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दिल्ली में जहरीली हवा: सिर्फ फाइलों में न सिमट कर रह जाए सरकारी कोशिशें?

जानकारों का मानना है कि प्रदूषण घटाने के लिए सबसे जरूरी है ठोस ईंधन और प्राइवेट गाड़ियों का इस्तेमाल कम करना

Updated On: Dec 16, 2018 10:28 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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दिल्ली में जहरीली हवा: सिर्फ फाइलों में न सिमट कर रह जाए सरकारी कोशिशें?

दिल्ली-एनसीआर का हवा की गुणवत्ता में पिछले कई महीनों से कोई सुधार नजर नहीं आ रहा है. एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) खतरनाक स्तर पर आ गया है. सरकार और कोर्ट की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रदूषण कम नहीं हो रहा है. हैरानी की बात है कि केंद्र और प्रदूषण पर काम करने वाली तमाम एजेंसियों की कोशिशें नाकाम हो रही हैं.

पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने से दिल्ली की हवा प्रदूषित होती है. खाड़ी देशों से आने वाली धूल का भी इसमें बड़ा हाथ है. पिछले हफ्ते बारिश से थोड़ी राहत जरूर मिली लेकिन हालात फिर पहले जैसे हो गए. बीते कुछ दिनों से मौसम का पारा गिरने से हवा में नमी बढ़ी है. नमी बढ़ने से प्रदूषणकारक तत्व हवा में ऊपर नहीं जा पा रहे हैं. नतीजा एयर क्वालिटी का इंडेक्स फिर बढ़ने लगा है. एयर क्वालिटी इंडेक्स 100 से कम को सुरक्षित, 100-200 को ठीकठाक, 200-300 को खराब, 300-400 को बहुत खराब और 400 या उससे ऊपर को खतरनाक माना जाता है

दिल्ली में प्रदूषण घटाने की कोशिश में कई एजेंसियां लगी हुई हैं. लेकिन इसका नतीजा ना निकलता देख उनकी नींद उड़ गई है. इन हालात से निपटने के लिए केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने अलग-अलग विभागों की मीटिंग बुलाई थी. इस मीटिंग में इस बात पर नारजगी जताई गई थी कि दिल्ली में कूड़ा जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए MCD को जो ग्राउंड लेवल पर काम करना चाहिए वह नहीं किया गया. मंत्रालय के अधिकारियों ने MCD को साफ लहजे में कहा था कि दिल्ली के तीनों एमसीडी के अधिकारी किसी भी कीमत पर कूड़े जलाने पर पूरी तरह रोक लगाएं.

क्या कर रही हैं एजेंसियां

राजधानी में प्रदूषण नियत्रंण करने की कोशिश में गैरसरकारी और सीविक एजेंसियां भी लगी हैं. हालांकि जब इन संस्थाओं के काम का कोई असर नहीं दिखा तो लोगों में जागरूकता फैलाने की कोशिश हो रही है.

प्रदूषण की समस्या से कैसे निजात मिले? इस पर दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में 14 और 15 दिसंबर को एक सेमिनार आयोजित किया गया था. सेमिनार में देश-विदेश के पर्यावरणविद, जाने-माने डाक्टर्स और प्रदूषण पर काम करने वाली संस्थाएं EPCA, CPCB और कई सरकारी और गैरसरकारी एजेसियां शामिल हुई थीं.

POLLUTION

केंद्र सरकार के मंत्री डॉ महेश शर्मा ने कहा कि केंद्र सरकार की बजट में प्रदूषण को रोकथाम करने के लिए हजारों करोड़ रुपए का प्रवधान किया गया है. केंद्र सरकार कई तरह की पॉलिसी ले कर आई है, जिससे प्रदूषण को नियंत्रण करने में सहायता मिलेगी.

सेमिनार से क्या निकला नतीजा?

