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बजट के बाद: किसान कैसे कहें कि आरजू क्या है

सरकार को किसान का चेहरा ठीक से नहीं दिखता और किसान को सरकार की नीयत का पता नहीं चलता.

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Feb 03, 2017 03:12 PM IST

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बजट के बाद: किसान कैसे कहें कि आरजू क्या है

‘तेरे नाम से शुरु, तेरे नाम से खत्म’ वित्त मंत्री ने शायद यही जताना चाहा होगा. यही वजह है कि उनके बजट भाषण की शुरुआत किसान से हुई और अंत भी किसान पर हुआ. बात बड़बोली लगे तो खुद ही परख लीजिए, हाथ कंगन को तो आरसी क्या !

वित्त मंत्री का बजट भाषण जिन दस बड़े विषयों के इर्द-गिर्द पेश हुआ उसमें सबसे ऊपर रखा ‘किसान’ को रखा गया है. भाषण के सबसे आखिर के वाक्य से तुरंत पहले की पंक्ति है, 'अब हमारा जोर किसानों, गरीब और समाज के अभावग्रस्त वर्गों के लाभ के लिए इन सभी प्रस्तावों पर अमल का रहेगा'.

भाषण किसान के नाम से शुरू हुआ, किसान के नाम से खत्म और जहां खत्म हुआ वहां किसानों के लिए दर्दमंदी का इजहार था. भाषण के आखिर के वाक्य में वित्त मंत्री ने किसान को 'गरीब' और 'अभावग्रस्त' वर्गों के साथ रखा तो माना यही जायेगा कि सरकार किसानों के दर्द से अनजान नहीं है. दर्द चूंकि दवा की मांग करता है तो ख्याल आएगा कि शायद किसानों का ड्रीम-बजट पेश हुआ है!

सारे फसाने में जिसका जिक्र ना था

लेकिन सपने और सच्चाई में बड़ा फासला होता है. अंग्रेजी की एक मशहूर कविता में आता है- 'बिट्वीन द आयडिया एंड द रियल्टी… फाल्स द शैडो.'

सरकार के सोचे और किसान की सच्चाई के बीच भी एक धुंध है. हमारे लोकतंत्र में सरकार और किसान जब भी एक-दूसरे को देखना चाहते हैं, यह धुंध बीच में आ जाती है. सरकार को किसान का चेहरा ठीक से नहीं दिखता और किसान को सरकार की नीयत का पता नहीं चलता.

इस बार भी यही हुआ, पिछली बार भी ऐसा ही हुआ था. बीते कई सालों से ढर्रा एक सा रहा है- सरकार अपनी तरफ से किसानों का ड्रीम बजट पेश करती है, लेकिन उस बजट में किसानों के दुख की दवा नहीं होती.

वित्त मंत्री का बजट भाषण अपने चेहरे और ब्यौरे समेत 18722 शब्दों का है. सोचिए कि इतने लंबे बयान में किसान के दर्द का जिक्र कितनी दफे आया है? दरअसल एक बार भी नहीं. ‘किसान आत्महत्या’ यह शब्द पूरे बजट भाषण में खुर्दबीन से खोजने पर भी कहीं नहीं मिलता.

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इस दशक की शुरुआत (2011) में कहा गया कि बीते पंद्रह सालों से इस देश में हर 30 मिनट में एक किसान आत्महत्या करने को मजबूर है. उस वक्त यूपीए की सरकार थी. छह साल बाद सरकार बदल गई है लेकिन किसानी के मोर्चे पर हालात नहीं बदले.

एनडीए के शासन के बीते दो सालों (2014 और 2015) में खेती-किसानी से जुड़े लोगों (किसान और खेतिहर मजदूर) के आत्महत्या के मामले 12,360 से बढ़कर 12,602 हो गये हैं. दो सालों के दरम्यान किसान आत्महत्याओं में 41 फीसदी का इजाफा हुआ है.

अगर घंटे में हिसाब करें तो अब भी सवा घंटे पर खेती-किसानी से जुड़े दो लोग आत्महत्या करने पर मजबूर हैं. किसानों के दर्द का सबसे हाहाकारी सबूत है किसान-आत्महत्या. जिस बजट भाषण ने इस दर्द की नोटिस नहीं ली उससे दवा की उम्मीद कैसे रखें ?

कर्ज माफी से परहेज क्यों 

आप कह सकते हैं कि बजट आमदनी और खर्च का लेखा-जोखा होती है, सरकार के साल भर की आर्थिक प्राथमिकताओं की घोषणा. वह कोई कविता नहीं कि उसमें किसानों के दुख का जिक्र आए.

बात बेशक दुरुस्त जान पड़ती है लेकिन दर्द की पहचान हो तभी सही दवा की तजबीज होती है. किसान आत्महत्या के सवाल को ठीक-ठीक पहचान लें तो उसका सही समाधान यानी सरकार की आर्थिक प्राथमिकता तय हो सकती है.

