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वर्मा बनाम अस्थाना: बहुत देर हो जाए इससे पहले दूसरी एजेंसियों में सफाई अभियान शुरू होना चाहिए

मौजूदा हालात की मांग है कि सरकार को बहुत देर हो जाने से पहले ही कदम उठाकर विभिन्न एजेंसियों में सफाई अभियान चलाना होगा.

Updated On: Oct 25, 2018 05:47 PM IST

Yatish Yadav

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वर्मा बनाम अस्थाना: बहुत देर हो जाए इससे पहले दूसरी एजेंसियों में सफाई अभियान शुरू होना चाहिए
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सीबीआई में आधी रात के तख्तापलट से भी सरकार को राहत मिलती नहीं दिख रही. सरकार  दो शीर्ष अधिकारियों-एके वर्मा और राकेश अस्थाना की खींचतान को लेकर आलोचकों के निशाने पर थी लेकिन वह केवल निदेशक वर्मा और उनके मातहत अस्थाना को छुट्टी पर भेजकर आराम से नहीं बैठ सकती है.

वास्तव में नामी हस्तियों के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में जुटी प्रमुख जांच एजेंसियों की अंदरूनी लड़ाई में अभी और भी गड़े मुर्दे उखाड़े जाएंगे. वर्मा सर्वोच्च न्यायालय चले गए हैं और एक तरह से इशारों में सरकार पर हमला करते हुए दावा किया है कि आधी रात की कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि उन्होंने राजनीतिक दबाव को मानने से इनकार कर दिया.

दूसरी तरफ उनके डिप्टी उच्च न्यायालय में मीट निर्यातक मोईन कुरैशी से जुड़े कथित रिश्वत मामले में वर्मा की तरफ से अपने खिलाफ दर्ज कराई प्राथमिकी रद्द करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में एक अलग लड़ाई लड़ रहे हैं. सीबीआई में यह बखेड़ा और गंदी लड़ाई काफी समय से चल रही थी और इस विवाद ने दो गुट बना दिए हैं जो एक दूसरे को भ्रष्ट बता रहे हैं.

वर्मा गुट के करीबी सूत्रों का कहना है कि यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और प्रशांत भूषण द्वारा शिकायत दर्ज कराने के बाद राफेल सौदे को लेकर उनके रवैये ने नीति नियंताओं को बेचैन कर दिया था. इसके अलावा, सूत्रों का दावा है कि अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद उनके द्वारा संवेदनशील मामलों की जांच करने को लेकर वर्मा सहज नहीं थे. यही वह बिंदु है जहां हालात और बदतर हो जाते हैं और एक अन्य जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का दखल होता है.

बीते साल जब अस्थाना को विशेष निदेशक के रूप में पदोन्नत किया जा रहा था, तब केंद्रीय सतर्कता आयोग को बताया गया था कि आयकर, सीबीआई और ईडी द्वारा की जा रही जांच में संदेसारा समूह से मिली एक डायरी में उनका नाम है. डायरी के बारे में सीवीसी को भेजे इस नोट को फ़र्स्टपोस्ट ने भी देखा है.

इसमें किसी अस्थाना सर के बारे में तीन प्रविष्टियां हैं, जो कि खाता संख्या लगती हैं. डायरी की प्रविष्टियों की प्रामाणिकता सत्यापित नहीं की जा सकीं. फिर भी, सीवीसी ने सीबीआई से आरोपों की जांच करने और एक रिपोर्ट जमा करने के लिए कहा. लेकिन इस पर कुछ नहीं हुआ, न ही ईडी ने सतर्कता एजेंसी द्वारा संदेसारा समूह से पैसे लेने के आरोपों पर पूछे गए सवाल का जवाब दिया.

In fight in CBI

सूत्रों का कहना है कि हालांकि ईडी ने जोर देकर कहा कि कथित आरोप की गहराई तक पहुंचने के लिए उसे और अधिक समय चाहिए. इस बीच, वर्मा और अस्थाना के बीच रिश्ते टकराव के अंतिम बिंदु तक पहुंच गए. अस्थाना ने सीवीसी और कैबिनेट सचिव समेत उच्च अधिकारियों को पत्र लिखना शुरू कर दिया और आरोप लगाया कि वर्मा उनके खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रसित और पक्षपातपूर्ण हैं. वह एक कदम और आगे बढ़े और यहां तक आरोप लगाया कि उनके बॉस कुछ मामलों में उन्हें फंसाने की कोशिश कर रहे हैं. फिर आया मोईन कुरैशी का मामला. सीबीआई ने सितंबर में कहा कि अस्थाना की ईमानदारी संदिग्ध है और एजेंसी को कम से कम आधा दर्जन मामलों में उनके खिलाफ सबूत मिले हैं. दोनों अधिकारियों ने सीवीसी के सामने एक ही मामले में एक-दूसरे के खिलाफ पत्र लिखा था.

