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युगों बाद क्यों आया आदि शंकराचार्य की प्रतिमा लगाने का खयाल!

मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में आदि शंकराचार्य की 108 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जाएगी और इस प्रतिमा स्थापित करने के लिए निकाली जा रही यात्रा का नाम एकात्म है

Dinesh Gupta Updated On: Jan 02, 2018 10:41 AM IST

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युगों बाद क्यों आया आदि शंकराचार्य की प्रतिमा लगाने का खयाल!

मध्य प्रदेश देश का शायद अकेला ऐसा राज्य होगा, जहां आदि शंकराचार्य की 108 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जाएगी. प्रतिमा ओंकारेश्वर में स्थापित की जाएगी. प्रतिमा की स्थापना के लिए राज्य के चार अलग-अलग स्थानों से धातु संग्रहण के लिए यात्राएं शुरू की गईं हैं.

इस यात्रा को एकात्म यात्रा का नाम दिया गया है. प्रतिमा की स्थापना के लिए भूमि पूजन 22 जनवरी को ओंकारेश्वर में होगा. यात्रा का रूट मैप इस तरह तैयार किया गया है कि सभी 51 जिलों से यह धातु संग्रहण और मिट्टी का संकलन कर सके. यद्यपि यात्रा पूरी तरह सरकारी है लेकिन, यात्रा को सफल बनाने की तैयारियों में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की मौजदगी से इसे अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से भी जोड़कर देखा जा रहा है.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 19 दिसंबर उज्जैन और रीवा दो स्थानों से यात्राओं को रवाना किया. पादुका पूजन और ध्वज पूजन जैसे कार्यक्रम में हुए. देश में सामान्यत: राजनेताओं की मूर्तियां लगाने का चलन है. ऐसा पहली बार है कि आदि शंकराचार्य की प्रतिमा लगाने में किसी सरकार ने दिलचस्पी दिखाई है. ओंकारेश्वर को ही क्यों चुना प्रतिमा स्थापना के लिए?

क्यों महत्वपूर्ण हैं अादि शंकराचार्य 

आदि शंकराचार्य का जन्म केरल में हुआ था. 650 ईसवी के बाद यह वो दौर था, जिसमें भारत में विशाल और स्थिर साम्राज्यों का युग समाप्त हो चला था. साम्राज्य की इच्छा रखने वाले राज्यों में निरन्तर संघर्ष और उत्थान-पतन की लीला ने भारत की राजनीतिक एकता और स्थिरता को हिलाकर रख दिया. कश्मीर, कन्नौज और गौंड के संघर्ष ने और फिर पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट नरेशों की खींचातानी ने उत्तरापथ को आंदोलित कर डाला था. ठीक वैसे ही दक्षिण में चालुक्य, पल्लव और पाण्डय शासकों की लड़ाइयों ने भारत को विचलित कर रखा था. पश्चिम से अरब सेनाओं और व्यापारियों के प्रवेश ने इस परिस्थिति में नया आयाम जोड़ दिया.

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बढ़ती अराजकता और असुरक्षा के वातावरण में स्थानीय अधिकारियों और शासकों का प्रभाव बढ़ने लगा. साम्राज्य की जगह सामंती व्यवस्था आकार लेने लगी. किसानों और ग्राम पंचायतों के अधिकार अभी बरकरार थे पर यह सही है कि इस समय राजसत्ता बिखर चुकी थी. आदि शंकराचार्य के समय तक भारत में प्राचीन स्मृतियों और पुराणों का युग बीत चुका था और अनेक अप्रमाणिक ग्रंथ भी रचे जाने लगे थे. उदारवादी और कट्टर प्रवृत्तियों में टकराहट की आहटें भी सुनायी पड़ने लगी थीं. धर्म के क्षेत्र में तंत्र- मंत्र और प्रतिमा पूजन की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही थी. पुराने वैदिक देवताओं को नया रूप दिया जा रहा था और साथ ही बौद्धों के अनेक संप्रदाय भी प्रचलन में आ गए थे.

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आदि शंकराचार्य के समय की धार्मिक परिस्थिति को वेद के प्रमाण को मानने वाली आस्तिक और उसे न मानने वाली नास्तिक धाराओं के संगम और संघर्ष का युग भी कहा जाता है. शंकराचार्य इसी संक्रांति काल में भारत में अवतरित हुए. उन्होंने अपने प्रखर ज्ञान और साधना के बल से तत्कालीन भारतीय समाज में धर्म के ह्रास को रोकने के लिए अनेक नास्तिक संप्रदायों का सामना कर वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा में अपना जीवन समर्पित किया.

तमाम ऐतिहासिक विवादों के बावजूद मध्य प्रदेश को यह गौरव हासिल है कि भारत की राष्ट्रीय एकता के देवदूत आदि शंकराचार्य यात्रा करते हुए नर्मदा और माहिष्मति नदियों के संगम पर आए थे. उनसे संबंधित ओंकारेश्वर, उज्जैन, पचमठा (रीवा) और अमरकंटक आज के मध्य प्रदेश में स्थित है. आदि शंकराचार्य के गुरु श्री गोविंदपाद का आश्रम ओंकारेश्वर के तट पर ही था और उनकी प्राचीन गुफा आज भी वहां मौजूद है जहां लाखों श्रद्धालु उसके दर्शन करते हैं. पास ही के महेश्वर नगरी में निवास करने वाले आचार्य मंडन मिश्र से शंकराचार्य के शास्त्रार्थ की लोक प्रसिद्ध कथा आज भी वहां घर-घर में सुनी जा सकती है.

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मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले साल जब नर्मदा की यात्रा की तब राज्य में आदि शंकराचार्य की प्रतिमा स्थापित करने का सुझाव उनके सामने आया था. आदि शंकराचार्य की प्रतिमा स्थापना के लिए ओंकारेश्वर का चयन उनके गुरु की गुफा वहां स्थित होने के कारण किया गया.

