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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी: मुस्लिम बिना पानी पिए रोजा रखते थे और हिंदू पानी पीकर

मुस्लिम आबादी होने के कारण तमाम खाने के होटल और दुकानें बंद रहती थी

Avinash Tripathi Updated On: Jun 14, 2017 10:57 AM IST

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी: मुस्लिम बिना पानी पिए रोजा रखते थे और हिंदू पानी पीकर

तमाम वजह से सुर्खियों में रहने वाला अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) एक बार फिर से खबरों में है, वजह साफ है, रमजान और गैर-मुसलमान पर प्रभाव.

तमाम अच्छे बुरे विचारों से सामना होने के बाद शायद मुझे भी कुछ अपनी राय देनी चाहिए क्योंकि मैंने भी अपनी जिंदगी के कुछ बेहद खूबसरत अरसे वहां बिताए हैं और मैं इसके लिए ईश्वर का शुक्रगुजार हूं.

विषय बहुत सीधा और सरल है, क्या गैर-मुसलमानों को रमजान के महीने में सुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना मिलता है और मेरा जवाब उस से भी उतना ही सीधा है की 'नहीं'. मैं अपनी जिंदगी के कुछ साल पीछे जाना चाहूंगा, लगभग दस साल.

यूनिवर्सिटी में जबरन 20 फीसदी छात्रों को भूखा रखा जाता था

मैंने 2007 में अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के सबसे सम्मानित कोर्स इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया. यह मेरे लिए किसी सपने के सच होने जैसा था क्योंकि मैं एक बेहद गरीब परिवार से आता हूं, साल की एक लाख फीस देना हमारे लिए दूर की कौड़ी थी. शुरू में हॉस्टल नहीं मिला, थोड़ी परेशानी हुई लेकिन बाद में मिल गया.

सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था फिर आया महीना रमजान का. मेरी लिए ये पहला अनुभव था और मैं इस बात से बिलकुल अंजान था की क्या होने वाला है. सुबह जब मेरी आंख खुली तो मुझे अपने कमरे में एक प्लेट सेवई, 4 ब्रैड के टुकड़े और मक्खन का एक टुकड़ा मिला.

मुझे थोड़ा अजीब सा लगा फिर पता करने पर पता चला की यही नाश्ता है और दोपहर का खाना भी नहीं मिलेगा. मैं जिस हॉस्टल में रहता था उसका नाम है ‘नदीम तरीन हॉल’ शायद सबसे ज्यादा या फिर दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा हिंदू बच्चे इसी हॉस्टल में रहते हैं. एक मोटे अंदाज में पूरे 300 छात्रों की संख्या में से कम से कम 60 हिंदू या गैर मुस्लिम छात्र थे.

मेरे लिए ये एक बहुत बड़ी समस्या थी कि अब मैं क्या करूं, कोई रास्ता नहीं था. मैंने कुछ सीनियर लोगों से बात की कि ये तो गलत बात है, हमने पैसा नाश्ते और दो वक्त के खाने के लिए दिया है तो हमे इस तरह क्यों भूखा रखा जा रहा है.

उनके जवाब और भी ज्यादा चौंकाने वाले थे. उन्होंने कहा की रोजे के समय खाने की खुशबू से रोजा मकरू (अपवित्र) हो जाता है (इफ्तार के समय ऐसा नहीं होता). मैंने अधिकारियों से भी बात की पर परिणाम शून्य ही रहा. किसी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था की लगभग 20 फीसदी छात्रों को जबरन भूखा रखा जा रहा है.

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शायद ये मानवाधिकार के हनन का मामला था लेकिन कोई भी किसी भी तरह की सहायता के लिए आगे नहीं आया. मुझे लगा की अगर ये सिर्फ मेरे हॉस्टल की समस्या है तो मैं एक महीने किसी और छात्रावास में खाना खा लूंगा लेकिन हमारा हॉस्टल ही नहीं बल्कि पूरे विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ यही समस्या थी. हमारे पास कोई विकल्प नहीं था.

मुस्लिम आबादी होने के कारण तमाम खाने के होटल और दुकानें या तो बंद रहती थी या आसपास केवल बिरयानी या ऐसे मांसाहारी खाने ही मिल पाते थे. इसलिए हम बाहर से भी कुछ खरीद कर नहीं खा सकते थे. या तो हम बहुत सारा पैसा खर्च कर के शहर जाकर खाना खाएं, जो उस समय मेरे पास होता नहीं था, या फिर भूखे रहें और मैं मजबूरी में दूसरा विकल्प अपनाता था.

ना चाहते हुए भी मुझे भूखा रहना पड़ता था. हम में और बाकी रोजेदारों में सिर्फ इतना फर्क था कि वो पूरा दिन बिना पानी पिए रोजा रखते थे और हम पानी पीकर रोजा रखते थे. इस बीच कोई भी हमारे साथ नहीं आया. वो लोग जो इस देश कि तमाम समस्याओं कि बात करते थे, सांप्रदायिक सौहार्द की बात करते थे वो अपने ही साथ के गैर मुसलमानों पर अत्याचार कर रहे थे.

भूख के कारण चलना मुश्किल हो गया था

हम मजबूर थे, एक तरह से हमारे साथ धोखा हुआ था, पैसा हमने नाश्ता और दोपहर के खाने का दिया था लेकिन उसे सिर्फ नाश्ते (सहरी वाले, जो की भोर से पहले ही लग जाता था) और रात के खाने तक ही समेट लिया गया था. ये क्रम लगातार चलता रहा और हमारे खाने का कोई भी इंतजाम नहीं किया गया, कई बार तो भूख के कारण चलना मुश्किल हो जाता था.

समय बदल गया है और आज लोग सोशल मीडिया पर ज्यादा मुखर हो चुके हैं. प्रशासनिक बदलाव हुए हैं शायद अब कुछ परिवर्तन हो. कम से कम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यकों का ख्याल रखने के बारे में सोचें जिससे जब वे वहां से बाहर निकलें तो देश के अल्पसंख्यकों का ख्याल रखने के बारे में भी सोच सकें. 468 एकड़ का यह कैंपस एक एहसास है. एहसास है इस बात का कि अगर इस देश में मुसलमान बहुसंख्यक होते तो अल्पसंख्यकों का किस तरह से ख्याल रखते.

मैं खुद को बहुत खुशकिस्मत मानता हूं कि मैं अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में पढ़ा. मैंने वहां खुद को सीखा, खुद को पहचाना लेकिन एक बात है जो टीस बन कर चुभती है, उम्मीद है कि वो टीस अब टीस नहीं रहेगी.

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