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बिहार में इंटर टॉपर्स घोटाले के बाद अब बिहार विश्वविद्यालय में एम. फिल घोटाला

ललन सिंह ने राजभवन और यूजीसी को अंधेरे में रखकर डिस्टेंस मोड में विश्वविद्यालय में एम. फिल कोर्स की शुरुआत कर दी.

Updated On: Jan 28, 2017 05:37 PM IST

FP Staff

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बिहार में इंटर टॉपर्स घोटाले के बाद अब बिहार विश्वविद्यालय में एम. फिल घोटाला

बिहार के बहुचर्चित इंटर टॉपर्स घोटाले की तर्ज पर एक और घोटाला उजागर हुआ है. इस बार मामला उच्च शिक्षा और डिग्री के खेल से जुड़ा है. इसमें एक-दो नहीं बल्कि 3000 लोगों को शोधार्थी बनाने के सपने दिखा कर अंधेरे में रखा गया.

बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित 'बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय' में हुए इस घोटाले का किंगपिन भी इंटर टॉपर स्कैम के किंगपिन यानी बच्चा राय की तरह रसूखदार है. शायद यही कारण है कि उस पर भी अब तक कार्रवाई नहीं हो सकी है.

एम. फिल कोर्स के लिए नहीं ली गई, राजभवन और यूजीसी की अनुमति

इस शिक्षा माफिया ने राजभवन और यूजीसी की अनुमति लिए बगैर और नियमों को दरकिनार करते हुए डिस्टेंस मोड से एम. फिल की पढ़ाई शुरू करा दी. इसके तहत तीन हजार शोधकर्ताओं का नामांकन करके करीब नौ करोड़ रुपये की अवैध उगाही भी कर ली.

ठगे गए शोधार्थियों की शिकायत पर राजभवन ने शिक्षा माफिया को निलंबित करके विभागीय कार्रवाई का आदेश दिया है. इस घोटाले का कथित किंगपिन मुजफ्फरपुर स्थित बिहार विश्वविद्यालय के दूरस्थ शिक्षा निदेशालय का पदाधिकारी है. इसका नाम ललन सिंह है.

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ललन सिंह पहले लंगट सिंह कॉलेज के बीसीए विभाग में था और उस पर वहां भी कार्रवाई की गई थी. लेकिन विभागीय सांठगांठ और कुलपति की कृपा पाकर वह फिर से दूरस्थ शिक्षा विभाग में नियुक्त हो गया.

सस्पेंड होने के बाद भी फिलहाल ललन को बचाने में विश्वविद्यालय के कई पदाधिकारी जुटे हुए हैं. ललन सिंह ने राजभवन और यूजीसी को अंधेरे में रखकर डिस्टेंस मोड में विश्वविद्यालय में एम. फिल कोर्स की शुरुआत कर दी. जबकि नियमों के मुताबिक रिसर्च वर्क रेगुलर कोर्स में होते हैं.

आरोपी ललन सिंह ने छात्रों से वसूले करीब 9 करोड़ रुपए

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घोटाले का किंगपिन मुजफ्फरपुर स्थित बिहार विश्वविद्यालय के दूरस्थ शिक्षा निदेशालय का पदाधिकारी है जिसका नाम ललन सिंह है. (तस्वीर न्यूज़18 हिंदी)

बीते दो सत्रों में ललन सिंह ने छात्र-छात्राओं को अंधेरे में रख कर तीन हजार शोधार्थियों का नामांकन लेकर उनसे करीब नौ करोड़ रुपये भी उगाह लिए. शिकायत मिलने के बाद जब राजभवन ने इस कोर्स को अवैध करार देकर बंद करा दिया तो शोधार्थियों के होश उड़ गये.

फर्जीवाड़े का शिकार हुए शोधार्थी पंकज कुमार की मानें तो ललन सिंह की तरफ से लगातार शिकायत करने वाले छात्र-छात्राओं को धमकी दी जा रही है.

राजभवन के आदेश पर ललन सिंह से पहले स्पष्टीकरण पूछा गया और घोटाला उगाजर होने पर उसे निलंबित कर दिया गया. लेकिन 25 जनवरी 2017 यानी जिस दिन ललन सिंह को निलंबित किया गया उस दिन भी वह कुलपति के साथ न सिर्फ मौजूद रहा बल्कि पदाधिकारी की हैसियत से एक बड़े भवन के शिलान्यास में भी शामिल हुआ.

मामले का खुलासा विश्वविद्यालय के छात्र नेता उत्तम पांडेय ने आरटीआई के माध्यम से किया. मामला संज्ञान में लेते हुए राजभवन ने जांच और कार्रवाई के आदेश दिए. इसके बाद ललन सिंह पर कार्रवाई आरंभ कर दी गई, लेकिन उसे क्लीन चिट देने की कवायद भी जारी है.

जानकारों की मानें तो उच्च शिक्षा में माफियागिरी करने वाले ललन सिंह के रसूख काफी उंचे हैं. उसकी पहचान बड़े-बड़े लोगों से हैं. शायद यही कारण है कि खुद उसके विभाग यानी दूरस्थ शिक्षा के डायरेक्टर डॉ शिवजी सिंह भी उसकी करतूतों से जान-बूझकर अनभिज्ञ रहे.

साभार: न्यूज़ 18 हिंदी 

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