15 अक्टूबर 2018 को मोईन कुरैशी मामले में घोटाले की जांच खत्म करने के लिए धन लेने के आरोप में एजेंसी द्वारा अस्थाना के खिलाफ केस दर्ज किया गया था. अस्थाना ने 24 अगस्त 2018 को कैबिनेट सचिव को एक पत्र लिखा था जिसमें आरोप लगाया गया था कि सतीश बाबू सना ने मामले में जांच से बचने के लिए सीबीआई निदेशक को 2 करोड़ रुपये दिए थे. सीवीसी के नोटिस पर सीबीआई ने 14 सितंबर 2018 को जवाब दिया कि अस्थाना की शिकायत को एक दागी अधिकारी द्वारा जांच एजेंसी में विभिन्न पदों पर बैठे अधिकारियों को डराने की एक बेचैनी भरी कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए.

सीवीसी ने हालांकि कभी भी शिकायतकर्ता के नाम का खुलासा नहीं किया, लेकिन ऐसा माना जाता है कि यह पत्र लिखने वाला अस्थाना के अलावा कोई दूसरा नहीं था. सीवीसी ने कहा, 'यह सीबीआई का अपना अंदाजा है कि किसी व्यक्ति विशेष ने कुछ निर्दिष्ट व्यक्तियों के खिलाफ शिकायत की है. आयोग ने इस बारे में कभी भी सीबीआई को सूचित नहीं किया है, चाहे वह शिकायतकर्ता हो या जिसके खिलाफ शिकायत की गई हो, लेकिन इस आधार पर कुछ रिकॉर्ड मांगे हैं कि ऐसी फाइलों को संभालने के संबंध में कुछ आरोप प्राप्त हुए हैं.'

अब कहानी में सीवीसी का पदार्पण होता है

आयोग ने सितंबर में सीबीआई निदेशक वर्मा से सहयोग करने और कुछ आरोपों का सत्यापन कराने व एजेंसी में मची खींचतान को लेकर तार्किक नतीजे पर पहुंचने के लिए कुछ रिकॉर्ड जमा करने का अनुरोध किया था. आयोग ने सीबीआई से कहा कि फाइलों को पेश करे और जांच के बाद वह उन्हें वापस ले सकती है. सीवीसी ने कहा, 'फाइलें/दस्तावेज अब तक जमा नहीं किए गए हैं. इस संबंध में आयोग को सीबीआई से स्थगन के लिए कोई पत्र/अनुरोध भी प्राप्त नहीं हुआ है. आयोग ने 25 सितंबर को एक और रिमाइंडर भेजा कि 10 महीने का वक्त बीत जाने के बावजूद उसे सीबीआई से कोई रिपोर्ट नहीं मिली. कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर निदेशक वर्मा को 3 अक्टूबर 2018 को एक और पत्र भेजा गया, जिसमें उन्हें 4 अक्टूबर 2018 को मुख्य सतर्कता आयुक्त केवी चौधरी के साथ बैठक में शामिल होने को कहा गया था, लेकिन वर्मा नहीं आए.'

इसके बाद सीवीसी ने वर्मा को लिखा कि अस्थाना के खिलाफ कोई कार्रवाई करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति जरूर लेनी चाहिए. 'सीबीआई निदेशक को 15.10.2018 को पत्र भेजा गया जिसमें कहा गया कि विशेष निदेशक (अस्थाना) के भेदभाव व पूर्वाग्रह के आरोपों की जांच की है. सीबीआई द्वारा किसी अधिकारी के खिलाफ अगर कोई पूछताछ/जांच जरूरी हो, तो भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 17 (ए) के तहत सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति लेने का ध्यान जरूर रखा जाए.'

सीबीआई ने सीवीसी के पत्र पर विचार नहीं किया और दुबई स्थित मध्यस्थों के मार्फत सतीश बाबू सना से रिश्वत लेने के लिए उसी दिन अस्थाना के खिलाफ मामला दर्ज किया गया. सीबीआई मुख्यालय के भीतर यह युद्ध की शुरुआत भर थी. एफआईआर के एक हफ्ते बाद, एसआईटी के संयुक्त निदेशक साई मनोहर ने आयोग को एक पत्र लिखा जिसमें अस्थाना का एक गुप्त नोट संलग्न था, जिसमें मोईन कुरैशी मामले में एक स्रोत से मिली जानकारी का हवाला देते हुए बताया गया था कि सना ने 2 करोड़ रुपए सीबीआई निदेशक को दिए हैं.

