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रेप पीड़ितों की पहचान गुप्त रखना जरूरी: सोशल मीडिया वेबसाइटों की तय हो जवाबदेही

ऐसा क्यों होना चाहिए कि महज माता-पिता की सहमति से नाबालिग पीड़ित की पहचान उजागर कर दी जाए. कठुआ गैंगरेप केस फिलहाल कोर्ट में लंबित है. लेकिन इस केस ने सोशल मीडिया के मौजूदा रवैए और उसकी जिम्मेदारी जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया है

Devika Agarwal Updated On: Jun 10, 2018 05:12 PM IST

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रेप पीड़ितों की पहचान गुप्त रखना जरूरी: सोशल मीडिया वेबसाइटों की तय हो जवाबदेही

पिछले हफ्ते, दिल्ली हाईकोर्ट ने देश की विभिन्न मीडिया वेबसाइटों को कठुआ गैंगरेप पीड़ित की पहचान का खुलासा करने वाली खबरों को हटाने के निर्देश दिए थे. इसी साल मई में हाईकोर्ट ने आठ साल की कठुआ गैंगरेप पीड़ित की पहचान सार्वजनिक करने की वजह से गूगल, फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब को नोटिस जारी किए थे. इस मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 228 A के तहत सोशल मीडिया वेबसाइटों के खिलाफ कानूनी केस दर्ज किया गया था. आईपीसी की धारा 228 A यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों की पहचान का खुलासा करने पर लगाई जाती है. कानून में इस अपराध के लिए दो साल तक की कैद और जुर्माने की सजा का प्रावधान है.

वहीं कठुआ गैंगरेप केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी पीड़ित बच्ची समेत सभी रेप पीड़ितों की पहचान सार्वजनिक करने के मसले पर अहम टिप्पणी की थी. वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 228 A का मुद्दा उठाये जाने पर जस्टिस मदन बी लोकूर और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा था कि, ऐसे मामलों में भी जहां रेप पीड़ित जीवित हैं, वह चाहे नाबालिग या विक्षिप्त हो तो भी उसकी पहचान का खुलासा नहीं करना चाहिए. क्योंकि उनका भी निजता का अधिकार है, नाबालिग भी आगे चलकर वयस्क होगी. यह कलंक जीवन भर उसके साथ क्यों रहना चाहिए.

ऐसा क्यों होना चाहिए कि महज माता-पिता की सहमति से नाबालिग पीड़ित की पहचान उजागर कर दी जाए. कोर्ट ने आगे कहा था कि, मृतक की गरिमा के बारे में भी सोचिए. इसे (मीडिया रिपोर्टिंग) नाम लिए बगैर भी किया जा सकता है. मृतक की भी गरिमा होती है.

कठुआ गैंगरेप केस फिलहाल कोर्ट में लंबित है. लेकिन इस केस ने सोशल मीडिया के मौजूदा रवैए और उसकी जिम्मेदारी जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया है. कठुआ गैंगरेप केस ने हमें सबक दिया है कि यौन उत्पीड़न/हिंसा के शिकार लोगों की पहचान गुप्त रखने की सख्त जरूरत क्यों है. वहीं इस केस ने इंटरनेट की मध्यवर्ती संस्थाओं के दायित्व (अगर कोई है) का भी बोध कराया है.

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यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों की पहचान गुप्त रखने के लिए भारत में कानून

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराएं 376, 376 A, 376 B, 376 C और 376 D व्यापक रूप से यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों को कवर करती हैं. इनमें से किसी भी धारा के तहत यौन हिंसा के शिकार हुए पीड़ित की पहचान उजागर करना दंडनीय अपराध माना जाता है. ऐसे मामलों में आईपीसी की धारा 228 A सबसे ज्यादा प्रासंगिक है. दरअसल धारा 228 A यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों के नाम प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगाती है. वैसे कानून में एक ऐसा प्रावधान भी है, जिसके तहत यौन उत्पीड़न के शिकार व्यक्ति का नाम उजागर किया जा सकता है.

