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दिल्ली-एनसीआर में गेस्ट हाउस के नाम पर बिल्डिंग प्लान हासिल कर होटल कैसे बन रहे हैं?

कुल मिलाकर करोलबाग के अर्पित होटल हादसे ने एक बार फिर से सरकार की नींद उड़ा दी है. इस घटना के बाद एक बार फिर से सवाल उठने लगे हैं कि होटल निर्माण में बिल्डिंग बायलॉज का पूरी तरह से उल्लंघन कैसे हो रहा है?

Updated On: Feb 15, 2019 08:16 AM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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दिल्ली-एनसीआर में गेस्ट हाउस के नाम पर बिल्डिंग प्लान हासिल कर होटल कैसे बन रहे हैं?

करोलबाग के होटल अर्पित पैलेस में आग ने 17 सांसों की डोर छीन ली. दिल्ली सरकार की कई एजेंसियों के साथ सीलिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मॉनिटरिंग कमेटी ने भी अर्पित होटल हादसे की जांच शुरू दी है. शुरुआती जांच में दूसरे हादसों की तरह इस हादसे के लिए भी होटल मैनेजमेंट को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि दिल्ली के सबसे हाईप्रोफाइल इलाके लुटियन जोन के नजदीक होने के बावजूद भी अर्पित होटल में 5 घंटे की जोर-आजमाइश और काफी जद्दोजहद के बाद 17 लोगों की जानें नहीं बचाई जा सकीं.

अर्पित होटल हादसे ने एक बार फिर से बता दिया कि हमारे सिस्टम में अब भी बहुत छेद हैं. अर्पित होटल हादसे ने एक बार फिर से बता दिया कि हमारा सिस्टम कितना पंगु है. सरकार चाहे लाख दावे कर ले, लेकिन आम नागरिक की सुरक्षा और जिंदगी के साथ खिलवाड़ में कोई कमी नहीं आई है. अर्पित होटल हादसा इसका जीता-जागता उदाहरण है.

अर्पित होटल हादसे के बाद पीएम मोदी ने भी ट्वीट कर शोक व्यक्त किया. दिल्ली के एलजी अनिल बैजल और सीएम अरविंद केजरीवाल ने भी घटना स्थल पहुंच कर और हादसों की तरह इस हादसे की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दे दिए. मृतकों के परिजनों को 5-5 लाख का मुआवजा देने का ऐलान न भी कर दिया गया. लेकिन, सिस्टम की नाकामयाबी देखें कि हादसे के 24 घंटे के अंदर ही हादसे के शिकार लोगों के परिजन डेथ सर्टिफिकेट के लिए होटल और अस्पताल के बीच दौड़ लगा रहे थे और अधिकारी कभी यहां जाने तो कभी वहां जाने की बात कर रहे थे.

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अरविंद केजरीवाल सरकार ने इस हादसे के बाद अपनी सरकार के चार साल का जश्न रद्द कर दिया. कुलमिलाकर दिल्ली सरकार ने यह जताने की कोशिश की कि दिल्ली सरकार इस घटना के बाद कितनी आहत है. दूसरी पार्टियों के नेताओं ने भी ट्वीट कर लोगों की सहानुभूति बटोरने की खूब कोशिश की.

दिल्ली सरकार की कई जांच एजेंसियां अब अर्पित होटल हादसे की तह तक जाने की कोशिश कर रही हैं. शुरुआती जांच में और हादसे में बच गए लोगों के बयानों के आधार पर होटल मैनेजमेंट की लापरवाही की बात सामने आ रही है. लापरवाही इतनी थी कि आग की सूचना फायर ब्रिगेड विभाग को सवा घंटे बाद मिली. दमकल विभाग की कई गाड़ियां मौके पर पहुंची जरूर लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी.

देश की राजधानी और पॉश इलाकों में से एक इस जगह पर पहुंचने में एनडीआरएफ को भी घंटों लग गए. दमकल विभाग ने चार घंटे के ऑपरेशन के बाद 35 लोगों को हाइड्रोलोक क्रेन की मदद से बाहर निकाला, लेकिन तब तक 17 लोगों की मौत हो चुकी थी.