सरकारी रिपोर्ट कहती है कि किसान-आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामलों (तकरीबन 40 फीसदी) में बड़ी वजह है कर्ज और खेती-बाड़ी से जुड़ी समस्याएं जैसे पाला, सूखा या बाढ़ के कारण फसल का मारा जाना.

अगर वित्तमंत्री किसान के दु:ख की पहचान करते तो किसान की कर्जमाफी के बारे में भी कुछ सोचते. अचरज कीजिए कि उनके तकरीबन 19 हजार शब्दों के बजट भाषण में कर्ज का जिक्र तो 7 बार आया है लेकिन कर्जमाफी का एकबार भी नहीं.

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किसानों का कर्ज माफ होता तो उम्मीद बंधती कि किसान के गले में पड़ने वाला आत्महत्या का फंदा कुछ ढीला पड़ेगा लेकिन सरकार ने ठीक उल्टा किया. रोग कर्ज का था, मरीज को दवा के नाम पर कुछ और कर्ज देने-दिलाने की राह निकाली गई.

बजट-भाषण के बाद किसान बस इतना जानता है कि कर्जमाफी नहीं हुई, कर्ज पर नोटबंदी के दो महीने के बस ब्याज की माफी हुई है. यह ब्याज-माफी एक कर्जदार भारतीय किसान पर चढ़े औसत कर्ज (47 हजार रुपए) के आगे कुछ वैसा ही है कि कोई कंधे पर चढ़े पहाड़ का बोझा उतारने आए और एक तिनका उतारकर चलता बने.

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यहां चाहें तो याद करें कि रिजर्व बैंक के नए आंकड़ें जो बताते हैं कि बैंकों का बैडलोन 121 अरब डॉलर से बढ़कर 2016 के जून महीने में 138 अरब डॉलर हो चुका है.

बैंकों से मिला कर्ज सूद समेत ना लौटा पाने वालों में 100 करोड़ से 1000 करोड़ रुपए की मिल्कियत वाले ही नहीं 5000 करोड़ या उससे ज्यादा के उद्यम यानी बड़े कारपोरेट भी शामिल हैं.

हालत यह है कि कुछ कर्जदार कारपोरेट के पास मौजूद कुल संपदा का बाजार-मूल्य आज उतना भर भी नहीं है जितना कि उनके द्वारा हासिल कर्ज का मूल्य.

जाहिर है, कारपोरेट पर चढ़े इस कर्ज को एक ना एक दिन बट्टा-खाता में जाना है फिर सवाल पूछा जायेगा कि कर्जमाफी के मामले में सरकार किसान से ही इतनी बेगानी क्यों ?

कर्ज का कीर्तिमान 

वित्त मंत्री का जोर किसानों की कर्जमाफी की जगह उनके लिए कर्ज के और ज्यादा विस्तार करने पर रहा. बजट भाषण में किसानों वाला हिस्सा 754 शब्दों का है और इसका एक चौथाई से थोड़ा ही कम (166) हिस्सा यह बताने में खर्च किया गया है कि किसानों को नए वित्तवर्ष में 10 लाख करोड़ रुपए कर्ज देने का इरादा है और यह अपने आप में कीर्तिमान है.

बेशक कीर्तिमान तो बन गया लेकिन यह कर्ज किसानों तक पहुंचेगा कैसे? नोटबंदी के वक्त यह खबर खूब चली थी कि देश की 40 फीसद से ज्यादा आबादी बैकिंग सिस्टम से बाहर है, उसका कोई बैंक खाता ही नहीं.

बैंकिंग सिस्टम से बाहर की इस आबादी में किसान भी आते हैं. वित्तमंत्री के बजट-भाषण के बाद एक किसान-संगठन ने ठीक याद दिलाया है कि ज्यादातर (तकरीबन 60 फीसदी) छोटे और सीमांत किसान बैंकिंग-सिस्टम से बाहर हैं. तो ये चाहें भी तो कर्ज के इस 10 लाख करोड़ रुपए की एक पाई नहीं ले सकते.

वित्त मंत्री के बजट-भाषण में छोटे और सीमांत किसानों का जिक्र आया जरुर लेकिन कहा बस इतना ही कि छोटे और सीमांत किसानों को कर्जा मिल सके इसके लिए कोशिश की जाएगी कि अगले तीन सालों में 63,000 प्राथमिक कृषि ऋण सोसाइटियों को अगले तीन सालों में 1900 करोड़ रुपए के खर्चे से डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंकों से जोड़ दिया जाए.

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मतलब, किसानों के लिए दस लाख करोड़ की ऋण-राशि का ऐलान भले इस वित्तवर्ष में हुआ हो लेकिन उसके मिलने की उम्मीद ज्यादातर सीमांत और छोटे किसान अगले तीन साल बाद करें, भले ही उनकी तादाद देश के किसान-परिवारों में सबसे ज्यादा( नौ करोड़ किसान परिवारों में छह करोड़) हो.

