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एक ही सिक्के के दो पहलू हैं: आईएसआई और अलकायदा

आईएसआई और अल कायदा दोनों एक साथ मिलकर काम करते हैं.

Updated On: Nov 21, 2016 02:46 PM IST

Tufail Ahmad Tufail Ahmad

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एक ही सिक्के के दो पहलू हैं: आईएसआई और अलकायदा

उरी हमले के सिर्फ चार दिन बाद 22 सितंबर को भारतीय उपमहाद्वीप में अल कायदा की शाखा एक्यूआईएस ने एक बयान जारी किया और पाकिस्तान, उसकी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई पर कश्मीरियों से विश्वासघात करने का आरोप लगाया.

एक्यूआईएस के प्रवक्ता उस्ताद उसामा महमूद द्वारा जारी बयान में कहा गया- ‘इतिहास गवाह है कि पाकिस्तानी सेना की निगरानी और उसके सहयोग से लड़ना जिहाद के फायदों को बर्बाद करने के बराबर है और इससे दमित कश्मीरियों के साथ नाइंसाफी और बढ़ रही है.’

इससे पहले मध्य जुलाई में, एक्यूआईएस ने एक बयान में कश्मीरियों से हिज्बुल कमांडर बुहरान वानी के नक्शेकदम पर चलने को कहा, जिसे सुरक्षा बलों ने मार गिराया था.

पाकिस्तान से जारी होने वाले जिहादी गुटों के बयानों के बारे में कुछ बातें बिल्कुल साफ हैं: पहली, पाकिस्तानी सेना की इंटर-सर्विस इंटेलीजेंस (आईएसआई) कई साल तक अफगान तालिबान के नेता मुल्ला उमर के नाम से बयान जारी करती रही, जबकि उसकी मौत 2003 में हो गई थी. पिछले साल 29 जुलाई को अफगान सरकार ने इस रहस्य को उजागर किया.

दूसरी बात, उर्दू के 32 पेज वाले जिस दस्तावेज को इस्लामिक स्टेट का बताया जा रहा था, वह पाकिस्तान में ही पिछले साल एक अमेरिकी पत्रकार को दिया गया था. इसमें भारत पर आखिरी लड़ाई जैसे आतंकी हमले की धमकी दी गई है. इस बात के पक्के सबूत हैं कि यह बयान आईएसआई ने लिखा था. इसे इस्लामिक स्टेट ने जारी नहीं किया था.

Afghanistan

पाकिस्तानी पोषित है अल कायदा

ज्यादातर विश्लेषकों को यह बात हजम नहीं होती है कि अल कायदा का नेतृत्व भले ही अरब आतंकवादी करते हों लेकिन बुनियादी तौर पर यह एक पाकिस्तानी संगठन है, आईएसआई की एक शाखा है. इसकी स्थापना 1988 में पेशावर में हुई थी.

यह एक अहम साल था, जब सोवियत सैनिक अफगानिस्तान में हार गए थे. आईएसआई ने इस दौरान अमेरिकी हथियारों और सऊदी धन की मदद से जिहादी गुटों को संचालित किया, जिससे उन्हें इस लड़ाई में जीत मिली.

आईएसआई ने सोचा कि जब उसने उस वक्त की एक बड़ी ताकत सोवियत को हरा दिया, तब वह कश्मीर में ऐसा कर सकते हैं. आईएसआई ने कश्मीर के लिए भी ऐसी ही योजना तैयार की.

यह संभव नहीं कि पेशावर में अल कायदा का गठन, आईएसआई की बिना जानकारी और समर्थन के हो गया.

पाकिस्तान से ही अल कायदा मध्य पूर्व तक फैला. पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन से लेकर अयमान अल जवाहिरी जैसे अल कायदा के सर्वोच्च नेताओं को ठीक वैसे ही सुरक्षा दी गई जैसे आईएसआई मुल्ला उमर को देती थी और आज भी तालिबान के मौजूदा नेता हैबतुल्लाह अखुंजादा, जैश ए मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर, जमात उद दावा प्रमुख हाफिज सईद और सैयद सलाहुद्दीन को दी जा रही है.

सैयद सलाहुद्दीन खुद को हिज्बुल मुजाहिदीन का कमांडर कहता है, लेकिन मुजफ्फराबाद में पाकिस्तान अधिकारियों के सामने चपरासी की तरह रहता है. आईएसआई और अल कायदा दोनों ही इस्लामी खिलाफत की स्थापना के लिए एक ही जैसी जिहादी विचारधारा पर चल रहे हैं.

