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तिब्बत पर चेतावनीः डिप्लोमेसी का बैकस्टेज ओपेरा

डोकलाम के बाद से ही संबंधों को सामान्य करने की ओर काम हो रहा था. लेकिन तिब्बत इतना संवेदनशील मुद्दा था कि उस पर बगैर काम किए आगे बढ़ना मुश्किल था

Updated On: Apr 26, 2018 08:53 AM IST

Alpyu Singh

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तिब्बत पर चेतावनीः डिप्लोमेसी का बैकस्टेज ओपेरा
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बात पिछले साल अक्टूबर की है. कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के यूनाइटेड फ्रंट डिपार्टमेंट के कार्यकारी उपाध्यक्ष झांग यीजियोंग ने दुनिया के नाम एक चेतावनी जारी की. चेतावनी में दलाई लामा से मुलाकात को अपराध घोषित किया गया. इस चेतावनी में भारत का जिक्र था, लेकिन बगैर नाम लिए ही. भाषण में ये भी कहा गया कि किसी देश का अफसर अगर दलाई लामा से मुलाकात करता है तो एक तरह से अपने देश का ही प्रतिनिधित्व कर रहा होता है. खास बात ये कि ये चेतावनी वर्ल्ड लीडर्स की ओर मुखातिब थी.

ठीक 4 महीने बाद 22 फरवरी को विदेश सचिव विजय गोखले एक एडवाइज़री जारी करते हैं, इस एडवाइजरी में सरकारी अफसरों को तिब्बत से जुड़े कार्यक्रमों से दूर रहने को कहा जाता है. उसके बाद की सारी कहानी सबके सामने है. एडवाइजरी जारी करने के अगले ही दिन विजय गोखले दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत के दौर को आगे बढ़ाने के लिए बिजिंग रवाना हो जाते हैं.

धमकी और एडवाइजरी के बीच की कहानी कूटनीति के जरिए समझनी होगी. चार महीने पहले की चेतावनी और उसके बाद की कूटनीति आपस में गुथी हुई हैं. डोकलाम के बाद से ही संबंधों को सामान्य करने की ओर काम हो रहा था. लेकिन तिब्बत इतना संवेदनशील मुद्दा था कि उस पर बगैर काम किए आगे बढ़ना मुश्किल था.

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हमेशा की तरह एक बार फिर कड़ी आपत्ति दर्ज करा चुका है चीन 

तिब्बत के मुद्दे पर चीन की तल्खी भारत सरकार को पिछले साल अप्रैल के महीने में ही महसूस हो गई थी, जब दलाई लामा के अरुणाचल दौरे पर चीन ने आंखें तरेरी थी. चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने भारतीय राजदूत को कड़ा समन भेज कहा था 'इस यात्रा का भारत और चीन के संबंधों पर जरुर असर पड़ेगा. इससे भारत को कोई फायदा होने वाला नहीं है.'

इसलिए अब जबकि मोदी और शी जिनपिंग के बीच अनौपचारिक बातचीत को लेकर दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों में हलचल है, तो मीडिया में छपी इस बात को लेकर भरोसा होता है कि एडवाइजरी को लेकर भारत सरकार की ओर से चीन को डिप्लोमैटिक चैनल्स के जरिए सबसे पहले बताया गया. बाद में यहां एडवाइजरी सर्कुलेट हुई.

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पत्रकार और Dalai Lama :The Soldier of peace किताब लिखने वाले विजय क्रांति इसे कूटनीति की नासमझी मान रहे हैं . वो कहते हैं 'अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर की वजह से शी जिनपिंग दबाव में हैं. जिस बैठक को चीन के खुले दिल का कदम बताया जा रहा है, दरअसल फिलहाल ये शी जिनपिंग की मजबूरी है. ट्रेड वॉर के चलते विश्व समुदाय में अलग थलग पड़ने की आशंका है. ऐसे में ये सहज कदम नहीं लगता. इसके पीछे कूटनीतिक रणनीति है. जिसे भारत को समझना होगा और दलाई लामा जैसे ट्रम्प कार्ड की अहमियत समझनी होगी जरुरी ये है कि तिब्बत को लेकर चीन के ऐेसे दबाव में आने की जरुरत नहीं है.'