इसके लिए यौन उत्पीड़न के शिकार शख्स की लिखित इजाजत की दरकार होती है. वहीं अगर पीड़ित की मौत हो चुकी है या वह नाबालिग या दिमागी तौर पर बीमार है, तब किसी अधिकृत सगे-संबंधी की लिखित इजाजत लेकर पीड़ित का नाम प्रकाशित किया जा सकता है. इसके अलावा भारतीय कानून मीडिया को ऐसी सूचनाओं का खुलासा करने से भी रोकता है जिनसे यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों की पहचान जाहिर होने की आशंका हो. कानून का उल्लंघन करने पर यानी यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों की पहचान उजागर करने वाले शख्स/संस्थान के खिलाफ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (POCSO) एक्ट 2012 की धारा 23 के तहत आपराधिक केस दर्ज किया जाता है.

इसी तरह के कानून कुछ अन्य देशों में भी मौजूद हैं जिनमें इंग्लैंड भी शामिल है. इंग्लैंड में सेक्सुअल ऑफेंसेस (एमेंडमेंट) एक्ट 1992 के तहत यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों का नाम आम तौर पर आजीवन गुप्त रखा जाता है.

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यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रेंस फंड यानी यूनिसेफ ने भी बच्चों पर मीडिया रिपोर्टिंग से संबंधित दिशानिर्देश (गाइडलाइंस) जारी कर रखे हैं. यूनिसेफ के दिशानिर्देशों में इस बात पर खास जोर दिया गया है कि, यौन शोषण और उत्पीड़न के शिकार बच्चों के नाम गुप्त रखे जाएं. यहां तक कि अगर पहचाने जाने की आशंका हो तो पीड़ित बच्चे से संबंधित तस्वीरों और अन्य सामग्री को भी अस्पष्ट या गुप्त रखा जाए.

बच्चों समेत यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों की पहचान गुप्त रखने वाले कानूनी प्रावधानों के बावजूद भारत में ऐसे कई उदाहरण सामने आ रहे हैं जहां इन कानूनों का खुलेआम जमकर उल्लंघन किया गया.

New Delhi: Women and children druing a dharna aganist rape incidents at Rajghat in New Delhi on Friday. PTI Photo (PTI4_13_2018_000116B)

कठुआ गैंगरेप पीड़िता की पहचान उजागर की गई

जुलाई 2013 में, इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने मणिपुर में बाल तस्करी के पीड़ितों के नाम प्रकाशित करके सबको चौंका दिया था. दिसंबर 2017 में, कोलकाता में एक स्कूल प्रिंसिपल ने यौन शोषण के शिकार एक नर्सरी छात्र का नाम उजागर कर दिया था. पीड़ित बच्चे का यौन शोषण कथित तौर पर उसी स्कूल के दो पुरुष शिक्षकों ने किया था. पीड़ित बच्चे के नाम का खुलासा करने की वजह से स्कूल प्रिंसिपल को पोक्सो एक्ट के उल्लंघन के आरोप में समन किया गया था. मार्च 2017 में, बिजॉय @ गिड्डू दास बनाम पश्चिम बंगाल सरकार केस (2016 का CRA 663) में कलकत्ता हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों की पहचान गुप्त रखने के संबंध में गाइडलाइंस जारी की थीं. दरअसल इस मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में पोक्सो एक्ट के तहत हुई थी. लेकिन केस का फैसला सुनाते वक्त ट्रायल कोर्ट के जज ने पीड़ित (यौन उत्पीड़न का शिकार) बच्चे के नाम का खुलासा कर दिया था. जिसके बाद मामला कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचा.

केस की सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा था, ‘यौन शोषण के पीड़ित की पहचान मीडिया में उजागर नहीं की जा सकती है. न्याय के हित में पीड़ित के नाम का खुलासा सिर्फ तभी किया जा सकता है, जब विशेष अदालत इसकी स्पष्ट अनुमति दे. पीड़ित की पहचान उजागर करने वाला व्यक्ति वह चाहे एक पुलिस अधिकारी ही क्यों न हो, उस पर पोक्सो एक्ट की धारा 23 (4) के तहत मुकदमा चलाया जाएगा.’

हाल ही में, अप्रैल 2018 में, दिल्ली हाईकोर्ट ने कठुआ गैंगरेप पीड़ित की पहचान सार्वजनिक करने की वजह से 12 मीडिया घरानों को दस-दस लाख रुपए बतौर मुआवजा अदा करने का निर्देश दिया था. वहीं कठुआ गैंगरेप पीड़ित की पहचान उजागर करने के मामले में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी मीडिया घरानों के खिलाफ अलग से कार्यवाही शुरू की थी. जिस पर बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी.