क्या दस लाख करोड़ का यह कर्ज सरकार किसान-क्रेडिट कार्डों के जरिए बांटेगी? प्रधानमंत्री ने 31 दिसंबर वाले भाषण में किसान-क्रेडिट कार्डों को जब रुपेकार्ड में बदलने की बात कही तो एक खुली चिट्ठी में दो दर्जन से ज्यादा किसान-संगठनों ने ध्यान दिलाया था कि इसमें नया क्या है ?

योजना तो 2013-14 से ही चल रही है, अभी तक 5 लाख 66 हजार किसान-क्रेडिट कार्ड जारी भी हो चुके हैं और जो किसान-क्रेडिट कार्डों को जारी करने का काम अपनी निर्धारित गति से होता तो अबतक 3 करोड़ किसानों को अपने कार्ड मिल जाने चाहिए थे ?

अभी तक ऐसा नहीं हुआ है सो अंदाजा लगाया जा सकता है कि छोटे और सीमांत किसानों को कर्जा देने की अपनी योजना को लेकर सरकार कितनी गंभीर है!

कर्ज लेंगे तो चुकायेंगे कैसे

वित्त मंत्री ने 10 लाख करोड़ के कर्ज की भारी पोटली तो बीच बाजार लाकर रख दी लेकिन यह नहीं सोचा कि उस पोटली को खोलने की हिम्मत किसान दिखाए तो कैसे ?

कर्ज लेने की हिम्मत आती है चुकाने की ताकत से और चुकाने की ताकत का सीधा रिश्ता है आमदनी की आशा से. इस बजट में सरकार ने किसान की आमदनी बढ़ाने के लिए क्या किया है जो बजट-भाषण में फिर से यह हरियाली दिखायी गई है कि किसान की आमदनी को पांच सालों में दोगुनी हो जायेगी ?

सरकार के आंकड़े ही बताते हैं कि एक दशक यानि 2003 से 2013 के बीच किसानी से होने वाली आमदनी में 3.6 गुना बढ़त हुई है और किसानी की लागत यानी खाद, बीज, सिंचाई, मजदूरी, बाजार तक माल-ढुलाई का खर्चा भी करीब तीन गुना बढ़ा है. हासिल जब लागत के बराबर हो तो आमदनी क्या हुई ?

अगले सालों के लिए रुझान किसान की आमदनी में कमी के ही हैं. बीते तीन सालों में ऊपज पर मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य(एमएसपी) के इजाफे में कमी हुई है. 2012-13 में एमएसपी पर 42% का इजाफा हुआ, 2011-12 में 53% फीसद का और 2010-11 में 39% का. लेकिन बीते तीन सालों में फसलों पर एमएसपी पर इजाफा महज 12 फीसद का रहा है.

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एमएसपी बढ़े तो किसान का कुछ हौसला बढ़ता है कि चलो सरकारी मंडी में पहले की तुलना में ज्यादा कीमत पर ऊपज बेच लेंगे लेकिन बड़ी फसलों (धान और गेहूं) में किसानी की लागत की बढ़ती के तुलना में एमएसपी का इजाफा कमतर होता जा रहा है.

मिसाल के लिए धान(साधारण) की एमएसपी की ही बात करें. कमीशन ऑन एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेज के आंकड़े बताते हैं कि धान की एमएसपी में 2008-09 में 20 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ था, पांच सालों बाद 2013-14 में यह घटकर 4.80 फीसदी हुआ और 2015-16 में धान की एमएसपी में बढ़वार सिर्फ 3.7 फीसदी की हुई है.

काश, बजट भाषण पढ़ते हुए वित्तमंत्री एनडीए के उस वादे को याद रखते जिसमें कहा गया कि शासन में आये तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश को लागू करेंगे.

इस आयोग की सिफारिश है कि किसानों को फसल के लागत मूल्य से 50 प्रतिशत अधिक एमएसपी दिया जाय. इस सिफारिश को लागू करने को लेकर केंद्र सरकार कितनी गंभीर है इसका जवाब भी छह माह पहले मिल चुका है.

आरटीआई की एक अर्जी में पूछा गया कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश लागू करने के बारे में केंद्र सरकार क्या सोचती है? जवाब में केन्द्र सरकार ने कहा कि लागत मूल्य पर 50 फीसदी बढ़ोतरी से मंडी में दिक्कतें आ सकती है. लिहाजा इसे लागू करना अभी संभव नहीं है.

खाद-बीज-सिंचाई का खर्चा बढ़ता जाता है, एमएसपी की बढ़त के अपने वादे से सरकार मुकर रही है, बाजार में किसान एमएसपी से कम दर पर ऊपज बेचने को मजबूर है और 85 प्रतिशत किसान फसल-बीमा के दायरे से बाहर हैं!

इसके बावजूद वित्तमंत्री बजट-भाषण में कविताई करें कि ‘हम आगे-आगे चलते हैं आ जाइए आप’ तो आप ही कहिए किसान किस हिम्मत से उनके पीछे चले?

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