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अर्थव्यवस्था पर सरकार की अधूरी तस्वीर पेश कर रहे हैं अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा

निजी नाराजगी के चलते ये दोनों नेता सरकार के कई अच्छे कामों की अनदेखी कर रहे हैं

Updated On: Oct 07, 2017 02:22 PM IST

Krishna Srivatsa

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अर्थव्यवस्था पर सरकार की अधूरी तस्वीर पेश कर रहे हैं अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा

यशवंत सिन्हा और अरुण जेटली के बीच छिड़ी ज़ुबानी जंग, इन्फ़ोसिस में नारायण मूर्ति और विशाल सिक्का के बीच की तनातनी से काफ़ी मिलती है. दोनों ही मामलों में जो लोग काफी पहले रिटायर हो चुके हैं, वो पुरानी ज़िम्मेदारियों को हासिल करने की उम्मीद लगाए बैठे हैं. जब उनकी अनदेखी होती है, तो वो गुस्से में खुलेआम बयानबाजी करते हैं. ऐसा करके वो अपनी जिंदगी भर की कमाई शोहरत को दांव पर लगा बैठते हैं.

दोनों मामलों को देखें तो नारायण मूर्ति कई बातों में सही लगते हैं. हालांकि ये बात यशवंत सिन्हा के बारे में नहीं कही जा सकती. ये बात जरूर है कि अपनी अनदेखी से कोई भी नाराज होता है. चाहे वो पूर्व वित्त मंत्री हों, या फिर नारायण मूर्ति हों.

लेकिन यशवंत सिन्हा ने जो लेख लिखा, उसमें उन्होंने अपने आरोप किसी ठोस सबूत या आंकड़ों की बुनियाद पर नहीं लगाए. इसीलिए वो कई मामलों में गलत हैं. तो आखिर ये हंगामा क्यूं हो रहा है?

इसी तरह अरुण शौरी का भी मामला है. वो देश के बेहद काबिल अर्थशास्त्रियों में से एक हैं. लेकिन वो मोदी पर निजी हमले कर रहे हैं. ऐसा करके वो अपनी शोहरत को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं. शौरी का मोदी पर लगातार हमला उनकी खीझ को दिखाता है. क्योंकि वो जो आंकड़े पेश कर रहे हैं, वो पूरी सच्चाई नहीं हैं. अगर 2014 में अरुण शौरी ने नीति आयोग के उपाध्यक्ष का पद ले लिया होता, तो वो तथ्यों की बुनियाद पर मोदी सरकार पर हमले करते. लेकिन फिलहाल तो वो अधकचरी सच्चाई को हमले की बुनियाद बना बैठे हैं.

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पहली बात तो ये है कि 2014-15 के मुकाबले आज विकास दर धीमी हो गई है. लेकिन सालाना विकास दर की तुलना किसी तिमाही की विकास दर से करना कहां तक सही है? एक दिन पहले ही विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि 2017-18 में भारत की विकास दर करीब 7 फीसद रहेगी.

महंगाई और विकास दर की तुलना करें तो आज की तारीख में हम महंगाई को भी कम देख रहे हैं और साथ ही विकास दर भी ठीक है. महंगाई की ही बात करनी है तो इस सरकार के पहले की सरकार के आंकड़े देखें तो तस्वीर खुद ब खुद साफ हो जाती है.

महंगाई पर कसा है शिंकजा

मोदी सरकार की आलोचना करने वाले ये भूल जाते हैं कि मौजूदा सरकार ने महंगाई पर पूरी तरह से शिकंजा कसा हुआ है. विकास दर जरूर गिरी है, मगर इसमें चौंकाने वाली क्या बात है? तेल के दाम में भारी गिरावट की वजह से विकास दर उठी थी. मगर अब जबकि तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, तो कंपनियों के मुनाफे में कमी आ रही है.

देश में खपत का स्तर नोटबंदी के पहले के स्तर तक वापस पहुंच गया है. हां, निवेश की रफ्तार जरूर धीमी है. लेकिन, इसे विकास के रथ का रुकना कहना तो शरारत के सिवा कुछ और नहीं.