भारत में रेप पीड़ितों की पहचान गुप्त रखने की वजह निजता (गोपनीयता) का अधिकार और यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों की समाज में होने वाली बदनामी को रोकना है. यौन शोषण के शिकार लोगों की पहचान उजागर न करने की नीति से पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा तो होती ही है, साथ ही यह भी तर्क दिया जाता है कि, इससे यौन शोषण के आरोपी के अधिकार भी सुरक्षित रहते हैं. क्योंकि इस नीति से आरोपी न सिर्फ मीडिया ट्रायल से बचे रहते हैं बल्कि निर्दोष साबित होने पर उन्हें समाज में बेवजह की शर्मिंदगी का सामना भी नहीं करना पड़ता है. इसके अलावा, नाम और पहचान उजागर होने पर समाज में बदनामी का डर यौन शोषण के शिकार लोगों को अपने साथ हुए अत्याचार और अपराध की रिपोर्ट करने से भी रोक सकता है.

दिलचस्प बात यह है कि, बोलने की आजादी (फ्री स्पीच) और सच्ची रिपोर्टिंग के तर्क के आधार पर बहुत से लोग यौन शोषण के मामलों में पीड़ित के नाम को उजागर करने की वकालत करते हैं. इस मामले में एक और मुद्दा खासी अहमियत रखता है कि, जिन मामलों में पीड़ित या उसका परिवार पीड़ित की पहचान को सार्वजनिक रूप से प्रकट करने का विकल्प चुनते हैं, तब क्या उन मामलों में मीडिया को बिना औपचारिक सहमति के पीड़ितों का नाम उजागर करने की इजाजत दी जानी चाहिए. क्योंकि आईपीसी की धारा 228 A से स्पष्ट है कि यौन शोषण पीड़ित का नाम उजागर करने के लिए पीड़ित या उसके अधिकृत रिश्तेदार की औपचारिक और लिखित सहमति अनिवार्य है. मिसाल के तौर पर, दिसंबर 2012 में दिल्ली गैंगरेप के बाद, पीड़ित लड़की की मां ने उसके नाम का खुलासा सार्वजनिक रूप से किया था. पीड़ित की मां ने कहा कि, उन्हें अपनी बेटी के नाम की घोषणा करने में किसी तरह की शर्म महसूस नहीं हुई. पीड़ित के परिवार ने उसकी याद में भारत में बलात्कार विरोधी नए कानून (एंटी रेप लॉ) का नाम देने की भी मांग की थी.

यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों की पहचान गुप्त रखने में इंटरनेट की भूमिका

यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों की पहचान उजागर करने के मामले में सोशल मीडिया वेबसाइटों के खिलाफ वर्तमान केस एक महत्वपूर्ण सवाल उठाता है. अर्थात्, क्या इंटरनेट की मध्यवर्ती संस्थाओं को यौन शोषण पीड़ित की पहचान उजागर करने वाली सामग्री की मेजबानी (होस्टिंग) या प्रकाशन (पब्लिशिंग) के लिए उत्तरदायी माना जाना चाहिए. क्योंकि यौन शोषण पीड़ित की पहचान उजागर करना सरासर आईपीसी की धारा 228 A का उल्लंघन है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

इंटरनेट की मध्यवर्ती संस्थाएं प्रेस (टीवी न्यूज चैनल और समाचार पत्र) की हमारी पारंपरिक समझ से अलग हैं. असल में गूगल, फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब सामग्री निर्माता (कंटेंट क्रियेटर्स) नहीं हैं. यानी वे लिंक या वेबसाइट होस्ट करते हैं, जो इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों को व्यक्तिगत सामग्री (कंटेंट) को साझा (शेयर) करने की सुविधा प्रदान करते हैं. इसलिए, ट्विटर जैसी सोशल मीडिया वेबसाइट की नीयत और इरादों पर लांछन लगाना मुश्किल है. ट्विटर पर अगर कोई इंटरनेट उपयोगकर्ता एक ट्वीट पोस्ट करता है जिससे गैरकानूनी तरीके से यौन उत्पीड़न के शिकार किसी व्यक्ति की पहचान उजागर होती है, तब ट्विटर उससे अपना पल्ला झाड़ सकता है. क्योंकि ट्विटर यह दावा कर सकता है कि, उसे यह नहीं पता था कि पोस्ट किया गया वह ट्वीट किसी कानून विशेष का उल्लघंन करता है. लिहाजा ट्विटर ऐसे मामलों में अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर सकता है. इसके विपरीत, कोई समाचार पत्र अगर यौन उत्पीड़न के शिकार किसी शख्स के नाम को प्रकाशित करता है, तो सामान्य तौर पर उसकी जवाबदेही उस खबर (आर्टिकल) के लेखक/समाचार पत्र के संपादक और मीडिया हाउस की होती है.

