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कर्नाटक के बेहाल किसान क्या एक बार फिर कांग्रेस पर भरोसा करेंगे?

कर्नाटक में कांग्रेस द्वारा सरकार बनाने के मुश्किल से छह महीने के बाद नवंबर 2013 में मानसून सत्र के दौरान बेलगावी में सुवर्ण विधान सौध के सामने एक गन्ना किसान ने आत्महत्या कर ली थी

Updated On: May 08, 2018 08:39 PM IST

Prince Singhal, Elizabeth Mani

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कर्नाटक के बेहाल किसान क्या एक बार फिर कांग्रेस पर भरोसा करेंगे?

मांड्या: कर्नाटक में कांग्रेस द्वारा सरकार बनाने के मुश्किल से छह महीने के बाद नवंबर 2013 में मानसून सत्र के दौरान बेलगावी में सुवर्ण विधान सौध के सामने एक गन्ना किसान ने आत्महत्या कर ली थी. वह अपनी उपज के लिए समय से और उचित कीमत की मांग कर रहा था. यह एक शुरुआती अपशकुन था.

अपने चुनावी घोषणापत्र में कांग्रेस ने कृषि को राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना देने का दावा किया था. इसने एक विस्तृत प्लान पेश किया था, जिसमें समय पर फर्टिलाइजर, कीटनाशक, बीज और दूसरे इनपुट की आपूर्ति; गन्ना, कॉफी, कॉटन और रेशम के लिए लागत के अनुरूप व प्रतिस्पर्धी मूल्य दिलाने, भंडारण सुविधा, बिजली, सिंचाई आधुनिक उपकरण खरीदने के लिए सब्सिडी और सबसे अंतिम बात- सूखा पड़ने पर मुआवजा देने का वादा किया गया था.

इन इतने सारे वायदों के बाद भी कर्नाटक में अप्रैल 2013 से नवंबर 2017 के दौरान कम से कम 3,515 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. राज्य कृषि विभाग के अनुसार इनमें से 70 फीसद आत्महत्याओं की वजह सूखा और फसल खराब हो जाना था. इसकी तुलना में इससे पहले के पांच साल के आंकड़े को देखें तो 1,077 किसानों ने आत्महत्या की थी.

तीन साल में मांड्या ने सबसे ज्यादा किसान गंवाए

बेंगलुरु स्थित इंस्टीट्यूट फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज (ISEC) की एक रिपोर्ट के अनुसार खराब मॉनसून के कारण फसल बर्बाद हो जाने, सिंचाई सुविधा और कीटनाशक की कमी फसली ऋण नहीं चुका पाने का प्रमुख कारण था. रिपोर्ट बताती है, 'सभी किसान परिवारों में कर्जदार किसान परिवारों का अनुपात सबसे ज्यादा तेलंगाना में 89% है, जबकि इसके ठीक अगले पायदान पर 77% के साथ कर्नाटक है.'

कर्नाटक के कृषि मंत्री कृष्णा बायरे गौड़ा कहते हैं, 'गंभीर सूखे के कारण आत्महत्याओं की संख्या बढ़ी. इसी कारण हमने कर्ज माफी और राहत के कई दूसरे कदम उठाए.' सरकार ने आत्महत्या के मामले में मुआवजे की राशि 1 लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपए कर दी है, जबकि किसान कह रहे हैं कि वह तो बेहतर सिंचाई सुविधा और उपज की अच्छी कीमत की मांग कर रहे हैं.

कावेरी नदी की घाटी में बसे मांड्या जिले में फसल की बर्बादी और कर्ज के बोझ के कारण किसानों द्वारा आत्महत्या की सबसे ज्यादा घटनाएं हुई हैं. मांड्या जिले के धांगुर गांव में रेशमकीट पालन करने वाले पुट्टास्वामी ने अपनी बीवी के जेवर गिरवी रखकर कर्ज लिया था. उनके भाई डोड्डास्वामी बताते हैं कि कर्ज नहीं लौटा सका, इसलिए उसने जहर पी लिया.

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नागराजू की मां देवम्मा

नागाराजू ने लगातार एक के बाद एक कई बार फसल बर्बाद हो जाने से परिवार के भारी कर्ज में डूब जाने के बाद नवंबर 2017 में आत्महत्या कर ली. उनकी मां देवम्मा शिकायत करती हैं, 'हमें सरकार से कोई मदद नहीं मिली. मैं अब इस उम्र में अपना पेट पालने के लिए दिहाड़ी मजदूरी करती हूं.'

बीदर में किसान यूनियन के पूर्व नेता देवानंद गायकवाड़ बताते हैं कि गन्ने की खेती फायदेमंद नहीं रह गई है, क्योंकि किसानों को अक्सर इसकी कीमत नहीं मिलती. किसानों के कर्ज में डूबने की एक बड़ी वजह फसल की सही कीमत नहीं मिलना है.