सीवीसी ने यह भी बताया कि दिन-प्रति-दिन की जांच में घटना क्रम के बारे में अस्थाना को अपटेड करने के लिए पत्र में संयुक्त निदेशक एसआईटी को निर्देशित किया गया था. इसके साथ 1.10.2018 का सना का एक हस्तलिखित नोट भी था जिसमें उसने दावा किया था कि एक संपर्क सूत्र, जो कि मामले को सुलझाने के लिए कथित रूप से सीबीआई निदेशक से मिला था, के माध्यम से मामला हल कर लिया गया है. आयोग ने आगे कहा कि सीबीआई निदेशक मामले से संबंधित फाइलें पेश करने में सहयोग नहीं कर रहे थे और बार-बार आश्वासन के बावजूद आज तक नहीं इस पर अमल नहीं किया गया है.

'इस बीच सीबीआई में रंजिश और गुटबाजी का माहौल अपने चरम पर पहुंच गया था जिससे संगठन की प्रतिष्ठा/विश्वसनीयता को गहरा नुकसान पहुंचा. सीबीआई के आला अफसरों द्वारा एक दूसरे पर लगाए भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की मीडिया में हुई व्यापक कवरेज ने भी सरकारी कामकाज के माहौल को खराब कर दिया था और इसका गहरा असर दूसरे अधिकारियों पर पड़ रहा था.' सीवीसी ने 23 अक्टूबर के 8 पेज के नोट में वर्मा को हटाने को सही ठहराते हुए यह बात कही है और बताया कि यह कदम असाधारण और आकस्मिक स्थिति के संदर्भ में उठाया गया है.

लेकिन, सत्ता के गलियारों में परछाइयों की लड़ाई का खेल अभी खत्म नहीं हुआ है. वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के दखल की मांग की है और इसी बीच नए नियुक्त अंतरिम निदेशक एम. नागेश्वर राव के खिलाफ भी आरोप सार्वजनिक होने शुरू हो गए हैं. इसके अलावा वर्मा और अस्थाना दोनों गुटों के शातिर खिलाड़ी विभिन्न कारणों को लीक करके एक दूसरे को मात देने की कोशिश में जुट गए हैं, जिनमें प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा कथित रूप से एक वरिष्ठ नौकरशाह को बचाने के प्रयास और वर्मा के राफेल सौदे में गहरी रुचि लेने की बात भी शामिल है.

फ़र्स्टपोस्ट ने अगस्त में रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि पीएमओ के सूत्रों ने इस तरह के आरोपों को खारिज कर दिया है कि कोई हस्तक्षेप नहीं था और इस अधिकारी की ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठा सकता और जांच एजेंसियां इस मामले की जांच के लिए स्वतंत्र थीं.

इन आरोपों पर कि कुछ हाई प्रोफाइल मामलों पर अस्थाना नरम रुख अपना रहे थे, सूत्रों ने कहा था कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है और इस तरह की जांच तार्किक निष्कर्ष पर ले जाएगी. हालांकि ईडी अधिकारियों ने जोर दिया था कि मंदेसरा डायरी में नाम आने के बाद अस्थाना की भूमिका की जांच की जानी चाहिए.

K.V. CHOWDARY

सीवीसी ने यह भी कहा कि सीबीआई निदेशक आयोग के साथ सहयोग नहीं कर रहे थे, आयोग की आवश्यकताओं/निर्देशों का पालन नहीं कर रहे थे और जानबूझकर आयोग के कामकाज में रुकावटें पैदा कर रहे थे, जो कि एक संवैधानिक निकाय है.

आने वाले दिनों में सरकार को और ज्यादा हमलों का सामना करना पड़ेगा. अस्थाना और वर्मा दोनों के खिलाफ आरोपों की जांच करने की जरूरत है और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भ्रष्टाचार के सभी लंबित मामलों को समयबद्ध तरीके से तार्किक निष्कर्ष पर ले जाया जाए. इसमें कोई संदेह नहीं है कि विपक्षी दल हमले पर हमले करेंगे, लेकिन भ्रष्टाचार के मामलों की जांच की पवित्रता को बहाल करने के लिए सरकार को केंद्रीय एजेंसियों पर सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है, जहां मौजूदा संकट की पटकथा लिखी गई थी.

पूर्व सीबीआई अधिकारी बी.आर. लाल ने एक बार लिखा था: 'यहां तक कि एक ईमानदार अधिकारी को भी जब अपने राजनीतिक आका के आदेशों का सामना करना पड़ता है, तो वह नियमों और मूल्यों का पालन करने में बेबस हो जाता है. उसे नमकहराम समझा जाता है मानो वफादारी सिस्टम के लिए नहीं, बल्कि व्यक्ति-विशेष के लिए है.' ऐसा सोचना स्वप्नलोक की बात होगी कि सीबीआई एक आजाद तोता है और यह पिंजरे में बंद नहीं है. लेकिन, मौजूदा हालात की मांग है कि सरकार को बहुत देर हो जाने से पहले ही कदम उठाकर विभिन्न एजेंसियों में सफाई अभियान चलाना होगा.

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