्लैक सी में खूब फली-फूली. इसने ब्लैक सी में एंकोवी फिश तथा मैकरेल फिश को चट कर डाला. इस तरह ब्लैक सी के सहारे खड़ी की गई 350 मिलियन डॉलर की फिश इंडस्ट्री बर्बाद हो गई. जेलीफिश एंकोवी मछली के अंडे और लार्वा को अपना आहार बनाती है. एंकोवी मछली जूप्लेक्टॉन को खाती है जबकि जेलीफिश इस जूप्लेक्टॉन को भी खा जाती है. ऐसे में एंकोवी मछली का उत्पादन चौपट हो गया और जेलीफिश की तादाद खूब बढ़ आई. साल 1993 तक ब्लैक सी के बॉयोमॉस में 95 फीसद तादाद जेलीफिश की हो चली थी.

jelly fish

जेलीफिश अब हर ओर पसर चुकी है. भारत के मछुआरों के जाल में जेलीफिश की भरमार है. केरल में नदमुख(एस्चुअरिज) जेलीफिश से भर चले हैं. समुद्र के तट के आसपास जहाजों से मछली पकड़ने जाइए तो बड़ी मात्रा में जेलीफिश हाथ लगती है.

न्यूक्लियर और थर्मल विद्युत-संयंत्र (पावर प्लांट) प्रशीतन(कूलिंग) के लिए समुद्र तटीय जल का इस्तेमाल करते हैं और गर्म पानी फिर से समुद्र में छोड़ते हैं. इससे तापमान 1 से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है और मीलों दूर तक समुद्र पर असर पड़ता है. जेलीफिश गर्म पानी में खूब बढ़ती है.

कलपक्कम(तमिलनाडु) के न्यूक्लियर ऊर्जा संयंत्र की उत्पादन क्षमता में जेलीफिश के कारण कमी आयी है. इस संयंत्र तक जिन पाइपों से पानी जाता है उनमें जेलीफिश की बढ़वार ने अवरोध पैदा कर दिया है. कई दफे ऐसा भी हुआ कि संयंत्र को अपना उत्पादन एकदम ही बंद कर देना पड़ा. अमेरिका, स्वीडन, चीन तथा जापान से भी ऐसी ही बातें सुनने को मिल रही हैं.

इन देशों में जेलीफिश के कारण न्यूक्लियर ऊर्जा संयंत्रों में अवरोध की वजह से आपातकालीन स्थिति पैदा हो रही है. इस कारण बिजली का उत्पादन रोकना पड़ रहा है और इसका खामियाजा इन देशों के शहर भारी आर्थिक हानि के रूप में चुका रहे हैं. जेलीफिश के कारण जापान में न्यूक्लियर ऊर्जा संयंत्रों को बार-बार बंद करना पड़ता है. 1999 में फिलीपीन्स के आधे हिस्से में बिजली गुल हो गई थी. फारस की खाड़ी में कई संयंत्र सन् 2000 से जेलीफिश के कारण बाधा का सामना कर रहे हैं. मस्कट से मेरीलैंड तक और दक्षिण कोरिया से स्कॉटलैंड तक हर जगह जेलीफिश की बढ़वार के कारण बिजली के उत्पादन पर असर पड़ा है.

जेलीफिश का वजूद सदियों से है. लेकिन इसकी आबादी अभी क्यों इतनी ज्यादा बढ़ी है ? सारा दोष हमारा है. मनुष्य जाति ने ही वैसे हालात पैदा किए हैं जिनकी वजह से पूरी दुनिया में जेलीफिश की तादाद बेतहाशा बढ़ी है.

