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कश्मीर: नोटबंदी से भी कम नहीं हुईं हैं घाटी में आतंकी घटनाएं

सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि कश्मीर में आतंकियों से सहानुभूति रखने वालों और ओजीडब्ल्यू के जरिए फंडिंग लगातार जारी है

Ishfaq Naseem Updated On: Nov 04, 2017 09:37 AM IST

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कश्मीर: नोटबंदी से भी कम नहीं हुईं हैं घाटी में आतंकी घटनाएं

नोटबंदी से आतंकवाद पर लगाम लगाने में सफलता मिलने के सरकारी दावे के उलट कश्मीर में लगातार आतंकी हमले जारी हैं. लोग पत्थरबाजी का सहारा ले रहे हैं ताकि मुठभेड़ वाली जगहों से आतंकियों को भागने में मदद मिल सके. यह साफ है कि ओवर-ग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यू) और आतंकियों के समर्थकों का तगड़ा नेटवर्क अभी भी मौजूद है. इसकी वजह से इन्हें पैसों की लगातार सप्लाई मिल रही है.

भले ही बेहतर सुरक्षा निगरानी से आतंकियों के लिए आम लोगों से चंदे के जरिए खुलेआम पैसा जुटाना आसान नहीं रहा है, लेकिन सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि कश्मीर में आतंकियों से सहानुभूति रखने वालों और ओजीडब्ल्यू के जरिए फंडिंग लगातार जारी है. 1990 के दशक में आतंकी खुलेआम आम लोगों से चंदा इकट्ठा किया करते थे.

अधिकारियों के मुताबिक, आतंकी संगठनों से जुड़ने वाले युवाओं की संख्या पर कोई लगाम नहीं लगी है और नोटबंदी से घाटी में आतंकवाद की घटनाओं पर कोई रोक नहीं लगी है. गृह मंत्रालय और जम्मू और कश्मीर पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, 2013 में 53 सुरक्षा बलों के जवान शहीद हुए थे और 67 आतंकी मारे गए थे. 2014 में यह संख्या क्रमशः 47 और 110 थी. 2015 में यह आंकड़ा 39 और 108 का था. 2016 में यह एक बार फिर बढ़कर 82 और 150 पर पहुंच गया.

इस साल अब तक 160 आतंकी मारे गए हैं, जबकि शहीद होने वाले सुरक्षा बलों के जवानों की संख्या 40 पर पहुंच गई है. पुलिस महानिदेशक एस. पी. वैद्य ने कहा कि जनवरी से अब तक शहीद होने वाले सुरक्षा बलों में 24 पुलिस के जवान हैं.

Kashmir violance 2

नोटबंदी के बाद बैंकों में डकैती डालने को मजबूर हुए थे आतंकी

सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक, नोटबंदी के बाद आतंकवादियों को कुछ वक्त के लिए पैसों की तंगी हुई, इसके चलते वे बैंकों में डकैती डालने के लिए मजबूर हुए, लेकिन इनकी फंडिंग का मुख्य जरिया स्थानीय कारोबार हैं. पुलिस ने पहले खुलासा किया था बैंकों में डकैतियों के पीछे कि लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) और हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादियों का हाथ है.

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10 सितंबर को सरकारी बलों ने शोपियां के बारबुग इलाके में हिजबुल के दो आतंकियों को मार गिराया, जबकि तीसरे आतंकवादी ने आत्मसमर्पण कर दिया. एक उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारी ने कहा कि मारे गए आतंकवादियों में तारिक अहमद बट्ट इस साल 16 फरवरी को शोपियां के तर्कवांगम इलाके में बैंक में लूट की घटना में शामिल था.

मास्क लगाए हुए चार बंदूकधारियों ने एक बैंक से तीन लाख रुपए लूट लिए थे. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, साउथ कश्मीर के शोपियां, कुलगाम और पुलवामा में बैंक लूट की घटनाओं में खासी बढ़ोतरी हुई. अधिकारियों के मुताबिक, शोपियां में बैंक लूट की कम से कम छह घटनाएं हुईं, कुलगाम में भी इस तरह की करीब आधा दर्जन घटनाएं हुईं.

लेकिन, पुलिस अधिकारियों का कहना है कि आतंकवादी हथियारों और पैसों के लिए बड़े पैमाने पर ओजीडब्ल्यू पर निर्भर हैं. 24 सितंबर को सुरक्षा बलों को तारिक को साउथ कश्मीर में मार गिराने के कुछ दिनों बाद ही हिजबुल के लिए काम करने वाले दो युवा गिरफ्तार किए गए.

