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रेलवे के नए प्लान के बाद अब हर स्टेशन पर मिलेगा क्लोरीन युक्त पानी

नेशनल स्टेंडर्ड कोर्ड के मुताबिक होगी टोटल कॉलीफॉर्म और ई-कॉलीफॉर्म की जांच. 31 दिसंबर के बाद टैप वॉटर मजे से पी सकेंगे रेल यात्री

Updated On: Nov 04, 2018 12:12 PM IST

Pankaj Kumar Pankaj Kumar

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रेलवे के नए प्लान के बाद अब हर स्टेशन पर मिलेगा क्लोरीन युक्त पानी
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रेलवे अब अपने यात्रियों और कॉलोनी में रहने वाले लोगों को पूरी तरह क्लोरीन युक्त पानी मुहैया कराएगा. ऐसा रेलवे ने हाईकोर्ट में दायर एक याचिका के जवाब में अपने एफिडेविट में कहा है. रेलवे ने अपने एफिडेविट में यह साफ कर दिया है कि 31 दिसंबर तक सभी वाटर प्लांट पर क्लोरीनेशन के लिए प्लांट लगाए जाएंगे ताकी देश के तमाम रेलवे स्टेशन और रेलवे कॉलोनी में साफ और सही गुणवत्ता युक्त पानी मुहैया कराया सके.

रेलवे ने अपने एफिडेविट में कहा कि रेलवे स्टेशन और कॉलोनी में सप्लाई कराए जा रहे पानी की गुणवत्ता की जांच में नेशनल स्टैंडर्ड कोर्ड को अपनाया जाएगा (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड 10500). ईसके तहत टोटल कॉलीफॉर्म और ई-कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया टेस्ट कराया जाएगा जो सही गुणवत्ता की जांच कर पाने में मददगार सिद्ध होगा.  ईसके तहत अगर पानी के सैंपल में टोटल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया 1 भी पाया गया तो ईसे ई-कॉलीफॉर्म टेस्ट के लिए भेजा जाएगा. जाहिर है ई-कॉलीफॉर्म टेस्ट से पानी में मौजूद बैक्टरीया और अन्य कीटाणु का पता लगाया जा सकता है.

ध्यान रहे वाटर बॉर्न डिजीज जैसे डायरिया, टाईफाईडकॉलेरा और हेपेटाईटिस जैसी बीमारियां खराब पानी (Contaminated Water) पीने की वजह से ही होती है.

2014 में यह जनहित याचिका दायर की गई थी

पहले रेलवे टोटल कॉलीफॉर्म टेस्ट के सहारे गुणवत्ता की जांच करती थी और अगर पानी के सैंपल का टोटल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया 10 या उससे ज्यादा पाया जाता था तब उसे अनुपयुक्त करार दिया जाता था लेकिन ई-कॉलीफॉर्म टेस्ट का कोई प्रोविजन नहीं था. नए नेशनल स्टैंडर्ड कोर्ड के मुताबिक, टोटल कॉलीफॉर्म टेस्ट 1 भी पाया गया तो ईसे कंटेमिनेटेड वाटर माना जाएगा और फिर ई-कॉलीफॉर्म टेस्ट का भी सहारा लिया जाएगा और ई-कॉलीफॉर्म पाए जाने पर ये अनसेफ कररा दिया जाएगा और पीने के लिए अनुपयुक्त करार दिया जाएगा. ध्यान रहे कंटेमिनेटेड वाटर ट्रीटमेंट के बाद पीने लायक हो सकता है, लेकिन ई-कॉलीफॉर्म पाए जाने पर पूरी तरह अनफिट करार दिया जाएगा. दरअसल वाटर बॉर्न बीमारी की वजह से टाइफाइड, कॉलेरा, हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारियां होती हैं जो कई बार जानलेवा भी साबित होती हैं.

रेलवे द्वारा जमा कराए गए एफिडेविट में कहा गया है कि रेलवे हर बड़े स्टेशन पर हरेक महीने ई-कॉलीफॉर्म टेस्ट के जरिए पानी की गुणवत्ता की जांच करेगी वहीं छोटे स्टेशन पर ऐसा दो महीने में किया जाएगा. इस प्रक्रिया में अधिकारी भी शामिल होंगे और पूरे साल सप्लाई किए गए पानी का एक चौथाई हिस्से की जांच असिस्टेंट डिविजनल इंजीनियर करेंगे जो फील्ड में तैनात रहेंगे.

दरअसल ऐसा सेंटर फॉर पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल) द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका में सुनवाई के दौरान हुआ. साल 2014 में यह जनहित याटिका दायर की गई थी. दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान रेलवे बोर्ड और नॉर्दर्न रेलवे से कहा कि अभी तक पानी की गुणवत्ता की जांच के लिए कोई एक्शन प्लान क्यूं नहीं तैयार किया गया है. हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि अगर 1 नवंबर को सुनवाई के दरमियान एक्शन प्लान कोर्ट में जमा नहीं कराया गया तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ जिम्मेदारी तय करते हुए कोर्ट बलपूर्वक कार्रवाई (COERCIVE ACTION) करेगा.

Fogफोटो: पीटीआई

 क्वालिटी कंट्रोल मैकेनिज्म पर गहरी नाराजगी जताई

हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद रेलवे बोर्ड और नॉर्दर्न रेलवे द्वारा एक्शन प्लान जमा 1 नवंबर को नहीं कराया जा सका. दिल्ली हाईकोर्ट ने नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए अपने आदेश में कहा कि रेलवे बोर्ड और नॉर्दर्न रेलवे दोनों एफिडेविट के माध्यम से एक सप्ताह के भीतर सूचित करें कि तय तारीख 1 नवंबर को एक्शन प्लान कोर्ट में जमा क्यों नहीं कराया गया. कोर्ट के ईस आदेश के बाद 2 नवंबर को रेलवे ने अपने एफिडेविट के जरिए पानी के गुणवत्ता की जांच के लिए तैयार एक्शन प्लान कोर्ट में जमा करा दिया.पानी के गुणवत्ता की जांच को लेकर कई और अनसुलझे सवाल पर बहस 16 नवंबर को होगी..लेकिन रेलवे ने फिलहाल ये सुनिश्चित कर दिया कि नेशनल स्टैंडर्ड के मुताबिक समुचित जांच कर रेलवे यात्रियों और रेलवे कॉलोनी में रह रहे लोगों को क्लोरिनेटेड वाटर मुहैया कराया जाएगा.

ध्यान देने बली बात यह है कि अमेरिका में भी लोगों को सप्लाई किए जा रहे पानी के कीटाणुशोधन (Disinfection of Water) और क्लोरीनेशन के लिए 1908- 1909 में कोर्ट केस चलाया गया था और फिर पब्लिक वाटर सप्लाई में  क्लोरीनेशन और कीटाणुशोधन की प्रक्रिया अपनाया जाने लगा.

दरअसल 1995-96 में पैसेंजर अमेनिटी कमेटी ने अपने रिपोर्ट में रेलवे में सप्लाई किए जा रहे पानी और उसके गुणवत्ता की जांच कर रहे तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए थे. साल 2013 में सीएजी ने भी रेलवे में सप्लाई हो रहे पानी और उसके क्वालिटी कंट्रोल मैकेनिज्म पर गहरी नाराजगी जताई थी.

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