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एडल्टरी कानून में दंड देने का प्रावधान समानता के अधिकार का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट

पीठ ने धारा 497 के इस पहलू को ‘स्पष्ट रूप से मनमाना’ करार दिया और कहा कि यह विवाहित महिला से इस आधार पर ‘चल सम्पत्ति’ के तौर पर व्यवहार करता है कि अन्य विवाहित व्यक्तियों के साथ उनका संबंध ‘उनके पति की सहमति’ पर निर्भर करता है

Updated On: Aug 02, 2018 04:25 PM IST

Bhasha

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एडल्टरी कानून में दंड देने का प्रावधान समानता के अधिकार का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि वैवाहिक पवित्रता एक मुद्दा है लेकिन एडल्टरी (व्यभिचार) पर दंडात्मक प्रावधान संविधान के तहत समानता के अधिकार का परोक्ष रूप से उल्लंघन है क्योंकि यह विवाहित पुरूष और विवाहित महिलाओं से अलग-अलग व्यवहार करता है.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली पांच जजों की संविधान पीठ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 497 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी. पीठ प्रावधान के उस हिस्से से भी असहमत थी जिसमें कहा गया है कि यदि एक विवाहित महिला अपने पति की सहमति से किसी विवाहित व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध बनाती है तो उस स्थिति में एडल्टरी का कोई मामला नहीं बनता.

158 वर्ष पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 कहती है, ‘जो भी किसी ऐसे व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध बनाता है जिसके बारे में वह जानता है या उसके पास यह मानने के लिए कारण है कि वह किसी अन्य पुरूष की पत्नी है, वह संबंध उस व्यक्ति की सहमति के बिना बनाता है, ऐसा शारीरिक संबंध जो कि बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता, वह एडल्टरी के अपराध का दोषी होगा.’

संवैधानिक पीठ ने धारा 497 के एक पहलू को मनमाना करार दिया

पीठ ने धारा 497 के इस पहलू को ‘स्पष्ट रूप से मनमाना’ करार दिया और कहा कि यह विवाहित महिला से इस आधार पर ‘चल सम्पत्ति’ के तौर पर व्यवहार करता है कि अन्य विवाहित व्यक्तियों के साथ उनका संबंध ‘उनके पति की सहमति’ पर निर्भर करता है.

पीठ में जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा भी शामिल थीं. पीठ ने कहा, ‘निश्चित रूप से वैवाहिक पवित्रता का पहलू है लेकिन जिस तरह से प्रावधान अधिनियमित किया जाता है या बनाए रखा जाता है यह अनुच्छेद 14 (संविधान के समानता के अधिकार) के खिलाफ है.

वकील कलीसवरम राज ने याचिकाकर्ता जोसेफ शाइन की ओर से पेश होते हुए धारा 497 के विभिन्न पहलुओं का उल्लेख किया और कहा कि प्रावधान दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध पर लागू नहीं होता और यह विवाहित पुरूषों और महिलाओं से एडल्टरी के अपराध के लिए उनके अभियोजन के संबंध में अलग अलग व्यवहार करता है.

उन्होंने कहा कि विवाहित पुरूष पर व्यभिचार के अपराध के लिए मामला चलाया जा सकता है लेकिन ऐसा विवाहित महिलाओं के मामले में नहीं है. उन्होंने धारा से संबंधित विभिन्न विसंगतियों का उल्लेख किया.

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