‘हमें पानी चाहिए, मुआवजा नहीं’

इस साल मार्च महीने में कर्नाटक कृषि मूल्य आयोग (KAPC) चेयरमैन टीएन प्रकाश कम्मारडी ने न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार द्वारा तय किए जाने को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने की सिफारिश की. वह बताते हैं कि सरकार ने हालांकि अधिकांश फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय किया, लेकिन ये कर्नाटक की मंडियों में, यहां तक कि कृषि उत्पाद मार्केटिंग कोऑपरेटिव द्वारा भी काफी कम कीमत पर खरीदी गईं.

किसानों के संगठन रैयत सेना के महासचिव शंकर अंबली का कहना है कि कर्नाटक कृषि मूल्य आयोग नाकारा है. वह बताते हैं, 'प्याज उत्पादक अपनी फसल बेचने के लिए जूझ रहे हैं. बीते पांच सालों में कई फसलें, जैसे मक्का, अरहर दाल, टमाटर और प्याज की कीमतों में भारी गिरावट आई है, जिससे किसानों की आमदनी पर गहरा असर पड़ा है.'

उत्तरी कर्नाटक में बेलागवी जिले, जहां आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा रही है, के किसान अप्पासाहेब देसाई कहते हैं, 'सरकार ने उपज के लिए ना तो कभी उचित बाजार मूल्य तय किया, ना ही हमें कोई मुआवजा दिया; इस तरह यह किसानों की आत्महत्या रोक पाने में नाकाम रही.'

अनकनहल्ली के किसान एएल शिवकुमार का कहना है कि उन्हें मुआवजा नहीं चाहिए, बल्कि रागी और धान की फसल के लिए पानी चाहिए. वह बताते हैं, 'पांच साल पहले, हमें इगलूर डैम से पानी मिलता था. हम रागी और धान उगाते थे. लेकिन नहर के टूट जाने के बाद से इस इलाके में पानी नहीं है, जिसके चलते यह बंजर जमीन बन चुका है.'

सूखे का मंडराता खतरा

कर्नाटक में खेती के तहत आने वाला करीब 72% हिस्सा मॉनसून पर निर्भर है, जिससे बारिश ना होने पर इसे सूखे का सामना करने का खतरा रहता है. सरकार के राज्य में सिंचाई नेटवर्क का विस्तार करने के वादे के बावजूद हकीकत में सिंचित क्षेत्र में कमी आई है. इस साल फरवरी में प्रकाशित कर्नाटक की आर्थिक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार साल 2011-12 में सिंचित क्षेत्र 34.40 लाख हेक्टेयर था, जबकि 2015-16 में यह घटकर 32.20 लाख हेक्टेयर रह गया.

ISEC में असिस्टेंट प्रोफेसर ए.वी. मंजुनाथ कहते हैं, 'किसान, खासकर चिक्काबल्लापुर में पानी के लिए 1,300 फुट की गहराई तक बोरवेल की खुदाई करते हैं, जिससे पानी की लागत बहुत ज्यादा बढ़ गई है.' कांग्रेस सरकार ने अपने 2013 के आर्थिक सर्वे में कर्नाटक में खेती में रुकावट पैदा करने वाली समस्याओं को सूचीबद्ध किया. इसमें मॉनसून पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता, खेतों का छोटे टुकड़ों में बंटना, मिट्टी की खराब होती सेहत, मार्केट की सूचना की कमी, टेक्नोलॉजी की कम सहभागिता. चार साल बाद इस साल फरवरी के सर्वे में इस सूची में सिर्फ यह और जोड़ दिया: सरकारी निवेश का निम्न स्तर, पर्यावरण का क्षरण, जलस्रोतों का अपर्याप्त उपयोग और उत्पादन की बढ़ती लागत.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

कृषि मंत्री बायरे गौड़ा स्वीकार करते हैं कि काफी कुछ किया जाना बाकी है, लेकिन वह साथ ही यह कहते हुए अपनी सरकार का बचाव करते हैं, 'हमने पांच साल स्थिर और विवाद-रहित सरकार दी. कर्नाटक की विकास दर 8.5% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 6.6% है.'

लेकिन राज्य के किसानों के लिए यह बहुत मामूली संतोष की बात है, जो कि इस विकास में अपना हिस्सा पाने के लिए लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं.

कर्नाटक राज्य रैयत संघ के राज्य सचिव मल्लिकार्जुन सत्यमपेट कहते हैं, 'बीते 10 सालों में राज्य के किसानों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है. हम उम्मीद करते हैं कि नई सरकार हमारे लिए कुछ करेगी.'

(Gangadhar S Patil के इनपुट के साथ)

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