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दलितों के बाद सवर्णों का भारत बंद: सोशल मीडिया से पैदा हो रहे आंदोलन खतरनाक संकेत

ये रोज-रोज के आंदोलन कहां से पैदा हो रहे हैं? इसमें शामिल होने वाले लोग कहां से आ रहे हैं? इन्हें सड़कों पर दंगे फैलाने के लिए कौन उकसा रहा है? कौन इकट्ठा कर रहा है इन्हें?

Updated On: Apr 10, 2018 06:53 PM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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दलितों के बाद सवर्णों का भारत बंद: सोशल मीडिया से पैदा हो रहे आंदोलन खतरनाक संकेत

ये रोज-रोज के आंदोलन कहां से पैदा हो रहे हैं? इसमें शामिल होने वाले लोग कहां से आ रहे हैं? इन्हें सड़कों पर दंगे फैलाने के लिए कौन उकसा रहा है? कौन इकट्ठा कर रहा है इन्हें? सड़कों पर हुए पिछले दो हिंसात्मक विरोध प्रदर्शन ने कुछ बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.

मुश्किल ये है कि इन सारे सवालों के कुछ वाजिब जवाब नहीं मिलते. कोई नहीं जानता है कि 2 अप्रैल को हुए दलित विरोध प्रदर्शन किसके दिमाग की उपज थी. इन प्रदर्शनों में जो 10 से ज्यादा लोग मारे गए, इसकी जवाबदेही किसकी है? और उस दलित आंदोलन के जवाब में आज जो हिंसात्मक प्रदर्शन हुए, इसके पीछे किसका दिमाग है. कितनी हैरानी की बात है कि एक भी संगठन सामने नहीं आया और देश ने दो बड़े विरोध प्रदर्शन देख लिए. एक 2 अप्रैल को और एक 10 अप्रैल को. 2 अप्रैल वाला दलित आंदोलन था और 10 अप्रैल वाला सवर्ण आंदोलन.

एक बार ठहरकर सोचने की जरूरत है कि ये दो आंदोलन या विरोध प्रदर्शन क्यों और किन परिस्थितियों में हुए और इन सबके लिए किसे जिम्मेदार माना जाए. सबसे अहम बात ये है कि ये दोनों ही विरोध प्रदर्शनों सोशल मीडिया से उपजे हैं. ये नए तरह का संकेत है. एक नया दौर आने की आहट. एक नई तरह की समस्या की संभावना बनती दिख रही है.

अब देखिए कि हुआ क्या है. दलित एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले पर अप्रैल से पहले एक कैंपेन चलाया गया. इस कैंपेन के जरिए देशभर के दलितों को 2 अप्रैल को एकजुट होकर मोदी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने का आह्वान किया गया. दलित एक्ट में बदलाव के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका में हुई देरी को सरकार का दलित विरोधी कदम बताया गया.

A view of the Indian Supreme Court building is seen in New Delhi

फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप के जरिए मैसेज फैलाए गए कि 2 अप्रैल को देशभर के दलित इकट्ठा होकर सरकार के दलित विरोधी रवैये के खिलाफ सड़कों पर उतरें. ये आह्वान किसने किया था किसी को नहीं पता. लेकिन सोशल मीडिया पर देखते ही देखते इस तरह के मैसेजों की बाढ़ आ गई. सिर्फ सोशल मीडिया से फैले ऐसे संदेशों की बदौलत 2 अप्रैल से पहले माहौल भी बन गया. शुरुआत में बीएसपी जैसी दलित राजनीति करने वाली पार्टियां भी कंफ्यूज थी कि इस पर किस तरह की प्रतिक्रिया दी जाए. लेकिन जब माहौल बन गया तो सभी ने बहती गंगा में हाथ धोने के मौके को नहीं छोड़ा.

सरकार के विरोध में बने माहौल का फायदा बीएसपी, एसपी, आरजेडी से लेकर कांग्रेस तक ने उठाया. मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा हंगामा हुआ. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पंजाब, हरियाणा से लेकर छत्तीसगढ़ में सड़कों पर उपद्रव हुए. कई छोटे-मोट दलित संगठन इस विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेकर बड़ा बनने की जुगत में भिड़ गए. इन सबके बीच चिंताजनक बात ये हुई कि देश के कई हिस्सों में, जहां दलितों के भारत बंद के दौरान हिंसा हुई, वहीं कई जगहों पर दलितों के भारत बंद के खिलाफ लोगों ने लाठी डंडे निकाल लिए.