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जीएसटी काउंसिल की मीटिंग. फोटो सोर्स: पीटीआई

दूसरी बात ये है कि पिछली कुछ तिमाही के मुकाबले भारत का चालू खाते का खाटा जीडीपी के 0.6 फीसद से चार गुना बढ़कर 2.4 फीसद पहुंच गया है. इसकी बड़ी वजह मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में आयात बढ़ना है. सवाल ये है कि अगर घरेलू मांग नहीं है, तो ये आयात क्यों बढ़ रहा है?

आयात में इजाफे का सीधा ताल्लुक विकास दर में 2.5-3 फीसद तक की गिरावट से है. नोटबंदी के बाद चालू खाते का घाटा भी बढ़ा है. रिजर्व बैंक का REER (Real Effective Exchange Rate) सूचकांक भारत और इसके मुकाबले खड़े देशों की हालत बताता है. आज भारत इस सूचकांक में 2004 के 100 के मुकाबले 120 प्वाइंट पर है. अगर हम इसे दुनिया में छाई मंदी और निर्यात की चुनौतियों से जोड़कर देखें तो तस्वीर साफ हो जाती है. लेकिन अब निर्यात बढ़ रहा है. और ये हालात भी जल्द ही बदलेंगे.

तीसरी बात ये कि अवैध कमाई छुपाने के कई रास्ते इस सरकार ने बंद कर दिए हैं. जैसे कि यशवंत सिन्हा ने वित्त मंत्री रहते हुए पार्टिसिपेटरी नोट (पी-नोट) शुरू किया था. मौजूदा सरकार ने पी-नोट की सुविधा पूरी तरह से खत्म कर दी है. इस बात की कोई तारीफ क्यों नहीं करता?

टैक्स देने के मामले में हमारा देश रवांडा, युगांडा और इथियोपिया से भी पीछे है. मौजूदा सरकार आंकड़ों और संसाधनों के अलावा टैक्स अधिकारियों की सख्ती के जरिए कर वसूली को बढ़ा रही है. ईमानदार अफसरों की मदद से देश टैक्स वसूली के मामले में काफी आगे बढ़ा है.

कई दूसरी जगहों पर दिख रहे हैं सुधार

अगस्त 2014 में देश भर में कुल दस लाख एलईडी बल्ब इस्तेमाल हो रहे थे. आज ये तादाद 25 करोड़ पहुंच चुकी है. एलईडी बल्ब की कीमत में 90 फीसद की गिरावट आई है.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना यानी मनरेगा का कुल मकसद गड्ढे खोदना था. इससे देश को सालाना करीब 40 हजार करोड़ का बोझ उठाना पड़ता है. कमोबेश इतने ही पैसे एलईडी बल्ब के इस्तेमाल से बच रहे हैं. ये कोई मामूली उपलब्धि है क्या?

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2013-14 में हमारा एफडीआई यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, 36 अरब डॉलर था. आज की तारीख में ये 60 अरब डॉलर है. फिर भी लोग सवाल उठा रहे हैं. अनाज का उत्पादन 2014 में 25.2 करोड़ टन था. आज ये 27.6 करोड़ टन पहुंच चुका है. वो भी लगातार मॉनसून फेल होने के बावजूद.

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प्रतीकात्मक तस्वीर, मनरेगा

चौथी बात ये कि मौजूदा सरकार की सख्ती की वजह से बैंकों के बांटे हुए खराब कर्ज के आंकड़े सामने आ रहे हैं. रिजर्व बैंक लगातार इस दिशा में बैंकों के साथ काम कर रहा है. जाहिर है इसका विकास दर पर तो असर पड़ेगा ही. ये सुधार काफी पहले होने चाहिए थे. लेकिन अब हो रहे हैं. इनका असर समझने में वक्त तो लगेगा ही. हमें इसका जश्न नहीं मनाना चाहिए?

इस बात पर देश को खुश होना चाहिए कि आज सरकार में भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं.

