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कश्मीर के युवाओं को पूर्व आर्मी जनरल ने लिखा खुला खत

आज मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं कि कश्मीर के नौजवानों, मैं सेना का एक जवान हूं

FP Staff Updated On: Apr 13, 2017 11:31 PM IST

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कश्मीर के युवाओं को पूर्व आर्मी जनरल ने लिखा खुला खत

भारतीय सेना के एक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डी.एस. हुड्डा ने कश्मीर में अलगाववादियों के हाथों की कठपुतली बनकर सुरक्षाबलों पर पथराव करने वाले नौजवानों के नाम खुला पत्र लिखा है.

इस पत्र में उन्होंने कश्मीर में अपनी पोस्टिंग से लेकर वहां के हालातों को बयां किया है. इसके साथ ही उन्होंने पत्थर फेंकने वाले कश्मीरी नौजवानों को कुछ सलाह भी दी हैं. रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डी.एस. हुड्डा का पत्र कुछ इस प्रकार है.

आप में से कुछ लोग गुस्से में हैं. हालांकि, मैं आपके मकसद और आपकी समझ से इत्तेफाक नहीं रखता हूं. लेकिन फिर भी मैं उसका कारण समझ सकता हूं. मैं आपकी जिंदगी का एक अभिन्न हिस्सा था और भले ही आप लोग मानते हों कि मैं आपके जीवन में घुसपैठ करने वाला था और आपको मेरा वहां होना पसंद नहीं था, फिर भी मैं आपके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा था. आप शायद मुझसे नफरत करते थे, और बहुत बार मैं भी आपसे नफरत करता था. लेकिन किस्मत के इस ताने-बाने में मुझे आपको समझने का मौका मिला. और इसलिए आज मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं कि कश्मीर के नौजवानों, मैं सेना का एक जवान हूं.

मैं आपका दर्द समझता हूं. जब आपने कोई साथी या कोई अपना खोया, क्योंकि मैंने भी ठीक वैसा ही दर्द महसूस किया है और वैसा ही दुःख अपने घर में भी देखा है. बिल्कुल आपकी ही तरह मैं भी इस बात को समझता हूं कि यह लड़ाई सिर्फ मरे हुए लोगों की ही नहीं है. यह लड़ाई है मरी हुई संभावनाओं की, मरी हुई शिक्षा की और मर चुके लड़कपन की.

आपसे अलग मैं यहां दो-तीन सालों की पोस्टिंग पर आता हूं और फिर चला जाता हूं. इसलिए मैं चीजों को एक ऐसे नजरिये से देखता हूं जिस पर इतिहास और भावनाओं का रंग नहीं चढ़ा होता. मैं सिर्फ वही देखता हूं जो आज हो रहा होता है और मुझे वाकई आप लोग एक गर्त में जाते हुए दिखाई देते हो- जिसका इस्तेमाल कई संगठन सिर्फ अपना स्वार्थ साधने के लिए करते हैं.

यह आपके जीवन के बहुत मुश्किल 30 साल रहे हैं. मैंने इसको बहुत करीब से देखा है, अपनी पोस्टिंग के दौरान आपके गांव में रहते हुए मैंने आपके फेंके हुए पत्थर खाए हैं और गोलियां चलाई हैं. मैं साफ तौर पर कहना चाहता हूं कि अगर परिस्थितियां ऐसी ही रहीं तो यह आने वाली पीढ़ी को भी नुकसान पहुंचाएगी और उन नौजवानों की हालत भी आपके जैसी ही होगी. हम इस बात पर बहस कर सकते हैं कि इन सब का जिम्मेदार कौन है.

मैं जानता हूं कि आप मुझे दोष दोगे, लेकिन क्या यह आरोप-प्रत्यारोप वाकई किसी का भला कर पाएगा? क्या आपको अपनी परिस्थितियां खुद अपने हाथों में नहीं ले लेनी चाहिए? यह आपकी जिंदगी है, यह आपका भविष्य है. अगर आप खुद ही इसके बारे में चिंतित नहीं हैं तो इसकी चिंता कौन करेगा? क्या आप अपनी जिंदगी ऐसे लोगों के हाथों से चलाना चाहेंगे जो कश्मीर के मैदान पर आपको प्यादों की तरह इस्तेमाल करेंगे? यह आपका समय है, आप भी तो थोड़े खुदगर्ज बनो. दुनिया सिकुड़ रही है- संभावनाएं पूरी दुनिया में फैली हैं. कश्मीर घाटी से आगे देखो और खुद को इस मौके के लिए तैयार करो. दुर्भाग्य से, ऐसा नहीं हो पाएगा अगर स्कूल और कॉलेज बंद ही रहेंगे.

नेल्सन मंडेला ने कहा था, "दुनिया को बदलने के लिए सबसे ताकतवर हथियार शिक्षा है." पत्थर तो इस श्रेणी में दूसरे नम्बर पर भी नहीं आते. अपना रास्ता आपको खुद चुनना है. लेकिन ध्यान से चुनना. पत्थरबाजी, झंडे फहराना और स्कूलों को जला देना न तो तुम्हारी पहचान बनाएगा ना ही तुम्हारे मकसद में कोई मदद करेगा. बारह साल का फैजान जो तुम्हारी पत्थरबाजी का 'तमाशा' देखने आया था, गोली लगने से उसकी जान चली गई. जिन वीडियो में तुम जवानों को मारते और उन पर पत्थर बरसाते दिखते हो, वह वीडियो देश में सिर्फ नफरत और उसकी आग भड़काने का ही काम करते हैं. किसी भी किस्म के आतंकवाद से जुड़ाव तुम्हें फिर से एक खूंटे से बांध देगा. कश्मीरियत खत्म हो जाए, तुम भी तो यह नहीं चाहोगे. जो आदर्श तुम अपने घर में, अपने बुजुर्गों के बीच देखते हो, वह भी तो इसी विचारधारा से बने हैं.

अगर तुम इन आदर्शों का सम्मान करते हो तो उन्हें बचा लो. तुम एक सपना देखो. अगर तुम सपना नहीं देखोगे तो तुम उस हकीकत के नजदीक भी नहीं जा पाओगे, जिसको तुम हासिल कर सकते हो. और यह सपना सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा हो. सिर्फ अपने दिल की सुनो क्योंकि वही तुम्हें बताएगा कि सही क्या है- कि तुम्हारे हाथों को अपना भविष्य उठाना चाहिए या फिर पत्थर.

(साभार: न्यूज़18)

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