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लिंचिंग की त्रासदी: मुसलमानों में बढ़ा डर और गाय अब भी दरबदर

Updated On: Jul 24, 2018 02:14 PM IST

Saurabh Sharma

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लिंचिंग की त्रासदी: मुसलमानों में बढ़ा डर और गाय अब भी दरबदर

(एडिटर्स नोटः गृहमंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2014 से लेकर 3 मार्च 2018 तक 45 लोग भीड़ के द्वारा पीट-पीटकर मार डाले गए हैं. हाल ही में राजस्थान के अलवर में गांववालों के एक समूह ने 28 वर्षीय अकबर खान की पीट-पीटकर हत्या कर दी. ये घटना सुप्रीम कोर्ट के द्वारा केंद्र सरकार को मॉब लिचिंग रोकने के लिए कानून बनाने के लिए कहने के महज पांच दिनों के बाद घटित हुई है. फ़र्स्टपोस्ट ने इन घटनाओं की पड़ताल की है और ये जानने की कोशिश की है कि जान से मारने वाली भीड़ की मनोदशा क्या होती है और ऐसी कौन सी वजह होती है कि वो उग्र होकर किसी की जान तक ले लेते हैं.)

सबसे पहले ये उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक के लिए आए, इसके बाद जम्मू कश्मीर के श्रीनगर में जाहिद रसूल भट्ट, झारखंड का लातेहार जिला, गुजरात के दलित, राजस्थान में पहलू खान, बल्लभगढ़ में जुनैद खान, हापुड़ में कासिम और समीउद्दीन और इन घटनाओं के बीच में कई और. ये सब एक ऐसी उग्र भीड़ का निशाना बने जिसके केंद्र में है गाय, या कहें पवित्र गाय.

दरअसल ये सूची है लिचिंग्स की जिसमें उग्र भीड़ ने संदेह या अफवाह के कारण लोगों को पकड़ लिया और उनकी इतनी पिटाई की कि उनकी मौत हो गई. ये देश का नया भीड़तंत्र है. जिसमें सुनवाई कोई नहीं और फैसला बीच सड़क पर कर दिया जाता है.

2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद इस तरह की घटनाओं में काफी वृद्धि हो गई है. इंडियास्पेंड के द्वारा पिछले साल लिचिंग्स के संबंध में एक रिपोर्ट जारी की गई जिसमें लिचिंग्स की घटनाओं के पूरे आंकड़ें रखे गए हैं. जिन राज्यों में लिचिंग्स जैसी हेट क्राइम्स हुई हैं उनमें से अधिकतर में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. इन पूरी घटनाओं में केवल एक मामले में आरोपी को दोषी ठहराया जा सका है. अभी तक कई मामलों में पीड़ित के ऊपर ही एफआईआर दर्ज की गई है. इनमें से कई अल्पसंख्यक समुदाय से आनेवाले हैं जो कि डेयरी चलाने और पशुधन से जुड़ा व्यापार कर अपनी जीविका चलाते थे. लेकिन इन घटनाओं को अंजाम देने वालों को छोड़ दिया गया है.

अभी हाल ही में एक केंद्रीय मंत्री की एक फोटो सामने आई है जिसमें वो लिचिंग के आरोपियों को माला पहना कर उनका स्वागत और सम्मान कर रहे हैं. इन आठ आरोपियों पर आरोप है कि ये झारखंड के एक मीट व्यवसायी की मॉब लिचिंग में शामिल थे.

इन घटनाओं में मारे गए लोगों के परिवार का क्या हाल है, जिन्होंने अपने प्रिय लोगों को और घर के इकलौते कमाने वाले व्यक्ति को भीड़ के हाथों खो दिया. और बेचारी उस गाय का क्या जिसका उन्मादी भीड़ से कोई लेना देना नहीं. आखिर इस देश में ऐसा अचानक ऐसा क्या हो गया कि लोगों के मन में जानवरों के लिए अप्रत्याशित प्यार उमड़ पड़ा और लोग अपने जैसे इंसानों के खून के प्यासे हो गए.

