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आरुषि हत्याकांड: क्या कभी पता चल पाएगा किसने ली थी मासूम की जान?

ये भारतीय न्याय प्रणाली और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर कलंक ही है कि उसने 2 जिंदगियों के 9 साल और एक मृत इंसान का आत्मसम्मान छीन लिया

Updated On: Oct 12, 2017 07:10 PM IST

Tulika Kushwaha Tulika Kushwaha

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आरुषि हत्याकांड: क्या कभी पता चल पाएगा किसने ली थी मासूम की जान?

देश का सबसे ज्यादा चर्चित हत्याकांड आरुषि-हेमराज हत्याकांड पर गुरुवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने अपने बेटी की हत्या का आरोप झेल रहे तलवार दंपत्ति को बरी कर दिया है. उन्हें बेनेफिट ऑफ डाउट के चलते बरी किया गया. यानी सीबीआई तलवार दंपत्ति पर लगाए अपने आरोपों को सबूतों के अभाव में साबित नहीं कर पाई है.

ये तो रहा फैसला, अब बात करिए उन 9 सालों की जिन्होंने, नोएडा के एक परिवार की पूरी जिंदगी तबाह कर दी. अगर पुलिस, सीबीआई या मीडिया की जांच और रिपोर्टिंग का रुख कुछ और होता तो क्या आज हालात कुछ अलग नहीं होते?

देश के सबसे जटिल मर्डर केसों में शामिल आरुषि मर्डर केस के सबके सामने आने के बाद से ही जांच और अनुमानों का सिलसिला शुरू हुआ लेकिन इसके अलावा इस केस का एक पहलू था, जिसने इस पूरे मामले को सनसनी बना दिया और मीडिया को मसाला खबरें चलाने का मौका दे दिया.

पुलिस और मीडिया का असंवेदनशील रवैया

जांच में शुरू से ही सबकी नजरें नौकर हेमराज पर थीं. बाद में ये बात भी उड़ने लगी कि आरुषि और हेमराज के बीच नाजायज संबंध थे. इस बात ने इस पूरे मामले पर काली स्याही पोत दी. जो घटना एक मर्डर का केस बने रह सकती थी, वो अवैध संबंध, तलवार दंपत्ति की बदचलनी, 14 साल की लड़की का गलत कैरेक्टर के अलावा ऑनर किलिंग का मसाला बन गया. और इन सारी बातों ने इस मामले को और उलझाया ही.

मीडिया ने इस पूरे मामले में केस को सुलझाने वाली बातों या आरोपी का पता लगाने वाले पहलुओं पर ध्यान लगाने के बजाय आरुषि-हेमराज के अवैध संबंधों पर ही फोकस करना अपना धर्म समझा. इस दौरान एक 14 साल की लड़की को लेकर इतनी वाहियात बातें छपीं, इतने घटिया आरोप लगाए गए कि अगर आरुषि खुद इन आरोपों के बारे में सुनती तो उसे विश्वास नहीं होता.

सीबीआई की पीसी ने बढ़ाया मामला

इस घटना के अवैध संबंधों का पहलू उठाने में पुलिस मीडिया से कहीं ज्यादा जिम्मेदार थी. गुरुवार को कोर्ट के सामने अपने चार्ज प्रूव नहीं कर पाई सीबीआई ने ही उस वक्त बाकायदा प्रेस कॉफ्रेंस करके आरुषि के हेमराज के साथ अवैध संबंधों पर मुहर लगाया था.

इसी पीसी में तलवार दंपत्ति पर वाइफ स्वैपिंग का आरोप लगाया था. इस पीसी में कहा गया कि पार्टियों में जाने और वाइफ स्वैपिंग जैसे मामलों से जुड़े माता-पिता को देखकर आरुषि बिगड़ गई थी और अपने माता-पिता के नक्शे-कदम पर चलने लगी थी. और इसी वजह से उसके अपने नौकर हेमराज से संबंध थे. क्या आज सबूतों के अभाव में आज हार गई सीबीआई के पास उस वक्त सबूत थे? अगर थे तो क्या इन बीते सालों में हवा हो गए?

जांच में एक थ्योरी सामने आई थी. कहा गया था कि राजेश तलवार के सहायक कृष्णा ने आरुषि और हेमराज की हत्या कर दी थी क्योंकि हेमराज ने कृष्णा और दूसरे सहायक राजकुमार को आरुषि के साथ छेड़छाड़ करने पर आपत्ति जताई थी.

एक थ्योरी ये भी थी कि आरुषि अपने पिता राजेश तलवार के किसी दूसरी डॉक्टर की पत्नी के साथ संबंध को लेकर तनाव में थी, इसलिए उसने हेमराज के साथ संबंध बनाए.

आरुषि ही थी घेरे में

थ्योरी चाहे कितनी ही क्यों न सामने आई हों, लेकिन सबमें कीचड़ आरुषि पर ही उछाला गया था. उस वक्त पुलिस और मीडिया ने ऐसा बरताव किया था जैसे, आरुषि एक बालिग बदचलन औरत हो. एक टीवी चैनल ने कहीं से आरुषि का एमएमएस भी ढूंढ लिया था, जिसमें आरुषि कहीं दिखाई नहीं दी थी

कुछ दिनों पहले डेरा सच्चा सौदा के चीफ गुरमीत राम रहीम की करीबी हनीप्रीत के नाम पर जैसा कीचड़ उछाला जा रहा था, उससे भी बदतर रवैया आरुषि के प्रति अपनाया गया था. एक 14 साल की बच्ची के साथ.

क्या एक जिंदा इंसान के साथ ऐसे पेश आया जा सकता था?

एक बात सोचे जाने लायक है कि अगर कोई नाबालिग लड़की किसी अवैध संबंध में फंस जाए, तो क्या किया जाना चाहिए? क्या उसे सबके सामने लाकर उसकी बेइज्जती की जानी चाहिए? क्या उसके लिए उसके साथ वैसा बरताव होना चाहिए जैसा आरुषि के साथ हुआ? अगर आरुषि जिंदा होती तो शायद उसे काउंसलिंग की जरूरत होती. लेकिन चूंकि वो मर चुकी थीं और मां-बाप उसकी हत्या के आरोप में जेल में बंद थे, इसलिए उस पर जी भर कर कीचड़ उछाल लिया गया.

लेकिन 'सच' की लड़ाई लड़ रहे और दोषी को अपने शिकंजे में कसने के दावे करने वाली पुलिस, सीबीआई और मीडिया ने इन 9 सालों में जितनी जिंदगियां बर्बाद कर दी, उनसे उनका हिसाब तो कोई मांगने वाला नहीं रहा न. अब जो हो गया वो हो गया.

बेनेफिट ऑफ डाउट के चलते आज बरी हो गए तलवार दंपत्ति अगर सच में निर्दोष हैं तो ये भारतीय न्याय प्रणाली और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर कलंक ही है कि उसने 2 जिंदगियों के 9 साल और एक मृत इंसान का आत्मसम्मान छीन लिया.

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