S M L

अंकित चड्ढा: बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते

अंकित को दास्तान कहने के अपने हुनर में इस कदर महारत हासिल थी कि वह अपने अल्फाज ओ अंदाज से सामने बैठे लोगों को बांध लेता था

Updated On: May 11, 2018 07:23 PM IST

Bhasha

0
अंकित चड्ढा: बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते
Loading...

उर्दू कहानी कहने की कला 'दास्तानगोई' को फिर से जीवन देने में जुटे युवा दास्तानगो अंकित चड्ढा की 30 वर्ष की आयु में मौत हो गई. दिल्ली के लोधी रोड स्थित शवदाह गृह में शुक्रवार को उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.

करीबी पारिवारिक संबंधी ने कहा, 'वह पुणे अपनी एक प्रस्तुति देने गया था, जहां पास में ही एक झील में घूमने के दौरान उसका पैर फिसल गया. झील में डूबने से उसकी मौत हो गई.'

अंकित को दास्तान कहने के अपने हुनर में इस कदर महारत हासिल थी कि वह अपने अल्फाज ओ अंदाज से सामने बैठे लोगों को बांध लेता था. दास्तांगोई को एक अलग ही मुकाम पर पहुंचाने वाले अंकित चडढा आज खुद एक दास्तां हो गए. चड्ढा का कार्यक्रम ‘दास्तां ढाई आखर की’ 12 मई को पुणे के ज्ञान अदब केंद्र पर होना था.

एक पुराने साक्षात्कार में चड्ढा ने ‘भाषा’ से कहा था कि कबीर की वाणी पर आधारित इस दास्तां को तैयार करने में उसका सात साल से अधिक वक्त गुजरा था. इस दास्तां में चड्ढा ने मौजूदा समय के मोबाइल, यूट्यूब इत्यादि तकनीकी पहलुओं के साथ-साथ, कबीर के प्रेम संवाद की कहानी को आपस में जोड़ने का काम किया था. दोहे और आम जिंदगी के बहुत से किस्से पिरोकर यह दास्तां तैयार की गई थी.

मध्यमवर्गीय पंजाबी परिवार में जन्मे चड्ढा की दास्तांगोई में कबीर के अलावा दाराशिकोह, अमीर खुसरो और रहीम का जिक्र तो था ही लेकिन महात्मा गांधी के जीवन को लेकर उनकी बुनी कहानी को देश-विदेश में पसंद किया गया.

चड्ढा ने अपनी पहली प्रस्तुति 2011 में दी थी और 2012-13 के दौरान उन्होंने अकेले प्रस्तुति देना शुरु कर दिया था. पुणे की प्रस्तुति से पहले वह हाल ही में कबीर और गांधी की दास्तां पर सिएटल और कैलिफोर्निया में अपनी प्रस्तुति देकर लौटे थे. चड्ढा के गुरु महमूद फारुकी ने चड्ढा की मौत को एक ‘अपूरणीय क्षति’ बताया.

लेखक और निर्देशक फारुकी ने कहा, ‘वह एक चमकता सितारा था और दास्तांगोई का वह अपना ही एक तरीका विकसित कर रहा था. उसने वास्तव में इस विद्या में कई नए प्रयोग जोड़े थे. वह अपने सामने बैठे लोगों को अपने से जोड़ लेता था और यह काम कोई साफ दिल इंसान ही कर सकता है.’

उन्होंने कहा, ‘वह फारसी और उर्दू सीख रहा था और अपने काम को लगातार बेहतर कर रहा था.’ चड्ढा ने आम लोगों की तरह ही स्नातक के बाद नौकरी शुरु की लेकिन फिर उर्दू की इस विधा की तरफ उसका रूझान हुआ और उसके बाद उसने नौकरी छोड़ इस राह को पकड़ लिया.

‘जश्न-ए-रेख्ता’ और ‘महिंद्रा कबीर उत्सव’ जैसे कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके चड्ढा ने हार्वर्ड, येल और टोरंटो जैसे विश्वविद्यालयों में भी अपनी प्रस्तुतियां दी थीं.

(तस्वीर: फेसबुक)

0
Loading...

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
फिल्म Bazaar और Kaashi का Filmy Postmortem

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi