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बुलंदशहर टू अलीगढ़: 'लव जिहाद' के दंगों ने उजाड़ी जिंदगी, शरणार्थी बनने को मजबूर

वकील अहमद के परिवार को लव जिहाद की आग में झोंक दिया गया और अपने ही राज्य में वो शरणार्थी बनकर घूम रहे हैं

Updated On: Jun 08, 2018 05:37 PM IST

Saurabh Sharma

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बुलंदशहर टू अलीगढ़: 'लव जिहाद' के दंगों ने उजाड़ी जिंदगी, शरणार्थी बनने को मजबूर

पारा 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था. तपती गर्मी में एक पेड़ की छाया के नीचे बैठा, 34 वर्षीय वकील अहमद अपने एक साल के भतीजे को पंखा झल रहा था, जो अभी-अभी अपनी मां का दूध पीकर सोने की तैयारी कर रहा था. बच्चे के एक बार फिर रोने से पहले, वकील इस चिंता में डूबा हुए हैं कि वह कल कैसे अपने परिवार के बच्चों समेत 16 सदस्यों के लिए खाना जुटाएंगे.

वकील अहमद के पिता गुलाम अहमद की हत्या लगभग एक साल पहले बुलंदशहर में एक उन्मादी भीड़ ने कर दी थी. गुलाम अहमद पर एक हिंदू लड़की को भगाने में एक मुस्लिम लड़के की सहायता करने के आरोप थे. उस दिन के बाद से वकील अहमद का पूरा परिवार उत्तर प्रदेश में शरणार्थियों की तरह रहने के लिए मजबूर हो गया.

उनके गांव सोही के लोगों ने ही उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया. वकील की मां, भाइयों, उनकी पत्नियों और बच्चों के पास अपने खुद के गांव में भोजन, काम नहीं था. मन की शांति छिन चुकी थी. मजबूरन, उन लोगों के पास अपना गांव छोड़कर अलीगढ़ जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया था. परिवार के हाथ में बचत के नाम पर बहुत ही कम पैसा था. परिवार के लिए दो जून की रोटी की व्यवस्था करना मुश्किल हो गया है. बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं.

वकील पहले बढ़ई का काम करते थे, जबकि उनके भाई खेतिहर मजदूर थे. आज सब बेरोजगार हैं. वकील का कहना है, 'मेरे बड़े भाई की बेटी अब निराश हो गई है, क्योंकि उसे दसवीं कक्षा में प्रवेश नहीं मिल पा रहा. वह जिस स्कूल में पढ़ रही थी, उस स्कूल ने हमें ट्रांसफर सर्टिफिकेट नहीं दिया. इस वजह से अब अलीगढ़ का कोई स्कूल उसे एडमिशन नहीं दे रहा है.'

पिता को मारा, महिलाओं से छेड़छाड़

अपनी आंखों में आंसू लिए वकील पिछली गर्मियों के दौरान अपने परिवार के साथ हुई क्रूरता की कहानी बताते हैं. 2 मई को उनके पिता पहासु गांव में एक आम के बगीचे की रखवाली कर रहे थे. तभी कथित तौर पर हिंदू युवा वाहिनी (एचवाईवी) के एक समूह ने उन पर हमला किया. वकील कहते हैं, 'उन लोगों ने पिता जी को बुरी तरह पीटा और उसके बाद उनकी मृत्यु हो गई.' वह कहते हैं कि उस दिन सिर्फ उनके परिवार के एक सदस्य की हत्या ही नहीं हुई. पूरी दुनिया का रूख उनके परिवार के लिए बदल गया.

रूंधे हुए गले से वकील कहते हैं, 'हम रात को एक रोटी कम खाकर भी खुश थे, लेकिन हमारा परिवार एक साथ था. हम सब मिलकर रह रहे थे. हमारे पिता थे, जिन्होंने हमारी सभी जरूरतों का ख्याल रखा. उन्होंने हमें खुश रखने के लिए सब कुछ किया, लेकिन हम उन्हें उन गुंडों से नहीं बचा सके, जिन्होंने उन्हें हिंदुत्व के नाम पर मार दिया.'