पीड़ित परिवारों के जख्म अब भी हरे हैं

पिछले महीने अनस के परिवारवालों पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा, जब उन्हें पता चला कि उनके 45 साल के पशुधन व्यवसायी पिता कासिम को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला. भीड़ उस अफवाह पर उग्र हो गई थी जिसमें उनपर उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में गायों की तस्करी का आरोप लगाया गया था. इस भीड़ में कई नाबालिग भी शामिल थे जिन्होंने कासिम और समीउद्दीन पर कोई रहम नहीं किया. 65 वर्षीय समीउद्दीन भी भीड़ के निशाने पर उस समय आ गए जब उन्होंने कासिम को बचाने की कोशिश की. समीउद्दीन की पिछले हफ्ते सर्जरी हुई है.

कासिम की ऑटोप्सी रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि उन्हें 10 जगह पर गंभीर चोट लगी हुई थी. कासिम का भाई सलीम अभी तक सदमे से उबर नहीं पाया है. कासिम का पूरा परिवार इस घटना के बाद भय के साये में जी रहा है. सहमे सलीम का कहना है कि 'हमें नहीं मालूम कि कब लोग मेरे घर में घुस आएंगे और हमें भी पीट-पीटकर मार डालेंगे. मेरे भाई को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला. उस पर ये आरोप लगाया गया था कि वो गो-तस्करी में शामिल है. लेकिन वो पशुओं का व्यापारी था. हमारी दो पीढ़ियां ये काम कर रही हैं. हम लोग अपने जानवरों को अपने जैसा प्यार करते हैं. कोई भी कैसे भी किसी भी तरह का आरोप लगा देगा और मार देगा?'

अब समाज और भाईचारे से विश्वास उठ चुका है

सलीम का कहना है कि 'भीड़ का हिस्सा बने कई लड़के कासिम को जानते थे, इसके बावजूद उन्होंने उसे मार दिया. पुलिस इस मामले को रोडरेज का केस साबित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को देखने से साफ पता चलता है कि कासिम की हत्या की गई है और वो भी जान-बूझकर. हम लोग अब घर से बाहर कदम रखने से भी डरते हैं और लोगों ने हमसे बात करना तक छोड़ दिया है, खास करके हिंदुओं ने.'

इस घटना के बाद से इस गांव के मुसलमानों के मन में डर बैठ गया है. अब घर का राशन पानी लाने के लिए भी ये लोग समूहों में ही निकलते हैं. इन्होंने मांसाहारी भोजन छोड़ दिया है और इनके बच्चे घरों से बाहर तक निकलना भूल गए हैं. स्कूल और खेलने के लिए भी ये बाहर नहीं निकलते.

कासिम के जाने का बाद पूरा परिवार परेशानी झेल रहा है. कासिम के व्यापार से ही घर का खर्चा चल रहा था. इन परिस्थितियों से निराश सलीम पूछते हैं कि 'आखिर हम अपने घर में बंद कब तक रहेंगे.'

कुछ इसी तरह की पीड़ा और निराशा की कहानी वकील अहमद ने सुनाई. वकील अहमद के पिताजी की पिछले साल यूपी के बुलंदशहर में भीड़ ने पीट पीट हत्या कर दी थी.लेकिन उनकी हत्या का कारण गाय नहीं बल्कि कुछ और था. इस घटना के बाद उन्हें घर छोड़ना पड़ा और अब वो अलीगढ़ में रहते हैं लेकिन अभी तक परिवार पालने के लिए उन्हें नौकरी नहीं मिल सकी है.

वकील बताते हैं कि 'मेरे पिताजी की हत्या के बाद मेरे परिवार का बायकॉट कर दिया गया जबकि सभी जानते थे कि सरेआम उनकी हत्या कर दी गई थी. दुकानवालों ने हमें सामान देना बंद कर दिया और अधिकारियों ने राशन. हम भाइयों की नौकरी भी छूट गई. पूरे गांव में केवल एक हिंदू परिवार था जिसने हमसे साबका रखा था लेकिन उसे भी इसके लिए समाज से कितनी ही प्रताड़ना झेलनी पड़ी. मजबूरन हमें अपना घर छोड़ना पड़ा और अलीगढ़ आ गए.'

गायों की स्थिति में भी सुधार नहीं

लेकिन अफसोस की बात ये है कि इतने कत्लों के बाद भी ‘गऊ माता’ की स्थिति सुधरी नहीं है. हमारे देश में लगभग 50 लाख गाएं सड़कों पर यूं ही विचरण करती रहती हैं. सड़कों पर इनके घूमने से कई बार दुर्घटनाएं भी हो जाती है. पिछले ढाई साल में गायों की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं में 300 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.