खेतों तथा मानव-बस्तियों के अवशिष्ट (कूड़ा-कचरा) पानी में बहाए जाते हैं और पानी इन्हें समुद्र तक पहुंचा देता है. इससे इयूट्रोफिकेशन की स्थिति पैदा होती है. ग्रीक भाषा में इयूट्रोफॉस का अर्थ होता है ‘भरपूर पोषण’. सीवेज तथा रासायनिक खाद के नाइट्रेट और फॉस्फेट पानी में एल्गी तथा फाइटोप्लेंक्टान सरीखे सूक्षम पौधों को जन्म देते हैं.

एल्गी और फाइटोप्लेक्टॉन बढ़कर नदी, समुद्र या बांधों के पानी के ऊपरी सतह को पूरी तरह ढंक लेते हैं. एल्गी की मोटी हरी परत पानी के ऊपर मौजूद होने के कारण सूरज की किरणें भीतर तक नहीं पहुंच पातीं. इससे पानी के अंदर पनपने वाले पौधे तथा जीव मर जाते हैं. एल्गी पानी से ऑक्सीजन लेती है. इस कारण पानी में ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है और मछलियां तथा घोंघे मरने लगते हैं. पानी अम्लीय हो जाता है.

ऐसा माहौल जेलीफिश के लिए बहुत बेहतर साबित होता है और जेलीफिश की तादाद बढ़ने लगती है. इयूट्रोफिकेशन के कारण बड़ी मछलियां तो मरने लगती हैं लेकिन प्लेक्टॉन, लार्वा तथा अन्य सूक्ष्म जीव खूब बढ़ने लगते हैं. जेलीफिश इन्हें ही अपना आहार बनाती है. देखने में आया है कि समुद्र तटीय इलाकों में एल्गी के बढ़ने के साथ जेलीफिश की तादाद भी बढ़ी है.

इयूट्रोफिकेशन के कारण पानी साफ नहीं रह जाता और उससे होकर सूरज की किरणें भी नहीं गुजर पातीं. इसका फायदा जेलीफिश को होता है. मछलियां उन्हीं चीजों को खाती हैं जो नजर आती हैं जबकि जेलीफिश दिखाई ना पड़ने वाली चीजों को अपना आहार बनाती हैं. पानी के गंदा हो जाने के कारण मछलियों का भोजन तो कम हो जाता है लेकिन जेलीफिश का आहार बढ़ जाता है. जेलीफिश को जिन्दा रहने के लिए बहुत कम ऑक्सीजन की जरूरत होती है. मतलब, बाकी जीवों की तादाद तो घटने लगती है लेकिन जेलीफिश का साम्राज्य बढ़ते जाता है.

मनुष्यों ने बड़ी तादाद में मछलियों को अपना शिकार बनाया है. मछलियों के आखेट के बढ़ते जाने के साथ समुद्री कछुए, सॉलमन, मैकरल, ब्लूफिन टूना, पायलट ह्वेल तथा अल्बाट्रॉस सरीखे जीव जो जेलीफिश को अपना आहार बनाते हैं, बहुत कम हो गए हैं. मछलियों की लगभग 120 प्रजातियां और 30 समुद्री जीव जिसमें मशरुम कोरल भी शामिल है, जेलीफिश को अपना आहार बनाते हैं. दुर्भाग्य ये है कि इन मछलियों का व्यावसायिक उद्देश्यों से शिकार किया जाता है. छोटी मछलियों और प्लेक्टॉन को डॉल्फिन तथा बिलफिश भी अपना आहार बनाते हैं लेकिन ये भी लुप्त होने के कगार पर हैं. समुद्री कछुए समन्दर के पानी में बढ़ रहे प्लास्टिक के कारण मर रहे हैं.

एक तरह से देखें तो जेलीफिश को समुद्र में पूरी छूट मिली हुई है कि वह छोटी मछलियों और लार्वा को अपना आहार बनाए.