वकील बताते हैं कि वे कैसे अपना वो गांव नहीं छोड़ना चाहते थे, जहां वे पैदा हुए थे और पले-बढ़े. वकील कहते हैं, 'मेरे पिता की हत्या के बाद, वे (उन्मादी भीड़) हमारे घर आ गए. ग्रामीणों ने हमारे परिवार को सूचित किया कि वे अब हमें मारने के लिए आ रहे हैं. हमें सलाह दी गई कि हम अपनी जान बचाने के लिए यहां से भाग जाए. जब मेरे परिवार की महिला सदस्यों को परेशान किया गया, उनके साथ छेड़खानी की गई, धमकी दी गई, तब हमने अलीगढ़ आने का फैसला किया.'

वकील अहमद.

वकील अहमद.

वकील की भाभी (बड़े भाई की पत्नी) जब अपनी जान बचाने के लिए गांव से भाग रही थीं, तब उनके साथ भी छेड़खानी की गई थीं. वे कहती हैं कि हिंदुत्व समूह के लोगों ने उनलोगों को सोचने-समझने का मौका भी नहीं दिया और हमारे साथ बदसलूकी की.

सबीना (नाम बदला हुआ) कहती हैं कि ये लोग खुद को हिंदू कहते हैं, लेकिन कोई भी तब हिंदू कैसे हो सकता है, जब उसे भगवान का डर ही न हो! उन्होंने हमें पकड़ लिया, हमारी कलाई मोड़ दी, हमें थप्पड़ मारा, हमें गलत तरीके से छुआ. उन्होंने हमारे गहने छीनने की भी कोशिश की. हमें बुरी तरह पीटा. अगर हम घर से नहीं भागते तो उस दिन मर गए होते.

मोहम्मद नईम इस परिवार का केस लड़ रहे है और उनका कहना है कि इस परिवार के बुरे दिन अभी खत्म नहीं हुए है. नईम कहते हैं, 'उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है. अगले दिन के लिए उनके पास न तो पर्याप्त कपड़े या भोजन की अतिरिक्त व्यवस्था है. वकील और उनके भाई एक साल से बेरोजगार हैं और कोई भी उनकी मदद करने के लिए आगे नहीं आया है.'

नईम ये केस मुफ्त में लड़ रहे हैं. उनका कहना है, 'हम अदालत में सभी सबूत पेश करेंगे. हमें यकीन है कि परिवार को न्याय मिलेगा. अच्छी बात ये है कि पुलिस एफआईआर दर्ज होने के बाद से ही इस परिवार के साथ सहयोग कर रही है.'

हिंदू संगठन के खिलाफ कोई सबूत नहीं

हालांकि, यह यकीनी तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि उक्त हत्या में कोई हिंदू संगठन शामिल था ही, लेकिन बुलंदशहर के पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उनके पास आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं.

इस केस के जांच अधिकारी राजेश सिंह कहते हैं, 'अभियुक्त एक अलग समुदाय से संबंधित है. अभी तक हमें कथित तौर पर हिंदू युवा वाहिनी के खिलाफ कोई भी सबूत नहीं मिला है. इस संगठन ने इस घटना में अपनी संलिप्तता से इंकार किया है. पुलिस ने सभी कोणों से जांच की है और यह सिर्फ हत्या का मामला है और कुछ भी नहीं.'

हिंदू युवा वाहिनी के सेकेंड-इन-कमांडर सुनील सिंह ने 'लव जिहाद' के कारण हुई इस हत्या में अपने संगठन के शामिल होने से इंकार कर दिया है. सिंह कहते हैं, 'हमने पुलिस के साथ सहयोग किया है. आंतरिक जांच में हमने पाया है कि हत्या का आरोपी हमारे साथ जुड़ा हुआ नहीं था.' हालांकि, वह यह स्वीकार करते है कि मृतक तथाकथित 'लव जिहाद' का समर्थन कर रहा था, जिसके लिए परिवार के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए.

(सौरभ शर्मा लखनऊ में रहते हैं और एक स्वतंत्र लेखक हैं. वे 101Reporters.com के सदस्य हैं, जो जमीनी पत्रकारों का एक अखिल भारतीय नेटवर्क हैं.)

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