कई जगहों पर दलित-प्रदर्शनकारियों को पीटा गया. विरोध प्रदर्शन करने वाले लोगों पर फायरिंग की तस्वीरें वायरल हुईं. हिंदू-मुस्लिम के नाम पर बंटे लोग दलितों के विरोध प्रदर्शन के नाम पर बंटने लगे. एक गुट ने दलितों के प्रदर्शन का समर्थन किया और दूसरे ने इसकी जोरदार मुखालफत की. सोशल मीडिया पर लोगों अपने-अपने खूंटे पकड़कर खूब जोरआजमाइश की. दलित एक्ट में बदलाव का मसला आगे बढ़कर दलितों और ओबीसी को दिए जा रहे आरक्षण पर चला गया. फिर आरक्षण के समर्थन और विरोध में गोलबंदी होने लगी. और इसी कड़ी में दलितों के विरोध प्रदर्शन को जवाब देने की तैयारियां होने लगीं.

जिस तरह से सोशल मीडिया के जरिए 2 अप्रैल के भारत बंद की भूमिका तैयार हुई ठीक उसी तर्ज पर दलित-ओबीसी आरक्षण के खिलाफ भारत बंद का माहौल बन गया. फेसबुक, ट्विटर और व्हॉट्सएप पर मैसेज वायरल हुए. लिखा गया- आरक्षण विरोध में 10 अप्रैल को सवर्ण-ओबीसी समर्थित भारत बंद का समर्थन करें. सोशल मीडिया पर सवर्ण-ओबीसी का गुट कैसे बन गया और ओबीसी आरक्षण का विरोध क्यों करने लगे, ये किसी को समझ नहीं आया.

लेकिन हंगामे की पृष्ठभूमि तैयार हो गई. बिना ज्यादा मशक्कत किए फौज तैयार हो गई. 2 अप्रैल के दलित आंदोलन में हिंसा को रोकने में नाकाम राज्य सरकारों के सामने 10 अप्रैल का सवर्ण आंदोलन नया संकट लेकर खड़ा हो गया.

दलित आंदोलन में चोट खाई सरकारों ने आनन-फानन में बड़ी तैयारियां कर लीं. मध्य प्रदेश में सरकार ने चुस्ती दिखाई. मध्यप्रदेश के भिंड जिले में सोमवार नौ अप्रैल की शाम छह बजे से ही कर्फ्यू लागू कर दिया गया. दस अप्रैल को स्कूल, कॉलेज बंद कर दिए गए. भिंड सहित पूरे ग्वालियर चंबल संभाग में रविवार की रात बारह बजे से ही इंटरनेट की सेवाएं बंद कर दी गईं. राजस्थान में भी कई जगहों पर इंटरनेट सेवाएं रोक दी गईं. हालांकि इन सबके बीच पुलिस प्रशासन के लिए मुश्किल सवाल ये था कि वो एहतियाती कदम तो उठाएं लेकिन नजर किस संगठन पर रखें कि संभावित हिंसा को रोका जा सके. किसी ने इस बंद के ऐलान की जिम्मेदारी नहीं ली थी.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

सोशल मीडिया से उपजे दलित विरोध के जवाब देने की जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं था. हालांकि सारे एहतियाती कदम उठाए जाने के बाद भी कई जगहों से तोड़फोड़ की खबरें आईं. बिहार में आरा, छपरा, दरभंगा, बेगूसराय, गया, नालंदा से हिंसा की खबरें आईं. आरा में दो गुटों ने आमने-सामने आकर फायरिंग की. एसडीओ की गाड़ी जला दी. दरभंगा के ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी में बीए की परीक्षा स्थगित कर दी गई हैं. बरौनी, बेगूसराय और नालंदा में प्रदर्शनकारियों ने रेलवे ट्रैक पर आकर ट्रेन को रोक दिया. कई जगहों पर सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन हुए. मध्य प्रदेश के ग्वालियर में पुलिस-प्रशासन ड्रोन से लगातार हालात पर नजर बनाए रखा. पंजाब के फिरोजपुर में दलित और सवर्णों के बीच आमने-सामने के झगड़े हुए. तलवार-भाले लेकर निकले लोगों ने उपद्रव मचाया.

सरकार सचेत थी इसलिए इस बार हिंसा कम हुई. शायद लोगों ने भी थोड़ा संयम रखा. लेकिन एक बात पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि इस तरह से अगर सोशल मीडिया से विरोध प्रदर्शन उपजता रहा तो ये आने वाले दिनों में और मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं. सोशल मीडिया के एक पोस्ट से अगर जातीय गोलबंदी हो जाए तो समझा जा सकता है कि ये कितने खतरनाक स्तर पर जा सकता है. एक पोस्ट के वायरल होने पर देशभर की सड़कों पर जनता उतरने लगे तो कानून-व्यवस्था के सामने गंभीर संकट की स्थिति आ जाएगी. अभी तक अपनी-अपनी राजनीति का झंडा उठाए लोग सोशल मीडिया पर जो एजेंडा चला रहे हैं वो खतरनाक है. दिनबदिन बेलगाम होते जा रहे सोशल मीडिया को काबू में रखना जरूरी हो गया है.

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