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ABP-CSDS survey: अपनी खोई हुई जमीन हासिल किए बिना BJP को नहीं हरा सकती कांग्रेस

बीजेपी को तब तक नहीं हराया जा सकता, जब तक कांग्रेस अपनी खोयी हुई जमीन न हासिल कर ले

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: May 26, 2018 02:21 PM IST

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ABP-CSDS survey: अपनी खोई हुई जमीन हासिल किए बिना BJP को नहीं हरा सकती कांग्रेस

देश के मूड पर सीएसडीएस-लोकनीति के हालिया सर्वे ने हमारे उस शक पर मुहर लगा दी है, जो हम हमेशा सोचा करते थे. वो शक था कि 2019 के आम चुनाव में संयुक्त विपक्ष में एनडीए को सत्ता से हटाने की ताकत नहीं है. सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे के मुताबिक, अगर अभी चुनाव हों तो एनडीए 274 सीटें जीत लेगा. वहीं तमाम गठबंधनों के बावजूद विपक्ष सरकार बनाने के लिए जरूरी सीटों के करीब भी नहीं पहुंच सकेगा.

देश की राजनीति में एनडीए के प्रभुत्व की वजह साफ है. यूपी को छोड़ दें, तो कहीं भी विपक्ष की एकजुटता कोई जमीनी असर नहीं छोड़ पा रही है. उत्तर प्रदेश के अलावा और किसी भी राज्य में संयुक्त विपक्ष नतीजों को बदलने वाला असर डालने में नाकाम दिख रहा है. बाकी सभी राज्यों में विपक्ष की एकता या तो काम नहीं कर रही है, या फिर बीजेपी के अपने चुनावी सहयोगी विरोधियों के मुकाबले ज्यादा ताकतवर हैं. साफ है कि विपक्ष की एकजुटता अभी भी हकीकत से ज्यादा खयाली पुलाव है. वो अभी ऐसी चुनावी मशीन के तौर पर सामने नहीं आ सका है, जो पीएम मोदी को हरा सके.

क्षेत्रीय दलों में इतनी ताकत नहीं, कांग्रेस को होना होगा मजबूत

इस सर्वे से जुड़े नतीजों से कई नए परिदृश्य बनते दिख रहे हैं. बीजेपी को तब तक नहीं हराया जा सकता, जब तक कांग्रेस अपनी खोयी हुई जमीन न हासिल कर ले. क्षेत्रीय दलों की अपनी ताकत अभी उतनी नहीं है. क्षेत्रीय दलों की ताकत में जब तक कांग्रेस की अपनी जमीनी ताकत का मेल नहीं होगा, बात नहीं बनेगी. आखिर 2019 में विपक्षी एकजुटता से कितने सांसद जीत सकेंगे? पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के पास अब जीतने के लिए कुछ खास नहीं है. 2014 में टीएमसी ने 34 लोकसभा सीटें जीती थीं. बाकी दलों ने सिर्फ 8 सीटों पर जीत हासिल की थी. इनमें से 4 कांग्रेस के पास गई थीं. यहां पर पिछली बार 2 सीट जीतने वाली बीजेपी के पास ही जीत के लिए पूरा मैदान खुला दिखाई देता है. यहां बाकी सभी दल एकजुट भी हो जाते हैं, तो बीजेपी के पास हारने के लिए कुछ नहीं है. इसी तरह 2014 के चुनाव के बाद बंटे आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बीजेपी ने केवल 3 सीटें जीती थीं. अब अगर इन राज्यों में टीडीपी और टीआरएस बीजेपी विरोधी महागठबंधन का हिस्सा बन भी जाते हैं, तो बीजेपी को क्या नुकसान होगा? खास तौर से तब और जब वायएसआर कांग्रेस, बीजेपी से हाथ मिला ले?

