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बिहार: शराबबंदी कानून बना टीबी के मरीजों के लिए मुसीबत!

शराबबंदी कानून की वजह से टीबी टेस्ट के लिए लैब्स को जरूरी मिथेलिएटेड स्प्रिट और एथेनॉल नहीं मिल पा रहा है

FP Staff Updated On: Aug 07, 2017 03:32 PM IST

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बिहार: शराबबंदी कानून बना टीबी के मरीजों के लिए मुसीबत!

बिहार में अप्रैल, 2016 से शराबंदी लागू है. लेकिन अब इस बैन के लगभग डेढ़ साल बाद यहां शराब की कमी से एक नई समस्या पैदा हो गई है. बिहार में टीबी जैसी खतरनाक बीमारी की टेस्ट के लिए जो जरूरी चीजें चाहिए होती हैं, शराबबंदी की वजह से उनकी कमी हो गई है. शराबबंदी कानून की वजह से टीबी टेस्ट के लिए बनी लैब्स में मिथेलिएटेड स्प्रिट और एथेनॉल जैसी चीजें नहीं मिल पा रही हैं.

लैब्स अभी तक टीबी टेस्ट के लिए ओपन मार्केट से किसी तरह से सामान खरीद रही थीं. लेकिन बीते फरवरी महीने में लैब्स को बताया गया था कि जब तक कोई और विकल्प नहीं मिल जाता है उन्हें इंजेक्टा का इस्तेमाल करना है. इंजेक्टा एक तरह का मिथेलिएटेड स्प्रिट होता है. अधिकारियों ने माना है कि इंजेक्टा से आने वाले आंकड़ों में लगभग 40 फीसदी आंकड़े सही नहीं होते हैं.

सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अब इस मामले को संज्ञान लिया है. बिहार में अक्टूबर 2016 में प्रॉहिबिशन एंड एक्साइज एक्ट पास हुआ था. इस कानून के बाद राज्य में हर प्रकार के एल्कोहल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. जिसमें मिथेलिएटेड स्प्रिट और एथेनॉल भी शामिल होते हैं. इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर मेडिकल टेस्ट के लिए सभी लैब्स में होता है.

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अप्रैल 2016 से नीतीश सरकार ने बिहार में शराबबंदी लागू कर रखा है

बिहार में इस समय 732 माइक्रोस्कोपी लैब्स और 60 माइक्रोस्कोपी लैब्स हैं जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं है. इसके अलावा पटना में टीबी के टेस्ट के लिए एक रेफ्रेंस लाइब्रेरी है.

सभी लैब्स को साल भर में टीबी का टेस्ट करने के लिए लगभग 2000 लीटर मिथेलिएटेड स्प्रिट और तकरीबन इतने ही एथेनॉल की जरूरत होती है. अधिकारियों के मुताबिक लैब्स में एथेनॉल का स्टॉक था लेकिन जब कानून बना तो यह स्टॉक सिर्फ चार से छह महीने तक के लिए ही था.

शराबबंदी के बाद टीबी टेस्ट की संख्या में कोई कमी नहीं आई है, फिर भी राज्य के इस बीमारी की पड़ताल करने वाले सभी अधिकारियों ने अलर्ट जारी कर दिया है. बिहार में 2016 में टीबी के 64,178 मामले सामने आए थे. 2013 में 64,937 जबकि 2014 तक इसके 68,145 मामले दर्ज हुए थे. मुजफ्फरनगर, गया, पटना, दरभंगा और सारण जिले में सबसे ज्यादा मामले सामने आए थे.

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