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योगी की यूपी: तमाम कोशिशों के बावजूद यौन उत्पीड़न में अव्वल

जब कॉलेज की तरफ से भी लड़कियों को सपोर्ट नहीं मिलता, वहां भी भेदभाव का माहौल झेलना पड़े तब मुश्किल और बढ़ जाती है

Updated On: Sep 27, 2017 10:49 PM IST

Nidhi Nidhi

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योगी की यूपी: तमाम कोशिशों के बावजूद यौन उत्पीड़न में अव्वल

हमेशा ही लड़कियों को घर से बाहर नहीं निकलने की सलाह मिलती रही, घर से बाहर निकली तो सीधे स्कूल जाओ और वैसे ही घर वापस आने की सलाह मिल गई. वहां से निकल, कॉलेज तक पहुंची तो पेरेंट्स ने कैंपस के हॉस्टल में ही रहने की सलाह दी. किसी भी लड़की घरवाले अपनी बेटी को यूनिवर्सिटी के कैंपस में ही रखना पसंद करते हैं क्योंकि बाहर के हॉस्टल सेफ नहीं होंगे.

लेकिन जब यूनिवर्सिटी के अंदर से सुरक्षा नहीं मिल रही तो इसके लिए कौन जिम्मेवार होगा? हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट की मानें तो यूनिवर्सिटी में हो रहे सेक्सुअल हैरासमेंट के केस बढ़ते ही जा रहे हैं. इसमें ऊतर प्रदेश की यूनिवर्सिटीज में यौन उत्पीड़न के सबसे ज्यादा केस दर्ज हुए हैं.

यूपी में सबसे ज्यादा यौन उत्पीड़न के मामले

यूपी के बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में लड़कियों के साथ हुए छेड़छाड़ के मामले में यूपी सरकार की ओर से अभी तक कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया है. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने जबसे मुख्यमंत्री का पद संभाला है वे काफी सक्रीय दिखे हैं. उन्होंने अपने कार्यकाल के पहले महिने में ही उनके अनुसार लड़कियों की सुरक्षा के लिए एंटी रोमियो स्क्वाड का गठन किया था. लेकिन उनके राज्य की सम्मानित यूनिवर्सिटी बीएचयू की छात्राओं के साथ कैंपस के इलाके में छेड़छाड़ जैसे हादसे होते हैं लेकिन अभी तक सरकार की ओर से सुरक्षा पुख्ता करने के किसी भी तरह के वादे सामने नहीं आए.

बीएचयू के छात्रों ने जब इसके विरोध में धरना प्रदर्शन किया तो पुलिस ने उनपर लाठीचार्ज भी की. इस बार की घटना के बाद बेहद जरूरी है कि हम एक नजर देश की बाकी यूनिवर्सिटीज में भी लड़कियों के साथ हो रहे छेड़छाड़ के मामलों की रिपोर्ट पर भी डालें.

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हिंदुस्तान टाइम्स में छपी रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार हर 4 में से 1 हैरासमेंट के केस यूपी की यूनिवर्सिटीज से हैं. यूजीसी से लिए गए इस डेटा के अनुसार 1 अप्रैल 2016 से 31 मार्च 2017 के बीच किए गए सर्वे में 103 लड़कियों ने बताया कि वे छेड़छाड़ की शिकार हो चुकी हैं. इनमें 24 लड़कियां यूपी के कॉलेज से थीं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इनमें कोई भी बीएचयू से नहीं थीं.

ये मामले अलीगढ़ यूनिवर्सिटी, अम्बेडकर यूनिवर्सिटी और शारदा यूनिवर्सिटी और अन्य के आए हैं. बाकी के 16 मामले पंजाब और चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी से हैं, 8 मामले हरियाणा और 15 मामले केरल की कालीकट यूनिवर्सिटी से आए हैं. इनमें ईव-टीजिंग, स्टॉकिंग और गंदे मैसेज भेजने के मामले दर्ज कराए गए हैं. जिसमें साथ पढ़ने वाले छात्र लेकर टीचर के भी शामिल होने की बात बताई गई है.

एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली एनसीआर से एक छेड़छाड़ का मामला दर्ज कराया गया. जिसमें एक छात्रा को उसकी क्लास में साथ पढ़ने वाला लड़का स्टॉक कर रहा था. लड़की के शिकायत दर्ज कराने के बाद उस लड़के की काउंसलिंग की गई. साथ ही उसे लड़की से लिखित माफ़ी मांगनी पड़ी और उसे 20,000 रुपए का जुर्माना भी देना पड़ा.

यूनिवर्सिटी में भेदभाव का माहौल

जब कॉलेज की तरफ से भी लड़कियों को सपोर्ट नहीं मिलता, वहां भी भेदभाव का माहौल झेलना पड़े तब मुश्किल और बढ़ जाती है.

कॉलेज के अंदर जहां कोई लड़का या लड़की बराबर की योग्यता और जानकारी के साथ एक कॉलेज तक पहुंचते हैं. वहां कोई भी लड़की सिर्फ पढ़ने और अपने भविष्य के सपने लेकर जाती होगी. लेकिन यूनिवर्सिटी के हॉस्टल भी लड़कियों के जीने और रहने के तौर-तरीके की सीमा तय कर दी जाती है.

उन्हें बता दिया जाता है क्या करना है क्या नहीं, कहां जाना, कितने बजे तक जाना है, यहां तक किसी को सुनकर भी आश्चर्य हो कि खाना भी तय किया जाता है. जहां एक तरफ देश के पीएम डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं और दूसरी तरफ लड़कियों को यूनिवर्सिटी में इंटरनेट यूज करने की इजाजत नहीं है. कॉलेज में लाइब्रेरी से दूर रखा जाता है. उनके साथ हुई बदमाशी के बाद भी उन्हें ही सुनना पड़ता है कि वो इस वक्त बाहर क्यों निकली? उन्होंने ऐसे कपड़े क्यों पहने? फोन और इंटरनेट क्यों चलाया?

जरूरी है शिकायत दर्ज कराना

यूजीसी की ओर से शुरू किए गए इस सर्वे में यह सुविधा दी गई है कि पीड़ित के अलावा उसका कोई दोस्त, क्लासमेट भी या कोई तीसरा व्यक्ति भी उनकी तरफ से शिकायत दर्ज करा सकता है.

यूजीसी गाइडलाइन के अनुसार, ‘कोई भी छेड़छाड़ के मामले होते हैं तो शिकायत उसके तीन महिने के अंदर दर्ज कराने की सलाह दी गई है. आरोपी के दोषी पाए जाने के बाद उसे कॉलेज से निष्कासित किया जाएगा. साथ ही यूजीसी ने संस्थान में सेक्सुअल हैरासमेंट को लेकर वर्कशॉप और अवेयरनेस प्रोग्राम कराने की भी सलाह दी है.' क्योंकि ज्यादातर मामले तो सामने ही नहीं आ पाते. लड़की को सबसे पहले छेड़छाड़ होने पर खुद की इज्जत और लोगों के सामने आने डर होता है.

सामने आने के बाद भी प्रशासन का पूरा समर्थन नहीं मिलने का भी डर और अगर परिवार तक पहुंचे तब तो वहीं दफ्न हो जाते हैं. इसलिए सबसे पहले जरूरी ऐसे मामलों में लड़की का खुलकर सामने आना.

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