गोभक्त सुनील सिंह जो कि पहले एक हिंदुत्ववादी संस्था से भी जुड़े थे, उनका कहना है कि बीजेपी सरकार ने अपने घोषणपत्र में वादा किया था कि वो गायों के संरक्षण के लिए काम करेंगे लेकिन जमीन पर इससे संबंधित शायद ही कुछ होता नजर आया है. सुनील सिंह का कहना है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने तो और बड़ा नाटक किया. उन्होंने पूरे राज्य में सभी कत्लखानों पर रोक लगाने का आदेश दिया था लेकिन आज भी लगभग सभी शहरों में अवैध बूचड़खाने चल रहे हैं. गो-तस्करी जारी है, बल्कि बढ़ गई है. जानवर सड़कों पर घूम रहे हैं, प्लास्टिक खा रहे हैं और मर रहे हैं लेकिन उन्हें देखने वाला कोई नहीं. गायों को बचाने के लिए आजतक ठोस रूप से कुछ नहीं हो सका है.

अभी हाल ही में लखनऊ में सात गायों की मौत हो गई. इस पर जांच बिठाई गई लेकिन अभी तक इन मौतों का खुलासा नहीं हो सका है. मार्च में भी लखीमपुर खीरी जिले में कई गायें मरी पायी गईं. वहां लोगों ने इसको लेकर प्रदर्शन भी किया. पुलिस ने भी मामला दर्ज कर लिया लेकिन अभी तक गायों की मौत की वजह का पता नहीं चल सका है.

कृषि वैज्ञानिक बलबीर सिंह के मुताबिक, भारत में सबसे बड़ी समस्या ये है कि लोग यहां पर गायों को केवल दूध के लिए खरीदते हैं और जैसे ही गाय दूध देना बंद कर देती है उसे सड़कों पर आवारा घूमने के लिए छोड़ देते हैं. बलबीर सिंह के मुताबिक, 'भारत में गायें लाभ कमाने का जरिया है. जब गायें दूध देना बंद कर देती हैं तो लोग उसे रखना नहीं चाहते. लोग उसे सड़कों पर मरने के लिए छोड़ देते हैं. सड़कों पर इस तरह से गायों को छोड़ने की कहानी नई नहीं है बल्कि ऐसा वर्षों से होता आ रहा है. इसपर रोक लगाने का एकमात्र जरिया जागरूकता है.'

यहां ये बताना जरूरी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय गोकुल मिशन की घोषणा कर रही है और देसी गायों की देखभाल के लिए 500 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है. इसके अलावा केंद्र सरकार ने 2014 से 2016 के बीच गोशालों के निर्माण के लिए 4 करोड़ 10 लाख खर्च किया है.

लेकिन लखनऊ के बाहरी इलाके में गौशाला चलाने वाले एके यादव की शिकायत है कि उनकी गौशाला में काफी भीड़ है और वहां क्षमता से ज्यादा गायें रखी गई हैं. उनका कहना है कि 'मेरे गौशाला की क्षमता 40 गायों के रखने की है लेकिन वहां पर 200 गायें रखी हुई हैं. लोग गायों को सड़कों पर छोड़ देते हैं जहां पर वो कूड़ा और प्लास्टिक खाती हैं. उनमें से कई गायों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हो जाती है. उनकी देखभाल करनेवाला कोई नहीं होता. गायों को आवारा इसलिए भी छोड़ दिया जाता है क्योंकि दूध देना बंद करने के बाद हिंदू उसे मुफ्त में भी रखना नहीं चाहते. हिंदू गायों को मुसलमानों को भी नहीं बेचते क्योंकि उन्हें मालूम है कि वहां गायों को मार दिया जाएगा.'

लेकिन 'गाय सुरक्षा नीतियों' के बावजूद भारत विश्व के शीर्ष बीफ निर्यातकों में से एक है. अभी तक का सबसे ज्यादा बीफ निर्यात 4.78 बिलियन डॉलर का 2014-15 में किया गया था.

(सौरभ शर्मा लखनऊ के स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com के मेंबर हैं. 101Reporters.com जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों को देशव्यापी नेटवर्क है.)

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