चार मंजिला अर्पित होटल को साल 2005 में फायर विभाग से एनओसी मिली थी. साल 2017 में इसको दोबारा से रिनुअल मिला था. लेकिन, सिस्टम की नाकामी इस बात से पता चलता है कि दिल्ली में 15 मार्च तक जनरेटर का उपयोग करने पर प्रतिबंध है इसके बावजूद इस होटल में लाइट जाने के बाद मंगलवार तड़के जनरेटर चलाया गया. शुरुआती जांच में पता चला है कि मंगलवार रात को बिजली चली जाने के बाद जनरेटर चलाया गया था. जनरेटर के ओवरलोड की वजह से ही रूम नंबर 109 में एसी में ब्लास्ट हुआ और बाद में आग भड़की.

चार मंजिला जिस बिल्डिंग को फायर विभाग ने कुछ साल पहले ही एनओसी रिनुअल किया था, वह बीते पांच साल में छह मंजिला होटल में तब्दील हो गया. होटल के मालिक ने टॉप फ्लोर पर अवैध रूप से रेस्टोरेंट बना लिया. क्या प्रशासन की मिलीभगत के बिना यह काम संभव है?

इतने साल न तो दिल्ली सरकार ने इस बात की सुध ली और न ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मॉनिटरिंग कमेटी ने. क्या दिल्ली सरकार के अधिकारियों ने बिल्डिंग बायलॉज के नियमों का पालन सही से किया? ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब बिल्डिंग बायलॉज का पालन नहीं हो रहा था तो फायर विभाग से होटल को एनओसी कैसी मिली?

दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, देश की राजधानी होने के कारण यहां पर एक साथ ही कई एजेंसियां काम कर रही हैं. इन एजेंसियों में सामंजस्य का अभाव है. एक मकान बनाने के लिए दर्जनों एजेंसियों से एनओसी लेनी होती है. जैसे मैं आपको बता दूं कि बिल्डिंग की ऊचाईं नगर निगम तय करता है. फायर एनओसी दमकल विभाग की तरफ से मिलती है. यहां बिल्डिंग बायलॉज के नियमों का पालन नहीं होता है. विभाग अपनी जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालते हैं. यहां बिल्डिंग बायलॉज की जांच करने के बजाए सब अपनी जिम्मेदारी पूरी कर देते हैं.

अर्पित होटल का जो मामला है वह बिल्डिंग बायलॉज का घोर उल्लंघन है. होटल ने प्रदूषण नियंत्रण से लेकर फायर एनओसी जारी करने में कानून का पालन नहीं है. होटल में बिल्डिंग को ग्राउंड फ्लोर के अलावा 3 मंजिला ही बनाने की परमिशन थी, लेकिन होटल 4 मंजिला और टॉप फ्लोर पर एक रेस्टोरेंट बनाया गया.’

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दमकल विभाग से हाल ही में रिटायर्ड हुए एक अधिकारी अनिल राठी कहते हैं, ‘दिल्ली में होटल अर्पित पैलेस की तरह तकरीबन 2000 होटल हैं. दिल्ली बिल्डिंग बायलॉज के मुताबिक दिल्ली में दो कैटेगरी के होटल बनाने की इजाजत है. कुछ होटलों को 90 के दशक के आसपास लाइसेंस दिए गए हैं. इन होटलों को दिल्ली मास्टर प्लान आने से पहले अनुमति मिल गई थी. इसलिए ये होटलें जैसे बने वैसी ही अनुमति दी गई. लेकिन, मास्टर प्लान आने के बाद बिल्डिंग बायलॉज के एक पॉलिसी बनी.

होटल मालिकों ने दिल्ली मास्टर प्लान का उल्लंघन करना शुरू कर दिया. इस उल्लंघन में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार शुरू हुआ. रेजिडेंसियल प्रोपर्टी का उपयोग कॉमर्शियल कामों के लिए शुरू हो गया. खासकर होटलों को लेकर पार्किंग एरिया से लेकर वेंटिलेशन तक के नियमों की अनदेखी की गई.’

करोलबाग हादसे के बाद पहाड़गंज के होटलों में रहने वाले लोगों में दहशत व्याप्त हो गया है. कई लोगों ने तो होटल खाली भी कर दिया है. करोलबाग के अर्पित होटल से सटे एक होटल में बिहार के रहने वाले अमरजीत चौधरी कहते हैं, ‘पत्नी का इलाज गंगा राम अस्पताल में चल रहा है. पत्नी को किडनी ट्रांसप्लांट करानी है, इसलिए हमारी मजबूरी है कि हम यहां से जा नहीं सकते हैं. फिर भी अपने एक परिचित से कहा है कि वह हमारे लिए किसी रेजिडेंशल एरिया में कमरा खोज दे. अगर हमारे पास कोई दूसरा विकल्प होता तो हमलोग यहां से तुरंत ही कमरा खाली कर किसी और जगह शिफ्ट हो जाते.’

