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एडल्टरी कानून पर सुनवाई: विवाहेत्तर संबंधों के लिए सिर्फ पुरुषों को सजा देने के पक्ष में केंद्र सरकार

मौजूदा एडल्टरी कानून में महिलाओं को सजा दिए जाने का प्रावधान नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में इस नियम में बदलाव के लिए एक याचिका दायर की गई थी. सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं को भी एडल्टरी कानून के दायरे में न लाने की वकालत की है लेकिन पुरुषों को सजा मिलती रहे... इसका पक्ष लिया है

Updated On: Jul 11, 2018 06:48 PM IST

FP Staff

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एडल्टरी कानून पर सुनवाई: विवाहेत्तर संबंधों के लिए सिर्फ पुरुषों को सजा देने के पक्ष में केंद्र सरकार

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि एडल्टरी (व्यभिचार) को अपराध ही रहने देना चाहिए. सरकार ने बुधवार को कोर्ट में उस याचिका का विरोध किया जिसमें भारतीय दंड संहित (आईपीसी) की धारा 497 की वैधता को चुनौती दी गई है. इस धारा के तहत एडल्टरी मामले में पुरुष के दोषी पाए जाने पर सजा का प्रावधान है लेकिन महिलाओं के लिए नहीं. इसीलिए इसके खिलाफ याचिका दाखिल कर इसमें बदलाव की मांग की गई है.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए अपने हलफनामे में कहा है कि एडल्टरी एक अपराध ही रहना चाहिए. एडल्टरी कानून को खत्म करने से विवाह की पवित्रता पर असर पड़ेगा. एडल्टरी को वैधानिक (लीगल) बनाने से वैवाहिक संबंधों को नुकसान होगा. केंद्र ने कहा है कि धारा 497 को विवाह की पवित्रता की रक्षा करने के लिए बनाया गया था.

एडल्टरी कानून को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ कर रही है. मौजूदा कानून के मुताबिक, शादी के बाद किसी दूसरी महिला से संबंध बनाने पर अभी तक सिर्फ पुरुष के लिए ही सजा का प्रावधान है. महिलाओं को इस मामले में कोई सजा नहीं होती. क्योंकि कानून में महिला शब्द का कोई जिक्र ही नहीं है.

150 साल पुराना कानून मौजूदा दौर में बेमानी

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच इटली में रहने वाले केरल मूल के एक सोशल एक्टिविस्ट जोसेफ शाइन की याचिका पर सुनवाई कर रही है. इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी को संवैधानिक बेंच को सौंप दिया था.

अपनी याचिका में उन्होंने कहा था कि कि अगर शादीशुदा पुरुष और शादीशुदा महिला की आपसी सहमति से संबंध बने, तो सिर्फ पुरुष आरोपी कैसे हुआ? पिटीशन में कहा गया है कि 150 साल पुराना ये कानून मौजूदा दौर में बेमानी है. ये कानून उस समय का है, जब महिलाओं की हालत काफी कमजोर थी. इस तरह एडल्टरी के मामलों में ऐसी महिलाओं को पीड़िता का दर्जा मिल गया.

बदलते समय के साथ पूर्व के फैसलों पर पुनर्विचार की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका संवैधानिक पीठ को रेफर करते हुए कहा था कि खासतौर पर समाजिक प्रगति, बदल चुकी अवधारणा, लैंगिक समानता और लैंगिक संवेदनशीलता को देखते हुए पूर्व फैसलों पर पुनर्विचार की जरूरत है. इन सबके अलावा संविधान के अनुच्छेद 15 में महिलाओं के लिए सकारात्मक अधिकार के पहलू पर अलग ढंग से ध्यान देने की भी जरूरत है.

कोर्ट ने उस समय कहा था कि जीवन के हर तौर-तरीकों में महिलाओं को समान माना गया है. इस मामले में अलग बर्ताव क्यों? जब गुनाह महिला-पुरुष दोनों की रजामंदी से किया गया हो, तो महिलाओं को सुरक्षा या राहत क्यों?

संवैधानिक पीठ को इस मामले को सौंपते हुए कोर्ट ने जोर देकर कहा था कि जब समाज ने प्रगति की है. चीजें बदली हैं. पुरुष और महिलाओं के एक समान अधिकारों की बात हो रही है. तो मौजूदा समय में इस कानून की समीक्षा की जरूरत है.

किसपर लागू होता है एडल्टरी कानून

सेक्शन 497 के मुताबिक, अभी अगर कोई शादीशुदा मर्द किसी शादीशुदा महिला से शारीरिक संबंध बनाता है, तो इसमें सिर्फ उस मर्द को ही सजा होगी. इस मामले में शादीशुदा महिला पर न तो व्यभिचार (एडल्टरी) करने और न ही बहकाने के आरोप लगेंगे. एडल्टरी के मामले में आरोपी पुरुष के लिए पांच साल की सजा का प्रावधान है.

इस मामले में यह भी जानना जरूरी है कि केवल विवाहित महिला के साथ बनाए गए यौन संबंध ही एडल्टरी के तहत आएंगे. विधवा, सेक्स वर्कर या अविवाहित महिला के साथ बनाए गए यौन संबंध इसमें शामिल नहीं होते हैं. दिल्ली हाईकोर्ट ने बृज लाल बिश्नोई बनाम राज्य (1996) केस की सुनवाई करते हुए इसकी पुष्टि की थी.

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