बस फर्क यह है कि आईएसआई ऐसी किसी अंतरराष्ट्रीय खिलाफत का प्रमुख पाकिस्तान को बनाना चाहती है.

कश्मीर है अहम मुद्दा

आईएसआई और अल कायदा दोनों एक साथ मिलकर काम करते हैं. इसकी पूरी संभावना है कि 22 सितंबर को एक्यूआईएस ने कश्मीर में अशांति की तरफ ध्यान खींचने के लिए यह बयान जारी किया है.इसमें पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश के मुसलमानों से यह अपील किया गया है कि वह कश्मीरी मुसलमानों का साथ दें.

इसके मुताबिक, “उपमहाद्वीप में दमनकारी बुतपरस्त सिस्टम को खत्म करने की जिम्मेदारी हमारे ही ऊपर है.” कश्मीर अल कायदा और आईएसआई दोनों के लिए एक वैचारिक युद्ध है.

हाल के सालों में अल कायदा में बहुत वैचारिक उथल पुथल रही है और भारत से लोगों को भर्ती करने में भी उसके हाथ निराशा लगी. लेकिन उसका संदेश भारत के लगभग दो दर्जन लोगों तक पहुंच गया जो इसमें शामिल हो गए इस्लामिक स्टेट की तरफ से लड़ने के लिए सीरिया चले गए हैं.

11 सितंबर के हमले के बाद से ही पाकिस्तान के सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ ने अमेरियों को खुश करने नीति अपनाई और इसके लिए उन्होंने जिहादियों को ‘कुर्बान’ किया.

इन्हें मारा गया या फिर गिरफ्तार करके अमेरिका को सौंपा गया. जब भी मुशर्रफ जॉर्ज बुश से मिलने वॉशिंगटन जाते थे तो फर्जी ऑपरेशन में कुछ जिहादी लड़ाके पकड़े जाते थे और उन्हें अमेरिका को सौंप दिया जाता था.

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पाकिस्तानी जिहादी गुट हताश

हाल के सालों में पाकिस्तान स्थित जिहादी गुटों में तीन वजहों से हताशा पैदा हुई है.

पहला, अल कायदा ने 2010 के आस-पास मुसलमानों के साथ पाकिस्तानी सेना के साथ संबंधों की समीक्षा शुरू कर दी. इसकी वजह बनी सरहदी इलाकों में पाकिस्तानी सेना के अभियानों में अरब लड़ाकों की होने वाली मौतें.

मुसलमानों के साथ पाकिस्तानी सेना के संबंधों की समीक्षा के तहत अल कायदा ने दक्षिण एशिया के इतिहास की जिहादी नजरिए से व्याख्या की. अल कायदा के बयानों और वीडियो में पिछली तीन सदियों के दौरान मुसमलानों के साथ पाकिस्तानी सेना के ऐतिहासिक संबंधों पर सवाल उठाया गया.

इसकी शुरुआत 1757 में प्लासी के युद्ध से होती है जो 1947 में पाकिस्तान बनने से भी 190 साल पहले हुआ था. अल कायदा के वीडियो में कहा गया है कि पाकिस्तानी सेना- मतलब ब्रिटिश भारतीय सेना के मुसलमान सैनिकों ने 1947 के पहले और उसके बाद भी मुसलमानों को मारा.

अल कायदा की दलील है कि मुसलमान/ पाकिस्तानी सैनिक 1757 में प्लासी की लडाई में, 1857 में दिल्ली में, दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इराक और फिलिस्तीन में, 1971 में ढाका में, 1970 के ब्लैक सितंबर में जिया उल हक के नेतृत्व में जॉर्डन में, 11 सितंबर के हमले के बाद पाकिस्तानी के कबायली इलाकों और इसी तरह और भी कई घटनाओं में मुसलमानों को मारने में शामिल रही हैं.

दूसरा, तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान का दो फाड़ होना. उसके कुछ नेता पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के हाथों में खेलने लगे. इसमें हाफिज गुल बहादुर और अस्मतुल्लाह मुआविया के नाम शामिल हैं.

तीसरा, जैश ए मोहम्मद और आईएसआई की अन्य शाखाओं में वैचारिक उथलपुथल हुई, खासकर 2007 में इस्लामाबाद की लाल मस्जिद पर पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई के बाद. जैश ए मोहम्मद का प्रमुख मौलाना मसूद अजहर पाकिस्तान का वफादार बना रहा, हालांकि उसकी अपनी कुछ चिंताएं थीं.