आदि शंकराचार्य ने की थी चार पीठों की स्थापना

सनातन परंपरा में आदि शंकराचार्य को भगवान शिव के अवतार के रूप में देखा जाता है. गुरु के सान्निध्य में आदि शंकराचार्य ने चार वर्ष में अपना समूचा लेखन पूरा कर लिया. तभी वर्षा ऋतु प्रारंभ हो गई. पांच दिनों तक ओंकारेश्वर में हुई मूसलाधार वर्षा से नर्मदा में भीषण बाढ़ आ गई. गांव डूबने लगे, मकान गिरने और मनुष्य और पशु बहने लगे. इस भीषण आपदा से उत्पन्न मानव पीड़ा से द्रवित शंकराचार्य ने मां नर्मदा से की स्तुति में 'नर्मदाष्कम' का पाठ किया और बाढ़ उतरने लगी.

गुरु गोविंदपादाचार्य अपने शिष्य की यौगिक शक्ति देख कर संतुष्ट हुए और उन्हें बुलाकर चारों दिशाओं में वेदांत के अद्वैत सिद्धांत प्रतिपादित करने का आदेश दिया. संन्यासी को जनता पर आध्यात्म की वृष्टि करना चाहिए. सत्य का साक्षात्कार करने के बाद 'तेरे' 'मेरे' का भेद समाप्त हो जाता है. अब तक श्री शंकर 'सर्वज्ञत्व', की स्थिति तक पहुंच गए थे. उनकी दृष्टि में ब्रह्म और प्राणीमात्र में कोई भेद नहीं था. जाति प्रथा को वे ढकोसला मानते थे और प्राणी मात्र को ब्रह्म का स्वरूप देखने लगे थे.

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आदि शंकराचार्य ने गुरु की आज्ञा के बाद भारत को एक सूत्र में बांधने के लिए चारों दिशाओं में एक-एक पीठ की स्थापना की. उत्तर में ज्योतिर्मठ,पूर्व में गोवर्धन मठ, दक्षिण में शारदा पीठ और पश्चिम में द्वारका पीठ स्थापित है. इन पीठों के मुखिया के तौर पर शंकराचार्य मनोनीत किए गए.

रीवा में बनने थी पांचवी पीठ

मध्यप्रदेश के रीवा जिले में भी आदि शंकराचार्य प्रवास पर आए थे. यहां पुण्य-सलिला बीहर के तट पर एक आश्रम है पंचमठा. यह नाम बाद में दिया गया है. शंकराचार्य चारों मठ स्थापित करने के बाद काशी से प्रयाग होते हुए माहिष्मति की यात्रा में थे तब यहां उनका प्रवास हुआ. वे यहां एक सप्ताह रहे. वर्ष 1986 में कांची कामकोटि के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती जी अपने उत्तराधिकारी विजयेंद्र जी के साथ यहां प्रवास पर आए थे. अपना उत्तराधिकार सौंपने के पूर्व वे आदि शंकराचार्य जी के प्रदिक्षणा पथ की यात्रा में थे. पंचमठा का प्रवास इसी क्रम में था. कांची कामकोटि में आदिगुरु शंकराचार्य की यात्राओं और प्रवासों का यथार्थ वृतांत है उसमें रीवा शहर स्थित पंचमठा भी शामिल है.

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यह मठ ब्रह्मलीन स्वामी ऋषिकुमार संचालित करते थे. उनके शिष्य जिन्होंने स्वयं इस मठ में 40 साल बिताए डा. कुशल प्रसाद शास्त्री बताते हैं कि पंचमठा महानिर्वाणी अखाड़े के साधुओं का भी प्रवास स्थल रहा है. उज्जैन और प्रयाग के महाकुंभों के समय वो यहां लाव-लश्कर के साथ आते थे. उनके आने और प्रवास के पीछे भी शंकराचार्य का इस भूमि से जुड़ाव था. उन साधुओं के महामंडलेश्वर के पास एक ताम्रपत्र था जिसमें पूरा वृत्तांत उल्लेखित है. डॉ. शास्त्री ने जानकारी दी कि एक बार पुरी के शंकराचार्य निरंजन तीर्थ का भी पंचमठा प्रवास हुआ था. वो भी जगद्गुरु की स्मृतियों को सहेजने ही आए थे. पंचमठा का प्रसंग आदि गुरु के जीवन के उतरार्द्ध काल का है इसलिए न तो इसका ज्यादा महात्म्य बना और न ही जगदगुरू के पांचवें मठ के रूप में प्राण प्रतिष्ठा ही हो पाई.

मोदी मंत्र से मिली धातु संग्रहण का प्रेरणा

प्रतिमा के लिए धातु संग्रहण का आइडिया मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिला. प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर गुजरात में सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा स्थापित की जा रही है. इस प्रतिमा को स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का नाम दिया गया है. मध्यप्रदेश में आदि शंकराचार्य की प्रतिमा स्थापित करने के लिए निकाली जा रही यात्रा का नाम एकात्म है.

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आदि शंकराचार्य की प्रतिमा स्थापित करने के लिए धातु एकत्रित करने का काम काफी चुनौती पूर्ण है. सरकार ने इसका आसान रास्ता यह निकाला कि धातु देने के स्थान ग्रामीण यात्रा की अगवानी के समय एक कलश और मिट्टी दे दें. यात्रा के दौरान 140 स्थानों पर जन संवाद भी तय किया गया. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस जन संवाद में उपस्थित रहेंगे. इस जन संवाद के कारण ही यात्रा को अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी से भी जोड़कर देखा जा रहा है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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