करीब 30 फीसदी प्रदूषण की वजह घरेलू ठोस ईंधन है. इसका सबसे बुरा असर गर्भवती महिलाओं पर होता है. दिल्ली सरकार के लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल (एलएनजेपी) के मेडिसीन विभाग के सीनियर डॉक्टर और सेंटर फॉर ऑक्यूपेशनल एंड एनवायरमेंटल हेल्थ विभाग के सदस्य सचिव प्रोफेसर डॉ एमके डागा ने फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से कहा, ‘देखिए पानी से होने वाले रोग के बाद सेहत के लिए सबसे खतरनाक प्रदूषण है. डॉक्टरों ने अपने स्तर से इस मुद्दे पर अमल और पहल शुरू कर दिया है.'

डॉ डागा आगे कहते हैं, ‘हमलोगों ने एक प्लान तैयार किया है. हमलोगों की कोशिश है कि सभी को स्वच्छ हवा मिलनी चाहिए. इसके लिए कोयला और बायोमास का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर देना चाहिए. खासतौर पर कोयले से चलने वाले थर्मल प्लांट कम करना चाहिए.'

डॉक्टर डागा

डॉक्टर डागा

डॉक्टर डागा ने कहा, अगर बात पराली की करें तो निश्चित तौर पर यह खतरनाक है लेकिन ज्यादा जरूरत है पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बेहतर बनाने की. 25 से 30 प्रतिशत प्रदूषण गाड़ियों की वजह से होते हैं, जिसमें सुधार की जरूरत है. उन्होंने कहा, 'WHO ने एयर पॉल्यूशन पर पहली बार कॉन्फ्रेंस आयोजित की है और अब हमें इसे आगे बढ़ाने की जरूरत है.'

भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा संचालित वायु गुणवत्ता एवं मौसम पूर्वानुमान प्रणाली (सफर) के मताबिक, ‘दिल्ली-एनसीआर में वायु की गुणवत्ता का स्तर लगातार गंभीर बनी हुई है. अगले कुछ दिनों तक भी इसी तरह के हालात बने रहने की संभावना बहुत ज्यादा है. अगले कुछ दिनों में तापमान में और गिरावट होने वाली है, जिससे वायु की गुणवत्ता और खराब हो सकती है.’

जरूरत सख्ती की

सरकार की तमाम कोशिशों और बढ़ते प्रदूषण के बावजूद कई योजनाएं लागू नहीं हो पाई हैं.

-साल 1997 में प्रदूषण को कंट्रोल करने के लिए केंद्र सरकार ने एक श्वेत पत्र जारी किया था. मगर इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी उस एक्शन प्लान पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

-पर्यावरणविदो के मुताबिक़ देश में मौजूद 1981 एअर पॉल्यूशन एक्ट की अब कोई सार्थकता नहीं है. 1981 के बाद वैज्ञानिक और मेडिकल साइंस के सबूत के आधार पर इस एक्ट को अपडेट करने की ज़रूरत है.

-राष्ट्रीय कार्ययोजना में पावर प्लांट के लिए तय उत्सर्जन मानकों का कठोरता से पालन अब तक नहीं किया जा सका है.

- हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में 15 साल से अधिक पुराने पेट्रोल वाहन और 10 साल से अधिक पुराने डीजल वाहनों को बैन करने का आदेश जारी किया था. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद दिल्ली परिवहन निगम ने भी लगभग 40 लाख पुरानी गाड़ियों की स्क्रैपिंग की प्रक्रिया अब तक शुरू नहीं की है.

कुल मिलाकर देखें तो प्रदूषण की सिर्फ एक वजह नहीं बल्कि कई कारण हैं. इसके लिए कोशिश भी चौतरफा करनी होगी. सरकार की कोशिशें तो बहुत नजर आती हैं पर हकीकत में जमीन पर कुछ नजर नहीं आता है. ऐसे में दिल्ली-एनसीआर वालों को फिर यह डर सताने लगी है कि सरकारी और गैरसरकारी कोशिशें फाइलों में ही ना रह जाएं.

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