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रिश्वत से लेकर पशु तस्करों की मदद तक, इन आरोपों की वजह से गई आलोक वर्मा की कुर्सी!

कमिटी ने रिश्वतखोरी और ड्यूटी में लापरवाही के आरोपों के आधार पर आलोक वर्मा को हटाने का फैसला किया. 55 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब सीबीआई चीफ को उनके पद से हटाया गया हो

Updated On: Jan 11, 2019 01:52 PM IST

FP Staff

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रिश्वत से लेकर पशु तस्करों की मदद तक, इन आरोपों की वजह से गई आलोक वर्मा की कुर्सी!

सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली हाई पावर सेलेक्शन कमिटी ने गुरुवार को उनके पद से हटा दिया. इस कमिटी में प्रधानमंत्री के अलावा लोकसभा के विरोधी दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और जस्टिस एके सीकरी शामिल थे. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के प्रतिनिधि के तौर पर जस्टिस एके सीकरी बैठक में आए हुए थे.

कमिटी ने रिश्वतखोरी और ड्यूटी में लापरवाही के आरोपों के आधार पर आलोक वर्मा को हटाने का फैसला किया. 55 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब सीबीआई चीफ को उनके पद से हटाया गया हो. वर्मा का कार्यकाल 31 जनवरी को खत्म होने वाला था.

वर्मा पर लगे आरोपों का की सीवीसी जांच कर रही थी. उनपर रिश्वतखोरी से लेकर पशु तस्करों की मदद करने के आरोप हैं. इन्हीं आधार पर उनके खिलाफ यह फैसला लिया गया. वर्मा को पद से हटाने के बाद एक बार फिर से नागेश्वर राव को सीबीआई चीफ बनाया गया है. आइए जानते हैं, कौन हैं वो आरोप जिनमें चल रही है जांच...

आईआरसीटीसी मामला

न्यूज-18 की खबर के मुताबिक, सीवीसी आलोक वर्मा के खिलाफ 10 बड़े आरोपों की जांच कर रही थी. इनमें से चार में उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत भी मिले थे. आरोप है कि लालू यादव से जुड़े इस केस को भी प्रभावित करने की कोशिश की गई थी. इस केस में एक अफसर को बचाने के लिए उसका नाम एफआईआर में शामिल नहीं किया गया.

मीट कारोबारी मोइन कुरैशी से ली रिश्वत

सीवीसी को यह भी सबूत मिले कि मोइन कुरैशी के खिलाफ जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई थी. उनपर कुरैशी के करीबी सतीष बाबू सना के जरिए दो करोड़ रुपए की रिश्वत लिए जाने के भी सबूत थे. दावा किया गया कि सीबीआई टीम इस केस में हैदराबाद के कारोबारी सतीश बाबू सना को इस मामले में आरोपी बनाना चाहती थी, लेकिन वर्मा ने मंजूरी नहीं दी. इस पूरे मामले में वर्मा की भूमिका संदेहास्पद थी.

रांची बैंक फ्रॉड

सीबीआई के जॉइंट डायरेक्टर राजीव सिंह के भाई संजय सिंह ने किसी काम के लिए इलाहाबाद बैंक से लोन लिया था. राजीव सिंह इसके गारंटर थे. लोन लेने के लिए राजीव सिंह ने बैंक को फर्जी डॉक्यूमेंट दिए थे. लेकिन, इसकी जानकारी होते हुए भी आलोक वर्मा ने बतौर सीबीआई चीफ कोई एक्शन नहीं लिया. ये ड्यूटी में उनकी लापरवाही को दर्शाता है.

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इसको आलोक वर्मा ने इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) को ट्रांसफर कर दिया था. इसके साथ ही राजीव सिंह को वो ओहदा दे दिया था, जिससे वह केस पर नजर बनाए रख सके.

हरियाणा जमीन मामला

सीवीसी के मताबिक, गुरुग्राम में एक जमीन खरीदने के मामले में भी वर्मा का नाम सामने आया था. इस डील में 36 करोड़ रुपये का लेनदेन होने का आरोप है. राकेश अस्थाना इसके पहले कई बार आरोप लगा चुके हैं कि आलोक वर्मा और जॉइंट डायरेक्टर एके शर्मा गुरुग्राम में टाउन प्लानिंग और रियल इस्टेट कंपनी के संपर्क में हैं.

यह भी पढ़ें- CBI की पवित्रता बनाए रखने की कोशिश की थी, फर्जी आरोपों पर हुआ तबादला: आलोक वर्मा

सोना तस्कर की मदद का आरोप

आलोक वर्मा पर एक केस में सोना तस्कर की मदद करने का आरोप भी है. सीवीसी ने इस मामले में कहा है कि आरोप आंशिक रूप से प्रमाणित हैं.

दागी अफसरों की नियुक्ति

आलोक वर्मा पर यह भी आरोप है कि उन्होंने सीबीआई डायरेक्टर रहते हुए दागी अफसरों की नियुक्ति की. इस मामले को लेकर अस्थाना ने कैबिनेट सेक्रेटरी के नाम से चिट्ठी भी लिखी थी.

ईडी के मामले में दखल देने का आरोप

सीबीआई में नंबर दो की हैसियत रखने वाले राकेश अस्थाना ने आरोप लगाया था कि वर्मा रॉ द्वारा पकड़े गए फोन कॉल के इंटरसेप्ट्स को बचाने की कोशिश कर रहे थे और ईडी के केस को प्रभावित करना चाहते थे.

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