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डोकलाम के बाद दोनों देशों के बीच जारी है बातचीत का सिलसिला 

दरअसल डोकलाम के बाद से दोनों देशों के बीच जो बातचीत का सिलसिला शुरु हुआ, वो अभी तक जारी है. माना जा रहा है दोनों देशों के बीच बातचीत का ऐसा प्रवाह अब तक कम ही देखने को मिला है.

बातचीत का ये सिलसिला विदेश सचिव विजय गोखले की चीन यात्रा से शुरू हुआ था उसके बाद यानी पिछले एक महीने में भारत और चीन के बीच सात उच्चस्तरीय वार्ताएं हो चुकी है. उसके बाद से ही बैकस्टेज डिप्लोमेसी के जरिए तिब्बत को लेकर चीन को समझाने की रणनीति बनाई गई.

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ये सितंबर 2014 के उस फैसले से एकदम हटके है, जिसमें शी जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान तिब्बत प्रदर्शनकारियों को सरकार ने प्रदर्शन की आजादी दी थी और वो भी तब जबकि 1990 से सरकार ऐसे प्रदर्शनों को बैन ही करती आई है.

इसीलिए न तो मार्च के आखिरी महीने में तिब्बतियों के थैंक्यू कार्यक्रम का दिल्ली के बजाय धर्मशाला शिफ्ट होना इत्तेफाक था और न ही इंडियन साइंस कांग्रेस से दलाई लामा का खुद ही हट जाना. इससे पहले तिब्बतियों के भारत आने के 50 साल पूरा होने पर भी ऐसी एडवाइजरी दी गई थी, लेकिन अब की बात अलग है.

हालांकि विदेश मामलों के जानकार सुशांत सरीन कहते हैं कि 'तिब्बत को लेकर हमारी नीति में कोई बदलाव नहीं है. दलाई लामा से दूरी बनाना, और ऐसा करते चीन को दिखाना, दरअसल कॉन्फिडेंस बिल्डिंग का ही एक तरीका है. इस बात में कोई शक नहीं है कि चीन भी संबंध सामान्य करने को लेकर उतना ही उत्सुक है, जितने हम. वरना चीन ऐसे आगे न बढ़ता.'

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भारत सरकार पर तिब्बत कार्ड खेलने का लग रहा आरोप  

पिछले साठ सालों से भारत में रह रहे 94,000 तिब्बती शरणार्थियों को खुलकर अपनी बात कहने की आजादी मिलती रही है. लेकिन अभी वो थोड़ा अलग महसूस कर रहे हैं. भारत में रह रहे दूसरे तिब्बतियों की ही तरह तिब्बत मूवमेंट से जुड़े रहे लेखक और कार्यकर्ता तेंजिन सुंडू भारत सरकार के रवैये से निराश हैं.

वो कहते हैं कि दलाई लामा से ऐसे दूरी बनाकर सरकार ने अच्छा संदेश नहीं दिया है. ठीक है ये पॉलिसी शिफ्ट नही है, लेकिन दलाई लामा कोई राजनीतिक व्यक्ति तो है नहीं. ऐसे में सरकार जिस तरह से कूटनीति में उनका इस्तेमाल कर रही है, उससे साफ लगता है कि वो तिब्बत कार्ड खेल रही है.

जानकार मानते हैं कि तिब्बत पर चीन से बात करने से रणनीतिक भाषा को खूब ठोंक बजाकर चीन के सामने रखना होगा. उनके जहन में 2003 का वो वाक्या है जब वाजपेयी ने तिब्बत को लेकर - 'मान्यता ' शब्द का इस्तेमाल कर ब्लंडर कर दिया था.

इस गलती का खामियाजा तीन साल बाद भुगतना पड़ा जब चीन, अरुणाचल को साउथ तिब्बत कह अपनी हरकतों को सही ठहराने लगा. जाहिर है जिस दलाई लामा की तस्वीर रखना तिब्बत में अपराध है. उनसे दूरी बनाकर जो फीलर्स भारत ने चीन को दिए हैं, उनमें तिब्बत को शामिल करने से पहले सोचना होगा, क्योंकि समस्याएं मैकमोहन सीमा को लेकर भी हैं.

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