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डोवाल से दोस्ती ने दिलाई बैजल को दिल्ली की गद्दी

वीआईएफ और डोवाल से जुड़ाव रखने वाले लोगों की कड़ी में बैजल एक और ऐसा नाम हैं जिन्हें ऊंचा ओहदा मिला है.

Updated On: Dec 29, 2016 01:28 PM IST

Sanjay Singh

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डोवाल से दोस्ती ने दिलाई बैजल को दिल्ली की गद्दी

पूर्व गृह सचिव अनिल बैजल को दिल्ली का नया उपराज्यपाल चुना गया है. दिल्ली में मौजूद विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (वीआईएफ) से सरकार के उच्च पद पर पहुंचने वाले वह एक और हाई प्रोफाइल शख्स हैं.

22 दिसंबर को नजीब जंग के इस्तीफा देने के बाद से दिल्ली के अगले उपराज्यपाल के नाम पर बना सस्पेंस भी इसके साथ खत्म हो गया है. सूत्रों का कहना है कि मोदी सरकार को जंग का इस्तीफा स्वीकार करने और नए एलजी का नाम तय करने में कुछ वक्त इसलिए लगा क्योंकि राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी हैदराबाद के परंपरागत दक्षिण प्रवास पर थे.

एक और सूत्र ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि बैजल के पक्ष में तीन चीजें रहीं. पहला, वह वाजपेई सरकार में केंद्रीय गृह सचिव रह चुके हैं. उस वक्त लालकृष्ण आडवाणी होम मिनिस्टर थे. दूसरा, वह 1960 बैच के आईएएस अफसर रहे हैं. वह एजीएमयूटी (अरुणाचल प्रदेश-गोवा-मिजोरम और केंद्रीय परिक्षेत्र) काडर के हैं. दिल्ली और कई अन्य जगहों पर अलग-अलग पदों पर काम कर चुके हैं.

तीसरा, बैजल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के साथ अच्छे संबंध हैं. मौजूदा शासन में डोवाल के साथ नजदीकी होना उनके लिए एक बड़ी सकारात्मक बात मानी गई. यह चीज उनके पक्ष में गई. इससे वह दिल्ली में संवैधानिक पद के लिए दौड़ में सबसे आगे निकल गए.

विवेकानंद फाउंडेशन का चल रहा सिक्का

विवेकानंद फाउंडेशन के फाउंडर डायरेक्टर अजीत डोवाल एनएसए हैं. प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा भी वीआईएफ से हैं और सरकार में बेहद उच्च पद पर हैं. सम्मानित फेलो ए सूर्यप्रकाश प्रसार भारती के चेयरमैन हैं, और पूर्व डीआरडीओ के चीफ वी के सारस्वत जो कि अब नीति आयोग के फुल टाइम मेंबर हैं, वीआईएफ में सेवाएं दे चुके हैं.

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इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के डीजी केजी सुरेश वीआईएफ के एडिटर रह चुके हैं. वीआईएफ और डोवाल से जुड़ाव रखने वाले हाई प्रोफाइल लोगों की कड़ी में बैजल एक और ऐसा नाम हैं जिन्हें मोदी सरकार में ऊंचा ओहदा मिला है.

बड़ा प्रशासनिक अनुभव

केंद्रीय गृह सचिव के तौर पर बैजल का अनुभव उन्हें दिल्ली में नए उपराज्यपाल की गद्दी को आसानी से संभालने के योग्य बनाता है. वह दिल्ली के संवैधानिक और प्रशासनिक पद से अच्छी तरह वाकिफ हैं. साथ ही यहां के राजनीतिक समीकरणों को भी समझते हैं.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग के बीच जारी रही आए-दिन की रस्साकसी को देखते हुए बैजल मौजूदा हालात में दिल्ली की जिम्मेदारी संभालने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति माने गए.

फाइलों में छोटी-छोटी चीजों की समझ और प्रशासनिक फैसले लेने की काबिलियत उनमें है. ऐसे में वह मौजूदा आप सरकार के साथ पैदा होने वाले संभावित विवादों को किस तरह से मैनेज करेंगे, इस पर सबकी नजरें होंगी.

उपराज्यपाल के हाथ है पूरी ताकत

यूनियन टेरिटेरी के रूप में सरकार में दिल्ली की एक खास जगह है. दिल्ली में ज्यादातर एग्जिक्यूटिव पावर्स उपराज्यपाल के हाथ में होती हैं. इस साल अगस्त में दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले में यह साफ बता दिया गया कि संवैधानिक तौर पर दिल्ली का राजा कौन है.