अगर किसी होटल मालिक से होटल में रुके लोगों और सुविधा के बारे में बात करें तो वह बात करने से कतराता है. बुधवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मॉनिटरिंग कमेटी ने पूरे इलाके का दौरा किया है. मॉनिटरिंग कमेटी के दौरे के बाद इलाके के होटल मालिकों में दहशत कायम हो गया है. इन होटल मालिकों को डर सताने लगा है कि कभी भी उनके होटलों पर सीलिंग की कार्रवाई शुरू हो सकती है.

करोलबाग की घटना के बाद मॉनिटरिंग कमेटी के सदस्य केजे राव और भूरे लाल यादव ने बुधवार को घटनास्थल का दौरा कर एमसीडी और दिल्ली पुलिस से पूरी रिपोर्ट मांगी है. मॉनिटरिंग कमेटी का मानना है कि दिल्ली के अधिकांश होटल मालिक, लॉज और गेस्ट हाउस मालिकों ने मास्टर प्लान 2020 का उल्लंघन किया है. अधिकांश गेस्ट हाउस को बिल्डिंग लॉज का उल्लंघन कर होटलों में तब्दील कर दिया गया है. दिल्ली में बिल्डिंग लॉज के मुताबिक गेस्ट हाउस के लिए अधिकतम 15 कमरे ही होने चाहिए लेकिन इससे कई गुना ज्यादा कमरे बनाए गए हैं. साथ ही किसी भी गेस्ट हाउस में किचन या रेस्टोंरेंट नहीं होना चाहिए लेकिन तकरीबन सभी गेस्ट हाउस में किचन और रोस्टोरेंट भी बने हुए हैं.

वहीं दिल्ली के करोलबाग स्थित होटल अर्पित पैलेस में हादसे के बाद फ़र्स्टपोस्ट हिंदी ने गाजियाबाद के कुछ होटलों की भी पड़ताल की तो चौकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. गाजियाबाद के कौशांबी में एक होटल मैनेजर ने कहा, ‘गाजियाबाद की बात करें तो कमोबेश यहां पर 500 छोटे-बड़े होटल और लॉज हैं. कुछ गेस्ट हाउस भी आज-कल होटल ही बन गए हैं. मेरे ख्याल से 10-15 होटल ही गाजियाबाद में होंगे, जिनके पास दमकल विभाग की एनओसी होगा. सभी होटल प्रशासन की मेहरबानी और पैसे की दम पर चलते हैं.

फायर विभाग किसी बड़े हादसे के बाद खानापूर्ति के लिए नोटिस जारी करता है, लेकिन जैसे ही मीडिया में मामला शांत हो जाता है वही अधिकारी शांत हो जाते हैं. सबको पता है कि होटल मालिकों की तरफ से सभी विभागों के लिए एक निश्चित रकम निर्धारित है. जिसका जैसा होटल चलता है उस हिसाब से रकम अधिकारियों के पास पहुंचती है. नोटिस भेजने के बाद भी अधिकारी कहते हैं चिंता की कोई बात नहीं, यह तो बस खानापूर्ति के लिए की जा रही है ताकि हमलोगों की भी नौकरी सुरक्षित रहे.’

होटल के बार पुलिसवाले

होटल के बार पुलिसवाले

कुल मिलाकर करोलबाग के अर्पित होटल हादसे ने एक बार फिर से सरकार की नींद उड़ा दी है. इस घटना के बाद एक बार फिर से सवाल उठने लगे हैं कि होटल निर्माण में बिल्डिंग बायलॉज का पूरी तरह से उल्लंघन कैसे हो रहा है? लेकिन, जानकारों का मानना है कि इस हादसे के बाद भी बिल्डिंग पर कार्रवाई नहीं हो सकती है क्योंकि वह स्पेशल प्रोविजन एक्ट के तरह पूरी तरह सुरक्षित है. अब इस मामले की जांच केशवपुरम जोन की डिप्टी कमिश्नर को सौंपी गई है, जिनकी रिपोर्ट के आधार पर ही होटल मालिक और इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाएगी.

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