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22 नवंबर को मुंबई का आजाद मैदान फिर बनेगा किसानों की नाराजगी का गवाह

मांगें पूरी होने तक यह आंदोलन जारी रहेंगे, कहते है ना मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए...

Updated On: Nov 17, 2018 09:16 AM IST

Ankita Virmani Ankita Virmani

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22 नवंबर को मुंबई का आजाद मैदान फिर बनेगा किसानों की नाराजगी का गवाह

इसी साल मार्च के महीने में महाराष्ट्र भर के लगभग 30,000 किसान 180 किलोमीटर लंबी यात्रा तय कर के अपनी मांगों के साथ मुंबई के आजाद मैदान पहुंचे थे. 22 नवंबर को एक बार फिर यह मैदान अन्नदाताओं की राज्य सरकार से नाराजगी का गवाह बनेगा.

कृषि के नजरिए से महाराष्ट्र देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है. महाराष्ट्र की लगभग 51 प्रतिशत जनसंख्या खेतीबाड़ी पर निर्भर है. लेकिन दुख की बात यह है कि इसी राज्य के 70,000 किसानों ने साल 1995 और साल 2005 के बीच आत्महत्या कर ली. 1997-2006 की एक स्टडी के मुताबिक देश में आत्महत्या करने वाला हर पांचवा किसान महाराष्ट्र से था.

लोक संघर्ष मोर्चा की महासचिव प्रतिभा शिंदे ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में बताया कि 20,000 से ज्यादा किसान और आदिवासी इसमें शामिल होंगे. इनमें ज्यादात्तर किसान विदर्भ, मराठवाड़ा, पूना, नगर और उत्तर महाराष्ट्र से होंगे.

मांगों पर बात करते हुए शिंदे ने कहा कि, सरकार ने ऋणमाफी की बात करते हुए कहा था कि पति और पत्नी को व्यक्तिगत पहचान मानते हुए डेढ़ लाख तक की छूट दी जाएगी. यह वादा पूरा नहीं किया गया. सरकार उसके आंकड़े जारी करें और सभी को इसके दायरे में लें.

 

मार्च में विरोध में शामिल हुए किसान

मार्च में विरोध में शामिल हुए किसान

सरकार ने अपने वादे पूरे नहीं किए:

सरकार ने स्वामिनाथन समिति की सिफारिशों के हिसाब से तो एमएसपी लागू नहीं की. पर जो भी एमएसपी सरकार द्वारा लागू की गई है कम से कम किसान को वो तो पूरी मिले. सरकार एमएसपी को लेकर एक न्यायिक व्यवस्था बनाएं. जिससे किसान को सही दाम मिले. तीसरी मांग ठंड में दिन में सिंचाई के लिए बिजली की है. सरकार फसल के हिसाब से कम से कम 8 घंटे बिजली दे. साथ ही इसे मुफ्त किया जाए. इसके अलावा, आदिवासी किसान सदियों से खेती बाड़ी कर रहा है पर आज तक उन्हें लैंड राइट्स नहीं मिले हैं. फॉरेस्ट राइट एक्ट के हिसाब से उन्हें लैंड राइट्स मिलने चाहिए. महाराष्ट्र में इस एक्ट पर सिर्फ 18 प्रतिशत ही अमल हुआ है. साथ ही जो नीतियां बाकी किसानों के लिए हैं, वो आदिवासी किसानों को भी भी मिलें.

ये हमारी कुछ प्रमुख मांगें है. इसके अलावा, कृषि पंप ट्रांसफार्मर की 48 घंटे में मरम्मत, स्कूल पोषक आहार में केला शामिल करने जैसी मांगें शामिल है.

इस आंदोलन में लोक संघर्ष मोर्चा के साथ कई छोटे बड़े किसान दल भी शामिल होंगे. सामाजिक कार्यकर्ता और भारत बचाओ आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक फिरोज मिथिबोरवाला कहते हैं कि, 'मार्च में जो आंदोलन हुआ उसके आगे सरकार झुकी तो लेकिन किसान की मांगे पूरी नहीं हुई. तो इस बार लोक संघर्ष मोर्चा के नेतृत्व में यह तय किया गया है कि हम तब तक आजाद मैदान में बैठेंगे, जब तक सरकार इस पर अमल करना शुरू नहीं करेगी. महाराष्ट्र का एक बड़ा हिस्सा पहले से ही सूखे से ग्रस्त है और आने वाले महीनों में यह बढ़ेगा, क्या सरकार इससे निपटने के लिए तैयार है?' बता दें कि महाराष्ट्र की 350 तहसीलों में से 180 को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया गया है.

मार्च महीने में हुए किसान आंदोलन को मुबई की आम जनता का साथ मिला था. फिरोज कहते है, 'हम भी मुंबई के लोगों को परेशान नहीं करना चाहते और इसलिए हम रात में मार्च करेंगे. हमें उम्मीद है मुंबई के लोगों से वो ही सपोर्ट दोबारा मिलेगा.'

 

farmer protest

लेकिन कुछ सवालों के जवाब मिलने बाकी:

अहम सवाल यह भी कि क्या इन आंदोलनोंं से सच में कोई बदलाव आएगा? क्या है इन आंदोलनों की परिणति? शिंदे कहती है कि उन्हें यकीन है कि बदलाव जरूर आएगा, जब कोई नींव रखी जाती है तो पहले या आखिरी पत्थर की बात नहीं की जाती... वर्ना मांगे पूरी होने तक यह आंदोलन जारी रहेगा. कहते हैं ना मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए...

फिरोज ने बताया कि इस आंदोलन को काफी राजनीतिक दलों का भी साथ मिल रहा है. जैसे आम आदमी पार्टी, जनता दल सेक्यूलर, एनसीपी और उन सभी के प्रतिनिधि आजाद मैदान के मंच पर दिखेंगे. साथ ही योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, पानी बाबा राजेंद्र सिंह भी इस आंदोलन में शामिल होंगे.

प्रतिभा बताती है कि इस आंदोलन में कई युवा भी उनके साथ शामिल होंगे. वो कहती हैं कि, 'किसानों के बच्चों में इतना गुस्सा है कि वो कहते हैं कि बंबई को पानी देना, दूध देना, सब्जी देना, बिजली देना सब हमारे हाथ में है, वो ही बंद करते हैं. इस देश के लोगों और खासतौर से किसानों के साथ अगर हम खड़े नहीं हुए, तो या तो किसान आत्महत्या करेगा या फिर विद्रोह करेगा.और दोनों ही चीजें देश को बहुत क्षति पहुचांएगी. किसान जो धरती का पेट फाड़ के अनाज उगाता है उसे सिर्फ जिंदा रखना नहीं, बल्कि सम्मानजनक जिंदा रखना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.'

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