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जो कभी तालियां बटोरता था, वो आज तालियां क्यों बजा रहा है

कपिल मिश्रा की बगावत के वक्त ही केजरीवाल ने कुमार विश्वाास को ठिकाने लगाने का मन बना लिया था, उन्हें इंतजार था सही वक्त का

Sumit Kumar Dubey Sumit Kumar Dubey Updated On: Nov 03, 2017 01:40 PM IST

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जो कभी तालियां बटोरता था, वो आज तालियां क्यों बजा रहा है

गुरुवार को दिल्ली के सत्ताधारी दल यानी आम आदमी पार्टी की नेशनल काउंसिल की मीटिंग की शुरू हुई. इस मीटिंग से पहले ही पार्टी के विधायक अमानतुल्ला खां के निलंबन की वापसी और मीटिंग के वक्ताओं की लिस्ट में पार्टी नेता कुमार विश्वास गैरमौजूदगी ने इशारा कर दिया है कि कुमार अब केजरीवाल ‘ विश्वास’ पूरी तरह से खो चुके हैं. ऐसे में अब कुमार विश्वास का राजनीतिक करियर भी हिचकोले खाता दिख रहा है.

एक वक्त भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी  में कुमार विश्वास की भूमिका बेहद अहम थी. साल 2011-12 में अन्ना हजारे की अगुआई में चले इस आंदोलन में कुमार विश्वास हर बड़े फैसले का हिस्सा हुआ करते थे. अपनी वाकपटुता और हाजिर जवाबी के चलते हिंदी के कवि कुमार विश्वास ने अन्ना-केजरीवाल की जोड़ी के इस आंदोलन के लिए जनता की खूब तालियां बटोरी थीं.

केजरीवाल के साथ अन्ना हजारे के मोहभंग होने और आम आदमी पार्टी के गठन के बाद पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह और पूर्व आईपीएस किरण बेदी के बीजेपी के खेमे में चले जाने के बावजूद कुमार विश्वास केजरीवाल के साथ ही रहे. हालांकि इस दौरान भी उनपर बीजेपी के लिए सॉफ्ट कॉर्नर रखने के आरोप लगते रहे थे लेकिन आम आदमी पार्टी में उनकी हैसियत कम नहीं हुई. बड़े से बड़े मसलों पर पार्टी का राय की व्यक्त करने के लिए कुमार विश्वास को ही आगे किया जाता था .

पार्टी के भीतर केजरीवाल के बाद कुमार विश्वास को दूसरा सबसे बड़ा मास अपील वाला नेता समझा जाता था. इसकी बानगी 2014 के लोकसभा चुनाव में भी दिखी थी जब केजरीवाल बनारस में नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने उतरे और कुमार विश्वास को अमेठी राहुल गांधी के खिलाफ पार्टी का प्रत्याशी बनाया गया.

अति महत्वाकांक्षा ने किया कुमार विश्वास का नुकसान?

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद साल 2015 आम आदमी पार्टी के लिए बेहद अहम था. पार्टी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थी. केजरीवाल का राजनीतिक भविष्य दांव पर था. आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में बीजेपी के विजय रथ को रोककर ऐतिहासिक जीत हासिल की और पार्टी के एकछत्र बॉस के तौर पर केजरीवाल की स्थिति बेहद मजबूत हो गई.

इसी दौरान केजरीवाल के नेतृत्व को चुनौती दे रहे वकील प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया लेकिन विश्वास वक्त की नजाकत को समझते हुए पार्टी में ही बने रहे.

इसके बाद पंजाब विधानसभा चुनाव और दिल्ली नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी की हार हुई तो फिर विश्वास ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बात करना शुरू कर दिया. पार्टी सूत्रों का दावा है कि यही वह वक्त था जब कुमार विश्वास के मन में पार्टी का नेतृत्व हासिल करने की भावना पैदा हो गई थी.

इस बीच पार्टी विधायक अमानतुल्ला खां ने कुमार विश्वास को आरएसएस का एजेंट तक कह दिया. खबरें तो यहां तक आईं कि कुमार विश्वास, बीजेपी से सहयोग से आम आदमी पार्टी का रातोंरात तख्तापलट करके कपिल मिश्रा को मुख्यमंत्री बनाकर, खुद केजरीवाल को बेदखल करके पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक बनने की योजना बना रहे थे.

हालांकि बाद में विश्वास ने इसका खंडन किया और केजरीवाल ने उसे मान लिया. दिल्ली नगर निगम में हार के बाद केजरीवाल उस वक्त बेहद कमजोर थे. कुमार को संतुष्ट करने के लिए अमानतुल्ला खां को निलंबित भी कर दिया गया. लेकिन पार्टी के भीतर यह माना जाता है विधायक कपिल मिश्रा ने जब केजरीवाल के खिलाफ बगावत की तो उसे कम से कम कुमार विश्वास का भी मौन समर्थन हासिल था.