इंटरनेट की मध्यवर्ती संस्थाओं को अपनी वेबसाइटों पर उपयोगकर्ता द्वारा रचित सामग्री (यूजर जेनरेटेड कंटेंट) को बिना जांचे-परखे होस्ट करने के लिए उत्तरदायी ठहराने का एक समस्याग्रस्त पहलू भी है. दरअसल इससे फ्री स्पीच या उपयोगकर्ता की सामग्री की पूर्व-सेंसरशिप का आरोप लग सकता है. यौन उत्पीड़न/हिंसा के शिकार लोगों की पहचान करने वाली सामग्री को हटाने के लिए फ़िल्टरिंग (छानबीन, जांच-पड़ताल) करने में कई व्यावहारिक कठिनाइयां भी सामने आ सकती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि अश्लील तस्वीरों या नफरत भरे जहरीले भाषणों की स्क्रीनिंग के लिए जहां आपत्तिजनक सामग्री की पहचान के लिए कीवर्ड और इमेज आईडेंटिफिकेशन का उपयोग किया जाता है, वहीं उसके विपरीत यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों के नाम उजागर करने वाली सामग्री को सोशल मीडिया वेबसाइटों से हटाने के लिए एल्गोरिदम विकसित करना मुश्किल है.

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इसलिए, इंटरनेट की मध्यवर्ती संस्थाओं की जवाबदेही तय करने के लिए बेहतर तरीका तभी विकसित हो सकता है, जब कोई वेबसाइट अपने संक्षिप्त और विशिष्ट ज्ञान के चलते यौन उत्पीड़न के शिकार किसी व्यक्ति का नाम हटाने में नाकाम हो जाए. या फिर यह सूचित किए जाने के बावजूद कि उसकी वेबसाइट पर गैरकानूनी और आपत्तिजनक सामग्री को पोस्ट किया गया है, लेकिन तब भी वह वेबसाइट उस सामग्री को न हटाए. उदाहरण के लिए मामला कुछ ऐसा हो सकता है कि, अगर एक इंटरनेट उपयोगकर्ता सोशल मीडिया वेबसाइट पर किसी आपत्तिजनक सामग्री की रिपोर्ट करता है, लेकिन वेबसाइट तत्काल ऐसी सामग्री को हटाने में विफल रहता है, या गैरकानूनी सामग्री को हटाने से इनकार कर देता है, तब वेबसाइट को उस गैरकानूनी सामग्री के लिए उत्तरदायी माना जा सकता है.

ऐसी स्थिति में वेबसाइट के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) एक्ट, 2008 की धारा 79 के तहत केस दर्ज कराया जा सकता है. दरअसल आईटी एक्ट, 2008 की धारा 79 इंटरनेट की मध्यवर्ती संस्थाओं की जवाबदेही तय करती है. हालांकि इंटरनेट की मध्यवर्ती संस्थाओं का कार्य बेहद सीमित होता है. वे सिर्फ उपयोगकर्ताओं द्वारा निर्मित सामग्री को होस्ट करने के लिए एक मंच प्रदान करती हैं. इंटरनेट की मध्यवर्ती संस्थाओं की जवाबदेही तय होने पर यह सुनिश्चित हो जाएगा कि सोशल मीडिया वेबसाइटों पर कानून ज्यादा कठोर नहीं हैं. बहरहाल फिलहाल तो सोशल मीडिया वेबसाइटों का रवैया खासी चिंता का विषय है. क्योंकि अगर नजर न रखी गई और लगाम न कसी गई तो सोशल मीडिया यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों की पहचान सार्वजनिक करने का मंच बन सकता है.

(लेखिका देविका अग्रवाल कैंब्रिज यूनीवर्सिटी में LLM की विद्यार्थी हैं)

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