मछलियों का शिकार ज्यादा मात्रा में होने के कारण प्लेक्टॉन को बढ़ने का मौका मिला है. सार्डिन, एंकोवी तथा मेनहेडन सरीखी मछलियां प्लेक्टॉन खाती हैं. लेकिन मत्स्य-पालन के उद्योग के लिए इन मछलियों का आखेट किया जाता है. प्लेक्टॉन जेलीफिश का प्रिय आहार है और मछलियों का शिकार होने के कारण प्लेक्टॉन को आहार बनाने के मामले में जेलीफिश को अब पहले की तरह किसी प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ रहा.

jelly fish

जेलीफिश बड़ी मात्रा में प्लेक्टॉन खाती है. ऐसे में छोटी मछलियों के लिए आहार कम पड़ जाता है और वो अंडे देना बंद कर देती हैं. नोमुरा प्रजाति की जेलीफिश रोजाना इतना ज्यादा पानी पी लेती है कि उससे पूरा एक स्वीमिंग पूल बन जाये. इस प्रक्रिया में यह जेलीफिश बड़ी मात्रा में प्लेक्टॉन भी खा जाती है. जेलीफिश का पूरा आहार-ऋंखला पर बुरा असर पड़ता है.

जेलीफिश की बढ़वार पर कोई अंकुश ना होने के कारण अब इस प्रजाति ने छोटी मछलियों के अंडे को आहार बनाना शुरू किया है. साथ ही छोटी मछलियों के आहार को भी जेलीफिश अपना भोजन बना रही है. ऐसी स्थिति में जेलीफिश उन सारी जगहों पर काबिज हो गई है जहां पहले अन्य जन्तु-प्रजातियां पाई जाती थीं. नामीबिया में एंकोवी और सार्डिन मछली के आखेट के कारण 1988 के बाद इनकी संख्या काफी घट गई और इन मछलियों के निवास-स्थान पर अब दो किस्म के जेलीफिश का कब्जा है.

एक्वाकल्चर के कारण जेलीफिश की संख्या बढ़ रही है. पकड़ी गई मछलियां बड़ी आसानी से आहार बन जाती हैं. ऐसी मछलियों में भारत के जलागारों में पकड़कर रखे गये बड़े आकार के झींगों से लेकर स्कॉटलैंड, नार्वे और आयरलैंड के सालमन तथा ट्राउट तक शामिल हैं. अतिरिक्त भोजन उपलब्ध होने के कारण पानी में इयूट्रोफिकेशन होता है. एक्वाकल्चर के लिए तैयार किए गए जलागारों में छाया करने के लिए आवरण(शेड्स) डाले जाते हैं और इस वजह से जेलीफिश के पॉलिप को पनपने के लिए मददगार स्थिति मिलती है.

शोध-अध्ययनों से पता चलता है कि जेलीफिश की बढ़वार 1980 के दशक से शुरु हुई लेकिन पिछले दस सालों में जेलीफिश की तादाद से बहुत तेजी से बढ़ी है.

समुद्र में मनुष्यों ने कुछ ठिकाने बनाये हैं. ये ठिकाने जेलीफिश के प्रजनन के लिए आदर्श स्थान साबित हो रहे हैं. जेलीफिश के पुर्वंगक(पॉलिप्स) को ठोस आधार की जरुरत होती है. ठोस आधार पर चिपककर ही पुर्वंगक(पॉलिप्स) अपनी संख्या बढ़ाता, विकसित होता और संतानोत्पत्ति करता है. बांध, ग्रेनाइट सीवॉल, डॉक, आर्टिफिशियल रीफ, तैरते हुए प्लास्टिक के अपशिष्ट, जहाज, समुद्र में मौजूद तेल उत्पादन के ठिकाने- ये सारी जगहें जेलीफिश के पुर्वंगक(पॉलिप) के पनपने में मददगार हैं. पानी में मौजूद सिगरेट के पैकेट्स, प्लेट्स तथा धार्मिक अवसरों पर इस्तेमाल होने वाली देवमूर्तियां तक पुर्वंगक के चिपकने और बढ़ने के लिए आधार का काम करते हैं.