लेकिन उसके नंबर दो शम्स कश्मीरी ने इस मुद्दे पर संगठन को दोफाड़ कर दिया. वैचारिक दूरी इसलिए भी बढ़ी क्योंकि पाकिस्तान की जेलों में अल कायदा और तालिबान के लड़ाकों का उत्पीड़न हुआ.

आईएसआई एक आतंकी संगठन

इस संदर्भ में, आईएसआई को लगा कि पाकिस्तानी सेना के कमांडरों ने उससे धोखा किया है. उसके कुछ सैनिकों ने जनरल मुशर्रफ पर जानलेवा हमले किए थे. लेकिन आईएसआई सेना का हिस्सा बनी रही.

ठीक उसी तरह जिहादी समूह भी आईएसआई के साथ काम करते रहे. अमेरिकी जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ के चेयरमैन एडमिरल माइक मुलैन ने सितंबर 2011 में अमेरिकी कांग्रेस में दिए गए अपने बयान में कहा था कि अफगान तालिबान का प्रमुख धड़ा हक्कानी नेटवर्क ‘पाकिस्तानी इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस की अहम बाजू है.’

इसके अलावा अमेरिकी अधिकारियों ने आईएसआई को एक आतंकवादी संगठन के तौर पर वर्गीकृत किया था.

विकीलीक्स की तरफ से अप्रैल 2011 में जारी अमेरिकी गोपनीय दस्तावेजों के मुताबिक अमेरिका ने आईएसआई को 32 ‘उग्रवादी बलों या संगठनों’ में से एक बताया था, जिसके अल कायदा के साथ रिश्ते हैं और दोनों एक दूसरे का साथ देते हैं और साझा लक्ष्य के लिए काम करते हैं.

आईएसआई और जिहादी गुट मिल कर पाकिस्तान के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए काम कर रहे हैं. आईएसआई एक जिहादी संगठन है जो एक वैश्विक वैचारिक सोच रखता है.

आईएसआई पाकिस्तानी सेना का हिस्सा है लेकिन वो खुद को इस्लामी उम्मा का रखवाला समझती है. आईएसआई मदीना-ए-सानी (दूसरे मदीना) के तौर पर पाकिस्तान के वैचारिक सीमाओं की रक्षा में जुटी है. इस्लामी राज्य के पहले मदीने की स्थापना पैगंबर मोहम्मद ने सऊदी शहर मदीना में की थी.

Mujahid

कश्मीर की समस्या को हिंदू-मुस्लिम रंग देने की कोशिश

एक्यूआईएस ने 22 सितंबर को अपने बयान में कहा, “कश्मीर समस्या सिर्फ कश्मीर के मुसलमानों की समस्या नहीं है. यह सिर्फ भारत और पाकिस्तान के मुसलमानों की ही नहीं, बल्कि दुनिया के सारे 1.5 अरब मुसलमानों की पूरी उम्मा की समस्या है. इस समस्या का आधार मजहब है. यह विवाद हिंदू और मुस्लिम के बीच है.’

एक्यूआईएस का यह बयान हिंदू-मुस्लिम के दो राष्ट्र होने के विचार पर आधारित है. यह विचार ही पाकिस्तान के जन्म का कारण है और पाकिस्तानी सोच का मूल आधार है.

फिर 22 सितंबर के एक्यूआईएस के बयान में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों पर कश्मीरियों से विश्वासघात करने का आरोप क्यों लगाया गया है. जबकि अल कायदा कश्मीर में आईएसआई के हितों को साध रहा है. वह भी तब, जब यह माना जा रहा है कि कश्मीर में आईएसआई ने पूरे इंतेफादा (संघर्ष) की योजना बनाई गई है, उसके लिए धन दिया जा रहा है और उस पर अमल हो रहा है.

फिलहाल तो ऐसा लगता है कि 22 सितंबर के बयान में एक्यूआईएस ने अपने मूल संगठन आईएसआई के बचाव की कोशिश की है ताकि यह यकीन दिलाया जा सके कि कश्मीर के हालात में उसकी कोई भूमिका नही है. हालांकि मध्य पूर्व में अल कायदा की कुछ शाखाएं एक हद तक स्वतंत्र ढंग से काम कर रही हैं.

लेकिन भारतीय सुरक्षा विश्लेषकों को इस जाल में नहीं फंसना चाहिए कि एक्यूआईएस और आईएसआई दो अलग अलग संगठन हैं.

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