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मंदसौर के एक साल बाद: मुनाफाखोर आबाद, किसान बर्बाद

कुशवाहा सुबह 6 बजे जिले के सबसे बड़े करोंड मंडी पहुंचे. वे वहां अपने खेत में उगाई 80 किलो (10-10 किलो की 8 बोरी) लौकी बेचने आए हैं

Updated On: Jun 10, 2018 04:14 PM IST

Shahroz Afridi

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मंदसौर के एक साल बाद: मुनाफाखोर आबाद, किसान बर्बाद

सुबह की हवा में पिछली रात की बूंदाबांदी से थोड़ी ठंडक सी थी. लेकिन भोपाल के बेरसिया शहर के एक किसान राजेश कुशवाहा के माथे से पसीने की बूंदें टपक रही थीं. कुशवाहा सुबह 6 बजे जिले के सबसे बड़े करोंड मंडी पहुंचे. वे वहां अपने खेत में उगाई 80 किलो (10-10 किलो की 8 बोरी) लौकी बेचने आए हैं. उनके जैसे सैकड़ों अन्य किसान भी मंडी पहुंचे हैं. सभी किसान अपने उगाए उत्पादों को थोक व्यापारियों को बेचने के लिए आस-पास की जगहों से आए हैं. सब्जियों की बोली लगनी शुरू हो गई. थोक व्यापारियों ने लौकी के लिए 60 रुपए प्रति बोरी की अंतिम कीमत लगाई. कुशवाहा को अपने 8 बोरियों के लिए सिर्फ 480 रुपए मिले. 480 रुपए लेकर वे घर वापस लौटते हैं. चिंता की लकीरें उनके चेहरे पर साफ देखी जा सकती हैं.

कुशवाहा कहते हैं, ‘मैंने इस साल लौकी की खेती में 18,000 रुपए का निवेश किया था. यह मेरी मेहनत और निवेश के लिए बहुत ही कम कीमत है.’

मंडी के एक कोने में, जिस व्यापारी ने कुशवाहा से 6 रुपए प्रति किलो लौकी खरीदी थी, वह खुदरा विक्रेताओं के साथ बातचीत शुरू करता है. घंटे भर के भीतर, वे उस लौकी को 12 रुपए प्रति किलो पर बेच देता है. उस थोक व्यापारी को कम से कम 900 रुपए की कमाई होती है. उसी लौकी को फिर से पड़ोसी शहरों में 30-35 रुपए प्रति किलो की दर से बेच दिया गया.

मध्यप्रदेश के मंदसौर की घटना को एक साल बीत गए है. उस संघर्ष ने छह किसानों का जीवन खत्म कर दिया था, जब पुलिस ने फसल की उचित कीमत मांग रहे किसान प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग की थी. लेकिन किसानों की दुर्दशा आज भी जारी है. नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं. किसानों को कृषि उपज की कीमतें नहीं मिल रही हैं. लेकिन किसानों को लुभाने के लिए राजनीतिक दलों के बीच एक होड़ शुरू हो चुकी है. मंदसौर आंदोलन के एक साल पूरे होने पर, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 6 जून को घोषणा की कि पार्टी के सत्ता में आने पर 10 दिनों में किसानों को ऋण मुक्त कर दिया जाएगा और किसानों की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी की जाएगी.

किसानों और व्यापारियों के बीच संघर्ष

करोंड में मंडी के अधिकारियों ने कहा कि 8,000 से 10,000 क्विंटल सब्जियां रोजाना यहां आती हैं. आस-पास के इलाकों के व्यापारियों और किसानों की कमाई के बीच भारी अंतर के बारे में भी किसान बताते हैं. किसानों ने कहा कि सब्जी की कीमतों में वृद्धि होने पर भी उनके मुनाफे नगण्य हैं, क्योंकि सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर व्यापारी ज्यादातर लाभ उठा ले जाते हैं.

कुशवाहा सोयाबीन को प्राथमिक फसल के रूप में उगाते हैं और वर्ष के अन्य समय में सब्जियों की खेती करते हैं. लेकिन अपनी प्राथमिक फसल बेचना उनके लिए एक कष्टप्रद काम रहा है. किसान आंदोलन के चार महीने बाद, शिवराज सिंह चौहान सरकार ने अक्टूबर में भावांतर भुगतान योजना (बीबीवाई) लॉन्च की थी. ये योजना किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और औसत थोक मूल्य के बीच अंतर का बुगतान करने के लिए है, ताकि उनके नुकसान को कम किया जा सके. हालांकि, सोयाबीन के लिए योजना का लाभ दिसंबर में बंद हो गया और तब से मंडियों में इसकी दर 3,050 रुपए के एमएसपी को पार कर गया.

कुशवाहा कहते हैं, ‘मैंने अक्टूबर में सोयाबीन 2,650 रुपए प्रति क्विंटल बेचा था और बीबीवाई के तहत एमएसपी और थोक दर के बीच मूल्य अंतर का भी लाभ उठाया था. लेकिन योजना बंद होने के तुरंत बाद, कीमत 3,300 रुपए प्रति क्विंटल हो गई. इससे पता चलता है कि व्यापारियों ने जानबूझकर कीमतों को कम रखा था, ताकि बीबीवाई के तहत किसानों को लाभ न मिले.’

जब किसान इसे (सोयाबीन) बीज के रूप में खरीदता है तो 4,000 रुपए प्रति क्विंटल का भुगतान करना होता है. यह किसानों का बोझ बढ़ा देता है.