अरुण शौरी ने देश में बढ़ते बैड लोन का जिक्र किया. शौरी के मुताबिक ये खराब कर्ज 8 फीसद से बढ़कर 17 फीसद हो गया है. लेकिन शौरी को याद रखना चाहिए कि 2014 में विजय माल्या का कर्ज, बैड लोन नहीं था. आज कम से कम ऐसे कर्जदारों के नाम और इनको बांटी गई रियायती रकम सामने तो आ रही है. सरकार को इस दिशा में और सख्ती की जरूरत है. हां, ये बात जरूर है कि शौरी को इसका पता शायद न चले.

ब्याज दर रिज़र्व बैंक की जिम्मेदारी है

ब्याज दरों में कटौती की मांग कर रहे लोगों को समझना चाहिए कि ये जिम्मेदारी सरकार की नहीं, रिजर्व बैंक की है. अगर सरकार रिजर्व बैंक को निर्देश देगी, तो यही लोग शोर मचाएंगे कि सरकार, रिजर्व बैंक की स्वायत्तता में दखल दे रही है. इसी तरह अगर सरकार बैंकों के बंद पड़े कर्ज के खातों पर एक्शन का दबाव नहीं बनाएगी, तो शौरी जैसे लोग शोर मचाएंगे कि सरकार कुछ कर ही नहीं रही! यानी करो तो परेशानी, कुछ न करो तो दिक्कत.

नोट बंदी को काला धन सफेद करने की सबसे बड़ी योजना कहना भी शौरी की खीझ ही दिखाता है. वो अपने बयान के समर्थन में कोई आंकड़े नहीं पेश करते. हां, शौरी ये कहते कि ये कदम गलत था. इसे लागू करने में गड़बड़ियां हुईं, तो शायद उनकी बात पर यकीन करना ज्यादा आसान होता. लेकिन बिना किसी सबूत के ऐसे अनाप-शनाप बयान देना शौरी के कद को शोभा नहीं देता.

शौरी ने आईआईपी यानी औद्योगिक उत्पादन में गिरावट के आंकड़ों का हवाला देकर मंदी का दावा किया है. कुछ हद तक ये बात सही है. मगर यहां ये याद रखने वाली बात है कि आईईपी के सूचकांक में पहले के उद्योग-धंधे शामिल थे. आज देश की विकास में उनका रोल उतना अहम नहीं रह गया है. तो, आईआईपी में गिरावट फिक्र की बात तो है, मगर ये तरक्की की असल तस्वीर पेश करने वाले आंकड़े नहीं जताती.

छठवीं बात ये है कि अर्थव्यवस्था को पारदर्शी बनाने के कई फैसले ऐसे हैं जिनका असर आज नहीं, बाद में दिखेगा. जैसे नोटबंदी के जरिए देश में नोटों के चलन के सही आंकड़े हासिल हुए. इसके अलावा बहुत से धंधे जो सिर्फ कैश पर चल रहे थे, वो अब पुख्ता जमीन पर हैं. यानी सरकार के पास हर पैसे के लेन-देन का हिसाब है. नोटबंदी से सरकार नकद लेन-देन को कम करना चाहती थी, वो काम अगले कुछ सालों में ही पूरा होगा.

Awareness campaign for cashless transactions

खुद पीएम मोदी ने पिछले साल 8 नवंबर को नोटबंदी के ऐलान के वक्त कहा था कि ये कदम देश की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है. फिर भी पता नहीं क्यों लोग इस बात से बेहद परेशान हैं.

यशवंत सिन्हा इस मामले में बिल्कुल सही हैं कि बैंकों के खाते साफ करके उनमें और पूंजी नहीं डाली जा रही. सरकार को ऐसे शख्स की तलाश है जो हमारी वित्तीय व्यवस्था में नई जान डाले. डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा दे. कर्ज बांटने की प्रक्रिया पारदर्शी और तेज बनाए. इससे निजी पूंजी में इजाफा होगा.

आज अगर ऐसे हालात नहीं हैं, तो इसके लिए रिजर्व बैंक भी जिम्मेदार है. मिसाल के तौर पर बैड बैंक का सरकार का प्रस्ताव, रिजर्व बैंक ने नामंजूर कर दिया था.