यह फैसला केजरीवाल सरकार के लिए एक झटका था. हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि उपराज्यपाल दिल्ली के प्रशासनिक मुखिया हैं. चुनी गई सरकार के लिए गए सभी फैसले उन्हें बताना जरूरी हैं. दूसरे राज्यों में मौजूद राज्यपालों से उलट, दिल्ली के उपराज्यपाल मंत्रियों की सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं.

एलजी और दिल्ली के मुख्यमंत्री के बीच पैदा होने वाले किसी विवाद में इनके फैसले केंद्र के पास जाते हैं, जो कि इस पर अंतिम फैसला करता है.

आप नेताओं की टिप्पणी न आना शुभ संकेत

केजरीवाल सरकार ने अभी तक अनिल बैजल की एलजी के तौर पर नियुक्ति पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. केजरीवाल कुछ कहने से पहले शायद हालात का आकलन कर रहे हैं. दिल्ली में केजरीवाल सरकार और केंद्र में मोदी सरकार के बीच बने हुए तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए, आप नेताओं का किसी भी त्वरित टीका-टिप्पणी से बचना एक स्वस्थ परंपरा की शुरुआत दिखा रहा है.

अरविंद केजरीवाल

फोटो: पीटीआई

उपराज्यपाल के तौर पर नजीब जंग के साथ दो साल तक काम करने में आप को सबसे ज्यादा दिक्कत जंग के फाइलों में मौजूद बारीकियों को पकड़ने से हुई. जंग एक आईएएस अफसर रहे हैं, जो कि अन्य प्रोफेशनल पेशे में चले गए थे, बाद में वह एकेडेमिक्स में आ गए. उन्हें बेहद सौम्य और शिष्ट व्यक्ति के तौर पर देखा जाता है. लेकिन, काम के मामले में और फाइलों के साथ डील करने में वह एकदम अलग और सख्त व्यक्ति नजर आते हैं.

जंग की तरह से ही बैजल भी बेहद शिष्ट, मधुर और सुस्पष्ट शख्स हैं. आम आदमी पार्टी शायद इसी वजह से नए एलजी का आकलन करने से पहले कुछ वक्त लेना चाहती है.

जंग का कार्यकाल बनेगा मिसाल

जिस तरह से जंग और केजरीवाल ने पिछली कड़वाहटों को भुलाकर आगे बढ़ने का फैसला किया उसकी तारीफ की जानी चाहिए. अपने-अपने पक्ष को लेकर तीखी झड़प करने वाले दोनों लोगों ने झगड़े को दूर रखकर जिस तरह का शिष्टाचार दिखाया वह बेहद सराहनीय है.

जंग ने केजरीवाल को नाश्ते पर बुलाया और केजरीवाल काफी अच्छे मूड में बाहर आते दिखे. उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया भी जंग से मिले और यादगार पलों के बारे में जिक्र किया. दो साल की कड़वाहट की शिकन उनके चेहरों पर दिखाई नहीं दे रही थी.

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जिस तरह से जंग ने खुद ही उपराज्यपाल का पद छोड़ने का फैसला किया है. उससे उन्होंने राज भवनों और राज निवासों में बैठे अपने कद के पूर्व, वर्तमान और भविष्य के राज्यपालों और उपराज्यपालों से बिलकुल अलग कर लिया है.

राज्यपालों और उपराज्यपालों की खबरें अमूमन तभी आती हैं जब उन्हें पद से हटा दिया जाता है. गवर्नर की नियुक्ति केवल इससे संबंधित लोगों के लिए ही बड़ी खबर होती है, आम जनता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

हालांकि, जंग एक अलग मामला हैं. उनका टेन्योर, नियुक्ति और उनका पद छोड़ना आने वाले लंबे वक्त तक याद किया जाएगा. यहां तक कि इसे भारतीय राजनीति में छात्रों को केस स्टडी के तौर पर भी बताया जाएगा.

ऐसे माहौल में बैजल को अपने लिए जगह बनानी होगी. उनके हर कदम की दिल्ली के लोगों, मीडिया और राजनीतिक पार्टियों द्वारा गहरी पड़ताल होगी. उनके हर कदम की तुलना उनके पूर्ववर्ती जंग से की जाएगी.

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