इनका नाम वाहीद अहमद बट्ट और मुहम्मद शफी मीर है. ये हिजबुल के डिवीजनल कमांडर परवेज अहमद वानी के लिए काम करते थे. वानी को कश्मीर के सोपोर में सितंबर में मार गिराया गया था. पुलिस को इनके कब्जे से हैंड ग्रेनेड्स और अन्य गोला-बारूद भी मिला.

बुरहान की मौत के विरोध में कशमीर में प्रदर्शन (REUTERS)

बुरहान की मौत के बाद, कशमीर में हो रहा विरोध प्रदर्शन (REUTERS)

बुरहान के मारे जाने के बाद आतंकियों को बढ़ा लोगों का सपोर्ट 

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘ओजीडब्ल्यू न केवल हथियारों एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाते हैं, बल्कि ये आतंकियों को कुछ घरों में टिकने का बंदोबस्त भी करते हैं और उनके लिए पैसों का इंतजाम करते हैं.’ अधिकारियों का कहना है कि गुजरे एक साल में हिजबुल आतंकी कमांडर बुरहान मुजफ्फर वानी के मारे जाने के बाद आतंकियों के लिए लोगों का सपोर्ट बढ़ा ही है, जिसके चलते इन्हें अपने समर्थकों का नेटवर्क बढ़ाने में मदद मिली है.

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शोपियां के एसपी ए. एस. दिनकर ने कहा, ‘आतंकियों के पास पैसों की किल्लत है, लेकिन वे इसके लिए खुद से सहानुभूति रखने वालों पर निर्भर हैं. नोटबंदी एक फैक्टर था जिसकी वजह से आंशिक तौर पर उनके लिए कैश की कमी पैदा हुई, लेकिन हकीकत में बड़े आतंकवादियों के मारे जाने से इन्हें पैसों की तंगी हो रही है. पैसों की डील्स आतंकी कमांडर करते हैं. हमने कई कमांडरों को मार गिराया है, जिसके चलते इन्हें फंड की किल्लत हो रही है.’

जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के पूर्व चीफ कमांडर जावेद अहमद मीर ने कहा, ‘कश्मीर में आजादी का आंदोलन पब्लिक सपोर्ट पर चल रहा है.’ उन्होंने कहा कि जब 1989 में आतंकवाद की शुरुआत हुई, उसके बाद से यह आंदोलन लोगों के दिए जाने वाले कैश के बूते चल रहा है.

मीर 1979 में स्टूडेंट्स लीग से जुड़कर अलगाववादी आंदोलन का हिस्सा बने. उन्होंने कहा कि आतंकवाद के लिए पब्लिक सपोर्ट कमजोर नहीं पड़ा है और ये फंड के लिए अपने समर्थकों पर निर्भर हैं. 

Rajnath Singh

(फोटो: पीटीआई)

राजनाथ सिंह के दावों में नहीं है सच्चाई

उन्होंने कहा, ‘गृह मंत्री राजनाथ सिंह गलत कह रहे हैं कि नोटबंदी के बाद कश्मीर में आतंकी घटनाओं में कमी आई है. दमनात्मक नीतियों का कश्मीर पर कोई असर नहीं होगा. सशस्त्र संघर्ष कई दशकों से जारी है और इस पर कोई असर नहीं पड़ा है.’

1989 से पांच साल तक मीर जेकेएलएफ आतंकी के तौर पर सक्रिय रहे, उसके बाद लिबरेशन फ्रंट ने युद्धविराम का ऐलान कर दिया. उन्होंने कहा, ‘जेकेएलएफ का लोगों से पैसे लेने का रिकॉर्ड है...क्योंकि हम आजादी चाहते थे.’

पूर्व हिजबुल कमांडर जफर अकबर बट्ट ने कहा, ‘पब्लिक सपोर्ट के बूते ही मौजूदा आंदोलन आगे बढ़ रहा है. मुजाहिदों के लिए हमेशा समर्थन रहा है.’ बट्ट मारे गए आतंकी कमांडर अब्दुल माजिद डार की अगुवाई वाले ग्रुप का हिस्सा थे.

इस ग्रुप ने भारत सरकार के साथ 2000 में युद्धविराम कर लिया था. बट्ट हिजबुल के 22 साल तक सक्रिय आतंकी रहे. यह धड़ा पाकिस्तान के साथ विलय की वकालत करता था. बट्ट उन चुनिंदा कमांडरों में हैं जो कि 1989 में आतंकवाद की शुरुआत के बाद से इससे जुड़े रहे.

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