बेहद चतुराई से केजरीवाल ने किया विश्वास को किनारे

केजरीवाल को करीब से जानने वाले लोग कहते है कि वह पीएम मोदी की ही तरह किसी बात को भूलते नहीं हैं. केजरीवाल, कपिल मिश्रा की बगावत में कुमार विश्वास की भूमिका को अब भी संदेह की नजर से देखते हैं. और उसी वक्त उन्होंने कुमार विश्वास को ठिकाने लगाने की का मन बना लिया था. लेकिन वह कुमार विश्वास को सहानुभूति हासिल करने का कोई मौका देना नहीं चाहते थे.

साथ ही उन्हें प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के निष्कासन के बाद मीडिया में हुई छीछालेदर भी याद थी. लिहाजा केजरीवाल ने कुमार विश्वास को पार्टी से निकालने की बजाय उन्हें पार्टी के भीतर ही रखकर उनकी हैसियत को छोटा करने का खेल खेला.

केजरीवाल की रणनीति का शिकार बने विश्वास

केजरीवाल के लिए यह खेल नया नहीं है. इससे पहले वह दिल्ली में अपना दाहिना हाथ रह चुके आशीष तलवार और पंजाब के चुनाव के उप प्रभारी रहे दुर्गेश पाठक के साथ यह दांव सफलतापूर्वक आजमा चुके हैं.

दिल्ली में पार्टी के कामकाज पर इकतरफा पकड़ रखने वाले आशीष तलवार को दिल्ली नगर निगम में मिली हार के बाद केजरीवाल ने दिल्ली से हटाकर कर्नाटक का प्रभारी बनाकर शक्तिहीन कर दिया. वहीं पंजाब में पार्टी के सर्वेसर्वा रहे दुर्गेश पाठक की हैसियत आज पार्टी में कहीं नहीं है.

केजरीवाल ने ऐसा ही दांव कुमार विश्वास के साथ भी चला. कपिल मिश्रा की बगावत से निपटने के बाद उन्हें राजस्थान का पार्टी प्रभारी बनाकर आम आदमी पार्टी की ताकत के केंद्र यानी दिल्ली से दूर कर दिया. विश्वास ने अनमने ढंग से इस जिम्मेदारी की कबूल तो कर लिया लेकिन अब तक राजस्थान में उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों का महज एक मीटिंग ही ली है.

केजरीवाल को सही वक्त का था इंतजार

कुमार विश्वास को राजस्थान की जिम्मेदारी सौंपकर उन्हे दिल्ली से दूर तो कर दिया था अब केजरीवाल को उस सही वक्त का इंतजार था जब कुमार विश्वास घटे हुए कद का अहसास कराया जाए. यह सही वक्त मुहैया कराया दिल्ली की बवाना सीट पर हुए उप चुनाव ने.

बीजेपी की तमाम कोशिशों के बावजूद आम आदमी पार्टी दो महीने पहले बवाना उपचुनाव जीतने में कामयाब रही. इस जीत ने पार्टी कैडर के हौसले के साथ-साथ केजरीवाल की इमेज को भी पुख्ता कर दिया. इसके बाद बारी आई नेशनल काउंसिल की मीटिंग की.

इससे पहले चार बार आम आदमी पार्टी की नेशनल काउंसिल की मीटिंग हुई है. चारों ही बार या तो कुमार विश्वास ने मीटिंग में संचालक की भूमिका निभाई या फिर वह वक्ताओं की लिस्ट में शामिल थे. इस बार अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया संजय सिंह, गोपाल राय और आशुतोष की मीटिंग में वक्ता की भूमिका में हैं.

ज्यादा वक्त नहीं बीता है जब कुमार विश्वास को दिल्ली से राज्यसभा सीट का प्रमुख दावेदार माना जाता था. अगले ही साल यानी 2018 में वह मौका भी आएगा. देखते हैं तब तक कुमार विश्वास क्या फैसला लेते हैं. क्या वह केजरीवाल को विश्वास फिर से हासिल कर पाएंगे? या बीजेपी में शमिल होंगे या फिर इसी तरह पार्टी की मीटिंग में ताली बजाने वाले नेताओं की कतार में ही बैठे रहेंगे. हालांकि ऐसी खबरें आई हैं कि गुरुवार को बैठक के समय आनन-फानन में कुमार विश्वास का नाम वक्ताओं की लिस्ट में जोड़ा गया है.

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