यशवंत सिन्हा कहते हैं कि बहुत से प्रोजेक्ट अटके पड़े हैं. यहां उन्हे ये याद रखने की जरूरत है कि प्रधानमंत्री की कोशिश से ही बरसों से बंद पड़ा दाभोल प्रोजेक्ट फिर से चालू हो सका. वरना उसमें तो करोड़ों रुपए पहले ही बर्बाद हो चुके हैं. इसी तरह गुजरात में अधूरे पड़े दो अल्ट्रा-मेगा पावर प्रोजेक्ट इस सरकार ने शुरू करने की कोशिश की. मगर इसमें कोर्ट ने ही रोक लगा दी. तो बंद पड़े प्रोजेक्ट को चालू करना इतना आसान नहीं, जितना यशवंत सिन्हा हमें समझा रहे हैं.

सातवीं बात ये कि ईमानदार अफसरों के फैसले लेने के लिए देश में माहौल और हौसले की कमी है. अब कोयला घोटाले में किसी और को नहीं, ईमानदार आईएएस अफसर एच सी गुप्ता को सजा हो गई. इसी वजह से अधिकारी बड़े फैसले लेने से डरते हैं. उन्हें डर होता है कि कहीं आगे चलकर किसी अदालती विवाद में न पड़ जाएं. यही वजह है कि एयर इंडिया या फिर आईडीबीआई बैंक बेचने के फैसले लेने में अधिकारी हिचकते हैं. क्योंकि कल कोई नई सरकार आएगी तो पहले अफसर का ही गला पकड़ेगी.

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ऐसे माहौल में तो किसी निजी कंपनी के सीईओ या कोई बड़ा सियासी नेता भी फैसला नहीं कर पाता. क्योंकि नियम-कायदों का जाल इतना पेचीदा है कि फैसले लेने की प्रक्रिया पर हमेशा ही सवाल खड़े होने की गुंजाइश रहती है. ऐसे में बहुत से प्रोजेक्ट अटके पड़े हैं तो अचरज कैसा? आठवीं बात ये कि जीएसटी लागू करने में दिक्कतें आ रही हैं. ऐसे तो हर योजना के साथ होता है. आधार लागू करने में दिक्कतें नहीं आई थीं क्या? ओबामा केयर योजना लागू करने के दौरान भी यही हुआ था.

बड़े फैसले मुश्किल ही होते है

जब जीएसटी नहीं लागू हुआ था, तो शौरी जैसे बहुत से लोग ये कह रहे थे कि मोदी सरकार बड़े आर्थिक सुधार नहीं कर पा रही है. अब जीएसटी बड़ा आर्थिक सुधार नहीं है? हां, इसमें कुछ कमियां रह गई हैं, जिन्हें दूर करने की कोशिश हो रही है. फिर भी ये हंगामा क्यों बरपा है? आज हम कुछ कमियों के साथ जीएसटी लागू कर सके हैं, ये बात ठीक है या फिर हम कभी जीएसटी लागू ही नहीं कर पाते, ये ज्यादा ठीक होता? शौरी को याद रखना चाहिए कि मौजूदा सरकार फैसले लेने की अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं रही है.

अरुण शौरी ने ही हमें सिखाया था कि देश को बचाने का काम पार्ट टाइम नहीं होता. अब जब कि देश के पास ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो दिन-रात सुधारों, बदलाव और सख्त फैसले लेने के लिए काम कर रहे हैं, तो भी ये नाखुशी क्यों?

यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी ये बात भूल जाते हैं कि कैंसर का इलाज बैंड-एड लगाकर नहीं होता. ये कैंसर बरसों से हमारे देश को नुकसान पहुंचा रहा है. इसलिए इसकी सर्जरी की जरूरत है. मौजूदा सरकार ने वो साहस और वो इच्छाशक्ति दिखाई है. अब इसमें थोड़ा दर्द तो होगा ही. हां, इसके फायदे भी खूब होंगे.

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