पारिस्थितिकी तंत्र(इकोसिस्टम) संकट में हो तो जेलीफिश ऐसी स्थिति में अपना विस्तार करती है. जीवविज्ञानी लीजा एन गर्सविन ने लिखा है, 'समुद्र पर दबाव ज्यादा है और जैसे किसी घायल मेमने के ऊपर बाज मंडराता है उसी तरह जेलीफिश समुद्र पर मंडरा रही है- इसे समुद्र के कमजोर पड़ जाने का लक्षण मत समझिए, दरअसल जेलीफिश समुद्र के लिए मृत्यु-दूत बनकर आई है..'

हमें समुद्र और समुद्र में रहने वाले जीव-जंतुओं के साथ अपना बरताव फौरन बदलने की जरूरत है. सबसे पहले तो इयूट्रोफिकेशन पर अंकुश लगाना जरूरी है. हम बेपरवाह होकर समुद्र में अपशिष्ट बहा रहे हैं. इसी के जरिए पोषक-तत्व समुद्र में पहुंचते हैं. सो, समुद्र में बेलगाम अपशिष्ट पदार्थ बहाने में कमी लानी होगी. जो कुछ कूड़ा-कचरा समुद्र में बहाया जा रहा है उसका पहले अच्छी तरह शोधन(ट्रीटमेंट) किया जाना चाहिए. शोधन के बाद ही कूड़ा-कचरा समुद्र में बहाया जाना चाहिए.

मछली का शिकार बहुत ज्यादा बढ़ गया है. इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है. मछली मारने में अभी विशाल आकार के ट्रालर्स का इस्तेमाल होता है. इसमें एक बार में ही टनों मछलियां फंसती हैं. फंसी हुई मछलियों का 90 फीसद हिस्सा बेकार जानकर फेंक दिया जाता है. हमें इस चलन को तत्काल रोकना होगा. सरकार को तय करना चाहिए कि किस मात्रा में मछलियों का शिकार किया जाये. ऐसा करने से मछलियों की संख्या बढ़ेगी जो जेलीफिश को अपना आहार बनाती हैं.

समुद्र में बंदरगाह या फिर तेल निकालने के संयत्र सरीखे कुछ स्थायी ठिकाने बने हुए हैं. इनकी नियमित सफाई जरूरी है ताकि जेलीफिश की पुर्वंगक(पॉलिप) इन पर ना पनपें. दरअसल समुद्र में स्थाई ठिकाने बनाने के चलन को रोका जाना जरुरी है.

मुझे पता है कि इन उपायों में लंबा समय लगेगा लेकिन समाधान का और कोई विकल्प मौजूद नहीं है. अगर इन उपायों को अपनाने में ज्यादा देर होती है तो हमारे हाथ बंध जायेंगे. जेलीफिश समुद्र पर पूरी तरह कब्जा कर लेगी और हम कुछ नहीं कर पाएंगे.

जीवों के विकास-क्रम के नजरिए से देखें तो जेलीफिश अपने शरीर की बनावट के कारण समुद्र पर कब्जा करने में सक्षम है. जेलीफिश समुद्र की सतह या फिर किसी सख्त सतह पर संतान जनती है और संतान पैदा करने की उसकी क्षमता भी बहुत ज्यादा(रोजाना कई हजार) है. यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया के जेलीफिश एक्सपर्ट लुकास ब्रोत्ज का कहना है कि जेलीफिश की बढ़वार अपनी तीव्रता और बारंबारता में उफान पर है. समुद्र के 45 इकोसिस्टम के के अपने अध्ययन के बाद ब्रोत्ज ने पाया कि 1950 से जेलीफिश की बढ़वार में 62 फीसद का इजाफा हुआ है.

jelly fish

तो क्या भविष्य में समुद्र जेलीफिश से भर उठेंगे ? जेलीफिश समुद्र में एक प्रभावी प्रजाति बनकर उभरी है. मछलियों खत्म हो रही हैं और इस खाली जगह को जेलीफिश भरते जा रही है.