ये स्थिति राज्य के अधिकांश किसानों के लिए समान है, जो अपनी फसलों को बेचने और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं. एक अन्य किसान भीम सिंह कहते हैं, ‘शुरुआत में, हमने सोचा था कि बीबीवाई एक अच्छी योजना है, क्योंकि अगर हमारी फसलों को एमएसपी नहीं मिलता है तो सरकार हमारा ख्याल रखेगी. लेकिन हम अपने भुगतान के लिए मंडियों के कितने दौरे करते हैं और भुगतान शायद ही समय पर मिलता है.’

प्रतीकात्मक

प्रतीकात्मक

भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के राज्य महासचिव अनिल यादव ने कहा, ‘लहसुन बीबीवाई के तहत लाया गया था. सबसे पहले इसे 8,000 रुपए प्रति क्विंटल पर बेचा गया और फिर महीनों में 200 रुपए प्रति क्विंटल हो गया. व्यापारियों ने इसे एमएसपी दर से भी कम कर दिया. एक स्थानीय किसान ने लहसुन के बीज खरीदने के लिए 27,000 रुपए और उर्वरक और श्रम लागत के लिए 8,000 रुपए का निवेश किया. लेकिन उसे मंडी में इसे बेचने से केवल 6,000 रुपए मिले. यानी, 29, 000 रुपए का उसे नुकसान हुआ.’

जनवरी तक, लहसुन 60-80 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेचा जा रहा था. मंदसौर में, कीमतें गिरने के बाद ये 1 रुपए प्रति किलो हो गया. यादव कहते है, ‘कई किसानों ने अपनी उपज फेंक दी क्योंकि इसे मंडी ले जाना भी व्यवहार्य विकल्प नहीं था. टमाटर और प्याज के मामले में भी इसी तरह की प्रवृत्ति देखी गई थी. जब किसान अपने उत्पाद बेचने वाले होते हैं तो दर क्यों गिरती है और बाद में क्यों दर बढ़ जाती हैं?’

ये योजना, जो किसानों के असंतोष के चलते पेश किया गया था, केवल उन्हें क्रोधित करने का ही काम करता है. एक अन्य किसान अपना नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताते है कि यह केवल व्यापारियों के लिए फायदेमंद साबित हुआ, जिन्होंने भावांतर के दौरान दरों को व्यवस्थित रूप से कम किया और बाद में मूल्य बढा कर भारी लाभ कमाया.

शक के दायरे में व्यापारी

आरटीआई कार्यकर्ता और ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल के सदस्य अजय दुबे ने कहा, ‘हमने मंडी बोर्ड के अधिकारियों द्वारा संकलित राज्य में 400 संदिग्ध भावांतर लेनदेन की एक सूची प्राप्त की थी.’

दुबे ने कहा कि उन्होंने मामले की जांच के लिए आयकर विभाग को आवेदन किया है. उनसे आग्रह किया है कि यह देखा जाए कि कुछ व्यापारियों ने केवल चुनिंदा किसानों से बड़ी मात्रा में खरीद क्यों की.

व्यापारियों के मॉडस ऑपरेंडी (कार्य प्रणाली) के बारे में बताते हुए बीकेयू के महासचिव यादव ने कहा, ‘व्यापारी स्थानीय किसानों से सस्ते दरों पर उत्पादन खरीदते हैं और उनसे बीबीवाई के तहत लाभ उठाने के लिए कहते हैं. या, वे स्वयं अन्य राज्यों के मंडियों से सस्ते दर पर उपज खरीदेंगे और भावांतर का लाभ उठाने के लिए किसानों के नाम पर झूठी प्रविष्टियां करेंगे.’

यादव ने पिछले साल एक मीडिया हाउस द्वारा किए गए स्टिंग ऑपरेशन का उदाहरण भी दिया, जिसमें मंडी अधिकारियों और व्यापारियों के बीच सांठगांठ का खुलासा हुआ था.

विदिशा जिले के लाटेरी में दयाराम साहू नाम के एक व्यापारी के गोदाम पर हाल ही में पडे छापे में अधिकारियों ने बड़ी मात्रा में चना और मसूर दाल के असत्यापित स्टॉक जब्त किए थे. उनके गोदाम में पाए गए स्टॉक मंडी से खरीदे गए सामान से ज्यादा थे.

इस छापे का हिस्सा रहे एक खाद्य अधिकारी ने कहा, ‘साहू को कम एमएसपी दर पर 320 क्विंटल और 210 क्विंटल चना दाल बेचने का दोषी पाया गया था. ये चना दाल सस्ती कीमतों पर किसी अन्य जगह से अवैध रूप से खरीदा गया था. ऐसा करना सरकारी नियमों के उलट है.’

एक अन्य उदाहरण में, बीबीवाई घोटाले में शामिल पाए जाने के बाद शाजापुर इलाके के 30 व्यापारियों का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था.

मार्च में मुख्यमंत्री चौहान के निर्णय के मुताबिक अब बीबीवाई योजना से चना, मसूर और सरसों को हटा दिया जाएगा. सरकारी अधिकारियों के मुताबिक इसका मकसद ये है कि सही कीमत पाने के लिए किसानों को एमएसपी दर पर इन फसलों को बेचने के लिए प्रोत्साहित किया जाए.

(लेखक भोपाल स्थित एक फ्रीलांस लेखक हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं. यह जमीनी पत्रकारों का एक अखिल भारतीय नेटवर्क हैं.)

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