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अन्ना हजारे ने केंद्र के खिलाफ 23 मार्च को प्रदर्शन की घोषणा की

अन्ना आंदोलन के बाद भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी कांग्रेस को 2014 के आम चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था

Updated On: Dec 05, 2017 05:09 PM IST

Bhasha

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अन्ना हजारे ने केंद्र के खिलाफ 23 मार्च को प्रदर्शन की घोषणा की

पिछले चार सालों में लोकपाल की नियुक्ति नहीं किए जाने से परेशान भ्रष्टाचार विरोधी समाजसेवी अन्ना हजारे ने अगले साल शहीद दिवस पर 23 मार्च को सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने की मंगलवार को घोषणा की.

अन्ना हजारे ने प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को लेकर गंभीर नहीं होने का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा कि लोकपाल कानून में हालिया संशोधनों में एक उपबंध हटा दिया गया है जिसमें लोक सेवकों को अपनी संपत्ति की घोषणा करना अनिवार्य था. इससे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सरकार का इरादा परिलक्षित होता है.

हजारे ने कहा कि सरकार बहाना बना रही है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता नहीं होने के कारण लोकपाल की नियुक्त नहीं हो सकती है. उन्होंने जोर देकर कहा कि वह कम से कम बीजेपी शासित राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति तो कर सकती है.

हजारे की सरकार के खिलाफ प्रदर्शन की घोषणा से 2011 में तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के खिलाफ की गयी प्रदर्शन की यादें ताजा हो गई हैं. उस समय उनके प्रदर्शन और आमरण अनशन ने कई लोगों को प्रभावित किया था.

अन्ना आंदोलन के बाद भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी कांग्रेस को 2014 के आम चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था.

अन्ना हजारे के पत्रों का नहीं मिला कोई जवाब

हजारे ने कहा कि उन्होंने एनडीए सरकार को 30 से अधिक पत्र लिखा है लेकिन इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है और उनके पत्रों का कोई जवाब नहीं दिया गया इसके पीछे कोई ‘अहम’ तो नहीं था. उन पत्रों में लोकपाल की नियुक्ति नहीं होने पर सवाल उठाया गया था.

80 वर्षीय इस सामाजिक कार्यकर्ता ने देश में किसानों की दुर्दशा को लेकर भी केंद्र पर हमला किया और कहा कि सरकार स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का वादा पूरा करने में नाकाम रही. रिपोर्ट के मुताबिक इससे किसानों को खेती में निवेश के मुकाबले 50 प्रतिशत ज्यादा धन मिलता.

हजारे ने कहा, '1995 से, देश में 12 लाख किसानों ने किसानों ने खुदकुशी की है और सरकारों ने उनके प्रति कोई संवेदनशीलता नहीं दिखायी है. प्रधानमंत्री के शब्दों और कृत्यों में एक बड़ी खाई है.'

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