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भारत के 58 करोड़ लोगों के इलाकों में नहीं होती है वायु प्रदूषण की जांच

ग्रीनपीस इंडिया की रिपोर्ट में 280 शहरों के एक साल में पीएम10 के औसत स्तर का विश्लेषण किया गया है

Updated On: Jan 29, 2018 10:37 PM IST

Anand Dutta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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भारत के 58 करोड़ लोगों के इलाकों में नहीं होती है वायु प्रदूषण की जांच

वायु प्रदूषण को लेकर संसद से सड़क तक चिंता जाहिर की जा रही है. लेकिन केवल चिंता ही, उससे बचाव को किसी तरह का इंतजाम नहीं किया जा रहा. हाल यह है कि देशभर के लगभग 58 करोड़ लोगों के इलाकों में हवा के प्रदूषण की निगरानी ही नहीं हो रही है. यानी 58 प्रतिशत आबादी के इलाकों में वायु प्रदूषण मापने का कोई इंतजाम ही नहीं है. इन्हें पता ही नहीं कि ये किस तरह की हवा में सांस ले रहे हैं.

यह बात सामने आई है वायु प्रदूषण पर काम कर रही प्रमुख संस्था ग्रीनपीस इंडिया के दूसरे वार्षिक रिपोर्ट में. संस्था की ओर से सोमवार को वार्षिक रिपोर्ट ‘एयरपोक्लिप्स’ का दूसरा संस्करण जारी किया गया.

रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में लगभग 4 करोड़ 70 बच्चे इससे बुरी तरह प्रभावित हैं. ये बच्चे पांच साल से कम उम्र के हैं. इसमें 1 करोड़ 70 लाख वे बच्चे भी शामिल हैं जो कि मानक से दोगुने पीएम10 स्तर वाले क्षेत्र में रहते हैं.

इस रिपोर्ट में 280 शहरों के एक साल में पीएम10 के औसत स्तर का विश्लेषण किया गया है. इन शहरों में देश की 63 करोड़ आबादी (करीब 53 प्रतिशत जनसंख्या) रहती है. बाकी 47 प्रतिशत (58 करोड़) आबादी ऐसे क्षेत्र में रहती है जहां की वायु गुणवत्ता के आंकड़े उपलब्ध ही नहीं हैं.

सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में दिल्ली के यूपी है शामिल 

इन 63 करोड़ में से 55 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्र में रहते हैं जहां पीएम10 का स्तर राष्ट्रीय मानक से कहीं अधिक है. वहीं इसमें से 18 करोड़ लोग केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के की ओर से तय सीमा 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से दोगुने ज्यादा प्रदूषण स्तर वाले इलाके में रहते हैं.

air pollution (2)

सबसे ज्यादा बच्चे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली में वायु प्रदूषण से प्रभावित हैं. इन राज्यों में लगभग 1 करोड़ 29 लाख बच्चे रह रहे हैं जो पांच साल से कम उम्र के हैं और प्रदूषित हवा की चपेट में हैं.

ग्रीनपीस के सीनियर कैंपेनर सुनील दहिया कहते हैं, 'भारत में कुल जनसंख्या के सिर्फ 16 प्रतिशत लोगों को वायु गुणवत्ता का रियल टाइम (उसी समय) आंकड़ा उपलब्ध है. यह दिखाता है कि हम वायु प्रदूषण जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए कितने असंवेदनशील हैं. यहां तक कि जिन 300 शहरों में वायु गुणवत्ता के आंकड़े मैन्यूअल रूप से एकत्र किए जाते हैं वहां भी आम जनता को वह आसानी से उपलब्ध नहीं है.'

अगर औसत पीएम 10 स्तर के आधार पर रैंकिग को देखें तो पता चलता है कि साल 2016 में दिल्ली 290 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर के साथ शीर्ष पर बना हुआ है. वहीं फरीदाबाद, भिवाड़ी, पटना क्रमशः272, 262 और 261 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर के साथ दिल्ली से थोड़ा ही पीछे हैं.

कोल बेल्ट में नहीं लगा है मशीन, निजी कंपनियां साझा नहीं करती हैं डेटा 

रिपोर्ट में यह सामने आया कि इनमें से एक भी शहर विश्व स्वास्थ्य संगठन के वायु गुणवत्ता मानक (20 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर औसत) को पूरा नहीं करते. इतना ही नहीं 80 प्रतिशत भारतीय शहर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक (60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर औसत) को भी पूरा नहीं करते.

air pollution (1)

पर्यावरण मंत्रालय ने राज्य सभा में हाल ही में राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम बनाने की घोषणा की थी. इस कार्यक्रम को व्यापक, व्यवस्थागत और तय समय-सीमा के भीतर जिम्मेवारी तय करके ही सफल बनाया जा सकता है.

प्रदूषण के लिहाज से टॉप 25 शहरों की सूची में दिल्ली, फरीदाबाद, भिवाड़ी, पटना, देहरादून, वाराणसी, गाजियाबाद, मुजफ्फरपुर, हापुर, अमृतसर, झरिया, गुड़गांव, बरेली, फिरोजबादा, रांची, जयपुर, कानपुर, लखनऊ, आगरा, मुरादाबाद, नोएडा, इलाहाबाद, गजरौला, मथुरा,

सुनील दहिया के मुताबिक कोल बेल्ट में सरकार ने पॉल्यूशन जांच मशीन लगाई ही नहीं है. कुछ जगहों पर निजी कंपनियों ने मशीन लगाई है, लेकिन वह डाटा साझ नहीं करते हैं. इस समय देशभर के 303 शहरों में मात्र 690 स्टेशऩ हैं, जहां जांच होती है. रिपोर्ट सरकार की ओर से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है.

हालांकि इस रिपोर्ट में नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों, गोवा के कोल बेल्ट, थर्मल पावर वाले इलाकों को केंद्रित नहीं किया गया है. खुद ही समझा जा सकता है कि जो इलाके सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं, वहां जांच ही नहीं. जब जांच नहीं तो रिपोर्ट में जगह कहां से मिलेगी. ऐसे में सुनील का कहना है कि अगली बार ग्रीनपीस इंडिया कुछ इलाकों में अपने खर्च से मशीन लगाने जा रही है. साथ ही उसकी कोशिश होगी कि इन इलाकों को आनेवाले रिपोर्ट में शामिल किए जाएं. ताकि वास्तविक स्थिति का पता चल सके.

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