बात ये है कि क्षेत्रीय दलों के पास तब तक जीतने के लिए कुछ नहीं है, जब तक खुद कांग्रेस अपनी ताकत में इजाफा नहीं करती. ये सर्वे के दो नतीजों से साफ है. पहली तो ये कि पूर्वोत्तर में बीजेपी बहुत ताकतवर हो गई है. कभी यहां पर कांग्रेस का बोलबाला था. लेकिन अब ये पूर्वोत्तर के राज्यों में बहुत मामूली सियासी खिलाड़ी रह गई है. अपने पुराने गढ़ में कांग्रेस के इस हाल का मतलब है कि विपक्षी एकता से जिन राज्यों में बीजेपी को नुकसान होगा, उसकी भरपाई वो पूर्वोत्तर में अपनी बढ़ी हुई सियासी हैसियत से कर लेगी. जिन राज्यों में कांग्रेस की वापसी के संकेत हैं, वहां भी इसका सीधा मुकाबला बीजेपी से ही है. गुजरात जैसे राज्यों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच फासला इतना बड़ा है कि ज्यादा वोट हासिल करने के बाद भी कांग्रेस को नुकसान ही होगा.

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साथ ही, बीजेपी 2014 के आम चुनाव के बाद लगातार नए इलाकों में अपना विस्तार कर रही है. जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट से साफ है. बीजेपी की ये बढ़त उन पार्टियों की कीमत पर हुई है, जो सत्ता की रेस में नहीं हैं. तो, इसका क्या मतलब है? क्या बीजेपी अजेय है?

बीजेपी के खिलाफ बन रहा है माहौल

विपक्ष के लिए अच्छी खबर ये है कि अभी आम चुनाव एक साल दूर हैं. और बीजेपी सरकार के खिलाफ साफ तौर पर माहौल बनता दिख रहा है. जैसे कि उत्तर प्रदेश में एक साल पहले ही विधानसभा चुनाव में समूचे विपक्ष का सफाया करने वाली बीजेपी के वोट शेयर में काफी गिरावट आई है. इसी तरह राजस्थान और मध्य प्रदेश में बीजेपी की लोकप्रियता घट रही है. इन तीनों राज्यों से कुल मिलाकर 134 सांसद आते हैं. यूपी से 80, एमपी से 29 और राजस्थान से 25 सांसद चुने जाते हैं. 2014 में एनडीए ने इन तीनों राज्यों से कुल मिलाकर 125 सीटें जीती थीं. अगर बीजेपी का पतन ऐसे ही जारी रहा, तो इन राज्यों से बीजेपी की सीटें काफी कम हो सकती हैं.

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एक और फैक्टर जो विपक्ष के महागठबंधन के लिए कारगार हो सकता है, वो है-कर्नाटक में जेडीएस-कांग्रेस का और असम में कांग्रेस-एआईडीयूएफ का गठजोड़. ऐसे रणनीतिक गठबंधन बीजेपी की सीटों को घटाकर एनडीए को लोकसभा में बहुमत के आंकड़े से नीचे ला सकते हैं. साथ ही अगर बीजेपी का महाराष्ट्र में शिवसेना से गठबंधन टूटता है और मुकाबला बीजेपी बनाम शिवसेना बनाम कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन होता है, तो इससे भी बीजेपी को काफी नुकसान हो सकता है. सर्वे के मुताबिक महाराष्ट्र में एनडीए गठबंधन को 48 फीसद और यूपीए को 40 फीसद वोट मिल सकते हैं. लेकिन ऐसा तभी होगा, जब बीजेपी और शिवसेना साथ मिलकर चुनाव लड़ें.

राजनीति में सारा खेल हां-ना की अटकलों और ऐसा होता तो, वैसा न होता तो का होता है. तो, हम अगर ये सोचें कि अगर बीजेपी ने नीतीश कुमार से गठबंधन करके उन्हें 2019 में पीएम पद पर दावेदारी करने से न रोका होता तो क्या होता? अगर नीतीश कुमार आरजेडी-कांग्रेस का साथ छोड़कर बीजेपी के साथ न आते तो? ऐसा होता तो इस बात की पूरी संभावना है कि जेडी यू-आरजेडी और कांग्रेस के गठबंधन ने बिहार की सभी 40 लोकसभा सीटें जीत ली होतीं. इससे 2019 में सरकार बनाने में विपक्ष का पलड़ा निश्चित रूप से भारी होता. ऐसा होता तो एनडीए की संख्या 240 के आस-पास ही रह जाती.

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