अगले दो दशक में वैश्विक तापमान तकरीबन 0.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. समुद्र के गर्म होने से जेलीफिश की तादाद भी बढ़ेगी. जलवायु-परिवर्तन से समुद्र की धाराएं बदलती हैं और धाराओं के बदलने से नयी जगहों पर जेलीफिश की बढ़वार होने लगती है.

अनुमानों के मुताबिक विश्व की आबादी 2050 तक 46 फीसद बढ़ जायेगी. समुद्र पर मनुष्य का असर और मांग बढ़ेगी. बिजली की मांग बढ़ने के कारण ज्यादा बांध बनाये जायेंगे, ज्यादा तादाद में ऊर्जा संयंत्र लगाने होंगे. इससे तटवर्ती इलाकों में समुद्र का पानी और ज्यादा गर्म होगा. मिसाल के लिए, चीन के अभी तीन न्यूक्लियर संयंत्र चालू हालत में हैं और 4 संयंत्रों का निर्माण जारी है.

उर्वरक(फर्टिलाइजर) का इस्तेमाल बढ़ेगा, खासकर एशिया में. इससे इयूट्रोफिकेशन दोगुना हो जायेगा. वैश्विक स्तर पर एक्वाकल्चर 1997 से 2020 की अवधि तक दोगुना हो चला है. ज्यादा बढ़वार विकासशील देशों में हुई है. मछली के आखेट में ज्यादा बढ़वार का अर्थ है तटवर्ती इलाकों का ज्यादा से ज्यादा विकास और यह स्थिति जेलीफिश के बढ़ने के लिए अनुकूल है क्योंकि जेलीफिश अम्लीय, गर्म तथा प्रदूषित पानी में जीवित रहने में सक्षम है.

हमारे समुद्र का पारिस्थितिकी-तंत्र (इकोसिस्टम) तकरीबन खात्मे की कगार पर है. इसके साथ ही एक नया इकोसिस्टम आकार ले रहा है जिसमें आहार-ऋंखला के शीर्ष पर मौजूद है जेलीफिश. एक बार यह आहार ऋंखला स्थाई रूप ले ले तो फिर इसे हटा पाना बहुत मुश्किल होगा. मछलियां खत्म हो जाएंगी- भले ही हम मछली मारना बंद कर दें. जेलीफिश मछलियों का पुनर्वास मुश्किल कर देंगी क्योंकि वो लार्वा खाती है.

जेलीफिश का समुद्र पर पूरी तरह कब्जा हो जाने के बाद ग्लोबल वार्मिंग(वैश्विक तापन) और ज्यादा तेज हो जायेगा. जेलीफिश के म्यूकस तथा मल में बहुत ज्यादा कार्बन होता है और यह कार्बन जलवायु परिवर्तन में मददगार है. समुद्री बैक्टीरिया संतान जनने में जेलीफिश का इस्तेमाल करता है. इससे और ज्यादा कार्बन डायआक्साइड तथा मीथेन का उत्सर्जन होता है. 'स्टंग' के लेखक गर्सविन का कहना है, 'जलवायु परिवर्तन जेलीफिश की बढ़वार में सहायक है और जेलीफिश की बढ़वार जलवायु-परिवर्तन में और एक-दूसरे को बढ़ावा देने वाले इस रिश्ते का अंत कहां होगा, कोई नहीं जानता.'

जल्दी ही आपको मछली की जगह जेलीफिश की करी खाने को मिलेगी. आठ देशों के वैज्ञानिकों ने गो’जेली नाम का एक प्रोजेक्ट शुरू किया है. इस प्रोजेक्ट में जेलीफिश पर आधारित उत्पाद जैसे वाटर फिल्टर, फिश फीड, फेश क्रीम, खाद, भोजन, नमक, एल्कोहल तथा कारों के लिए जेलीफिश एथेनॉल बनाए जाएंगे.

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